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छोटे अखबारों को परेशान करना बंद करो!

भारत में इलेक्ट्रोनिक मीडिया की शुरूआत के समय तक पत्रकारिता का क्षेत्र लगभग प्रोफेशनल था लेकिन आज इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया दोनों ही अपने प्रोफेशनल स्वरूप को छोड़ कर कॉमर्शियल स्वरूप को अपना चुके हैं। हालांकि अधिकांश छोटे अखबार खासकर देश के हिन्दी भाषी क्षेत्रों से निकलने वाले अधिकांश छोटे अखबार अपने प्रोफेशनल स्वरूप को कायम रखने की जद्दोजहद में लगे हैं। इस जद्दोजहद के कारण कई बार तो छोटे अखबारों का अस्तित्व ही दाव पर लग जाता है। अपनी जिंदगी और मौत से जूझने ये छोटे अखबार देश के दबे कुचले गरीबों और मध्यम वर्ग की आवाज बने हैं। हालांकि सरकार के स्तर से इन छोटे अखबारों को न्यूनतम सहयोग किया जाता है, जिसे भी सरकार वापस लेने पर तुली है। पूंजीपति वर्ग तो इन छोटे अखबारों को अपना दुश्मन समझ कर उन्हें कोई आर्थिक सहयोग नहीं करता है।
यह सर्वविदित सत्य है कि देश की आजादी के लिये चले स्वतंत्रता संग्राम में छोटे अखबारों का, जिनमें मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा संचालित और संपादित अखबार भी शामिल थे, का महत्पूर्ण योगदान रहा है। जबकि बड़े अखबारों का देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं रहा है।
स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू से लेकर स्वर्गीय इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रीत्व काल तक छोटे अखबारों को सरकारी सहयोग रहा, लेकिन इसके बाद देश की केंद्रीय सरकारों और राज्य सरकारों ने छोटे अखबारों को पद दलित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी।
राजस्थान को ही लें तो भारतीय जनता पार्टी की भैंरोसिंह शेखावत सरकार के समय से ही राज्य सरकारों ने छोटे अखबारों को तव्वजो देना कम कर दिया गया था। लेकिन वसुन्धरा राजे के पहले कार्यकाल में छोटे अखबारों को सरकारी आर्थिक सहायता देना कम कर दिया गया और दूसरे कार्यकाल में तो लगभग समाप्त ही कर दिया गया। कुछ पिछलग्गू पत्रकारों द्वारा संचालित अखबारों जोकि वसुन्धरा राजे सरकार के गुणगान गाते हैं, को छोड़ दें तो अन्य जनवादी विचारों के अखबारों को प्राप्त सुविधाओं से भी वंचित किया जा रह है और उनके सरकारी आर्थिक सहयोग के हिस्से को अनुचित तरीके से पसंदीदा इलेक्ट्रोनिक मीडिया व अन्य बड़े अखबारों को दिया जा रहा है।
वसुन्धरा राजे सरकार की इन छोटे अखबार विरोधी नीतियों से परेशान छोटे अखबारों से जुड़े सम्पादक एवं अन्य पत्रकारों में गहरा आक्रोश पनप रहा है और वसुन्धरा राजे सरकार की सामन्तवादी हिटलरशाही से आजीज आये कलमधिस्सुओं ने मानसिक रूप से वसुन्धरा राजे सरकार की अधिनायकवादी, सामन्तवादी, हिटलरशाही से छुटकारा पाने के लिये अंगडाई लेना शुरू कर दिय है। वक्त रहते अगर वसुन्धरा राजे सरकार नहीं चेती तो उसे अपनी करनी का फल भुगतना ही होगा!

 
AGRAGAMI SANDESH

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