नई दिल्ली/जयपुर (अग्रगामी) भारत के प्रधानमंत्री ने एक नारा लगाया है मेक इन इण्डिया। जबकि पहले भारत में मेड इन इण्डिया शब्द प्रचलित था। देखने और सुनने में कोई खास फर्क नजर नहीं आता है। लेकिन समझने पर दोनों के अर्थ स्पष्ट हो जाते हैं। मेड इन इण्डिया यह दर्शाता है कि जिस माल पर यह ठप्पा लगा है वह व्यवसारिक रूप से निर्यात किया जायेगा, दूसरे शब्दों में माल भारत में बनेगा और निर्यात होगा। जबकि मेक इन इण्डिया में विदेशी पूंजीपति भारत में आकर भारतीय श्रम एवं अन्य साजो सामान का उपयोग कर माल बनायेंगे और भारत में ही बेचेंगे और मुनाफा बटोर कर अपने देश की तरफ पलायन कर जायेंगे।
भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं और केंद्र की मोदी सरकार को अब तो शायद दोनों शब्दों के अर्थ समझ में आ जाने जाहिये और अगर अब भी समझ में नहीं आते हैं और अपने चहेते विदेशी पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने की अपनी हरकतों को त्यागने का मानस नहीं बना पाते हैं तो उन्हें अपने पदों से त्यागपत्र दे देना चाहिये।
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इन इण्डिया के रट्टे ने हमारे देश के पूंजीपतियों में इस बात का भय भी बैठा दिया है कि अगर उन्होंने भारत में भारतीय पूंजी, भारतीय श्रम और भारतीय तकनीकि अपना कर सामान बनाने और उसे निर्यात करने की कोशिश की तो उन्हें प्रताडि़त किया जा सकता है और उनके द्वारा निर्मित सामान के एक्सपोर्ट पर सरकार कहर बरपा सकती है। नतीजन भारत के बड़े-बड़े व्यापारी नये उद्योगों के निवेश नहीं कर रहे और उनका प्रयास यह है कि जो उद्योग वो चला रहे हैं उनमें से भी अपनी व्यक्तिगत पूंजी निकाल लें ताकि विदेशी निवेशकर्ता के कारण उन्हें किसी तरह का आर्थिक नुकसान सहन न करना पड़े।
भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं और केंद्र की मोदी सरकार को अब तो शायद दोनों शब्दों के अर्थ समझ में आ जाने जाहिये और अगर अब भी समझ में नहीं आते हैं और अपने चहेते विदेशी पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने की अपनी हरकतों को त्यागने का मानस नहीं बना पाते हैं तो उन्हें अपने पदों से त्यागपत्र दे देना चाहिये।
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इन इण्डिया के रट्टे ने हमारे देश के पूंजीपतियों में इस बात का भय भी बैठा दिया है कि अगर उन्होंने भारत में भारतीय पूंजी, भारतीय श्रम और भारतीय तकनीकि अपना कर सामान बनाने और उसे निर्यात करने की कोशिश की तो उन्हें प्रताडि़त किया जा सकता है और उनके द्वारा निर्मित सामान के एक्सपोर्ट पर सरकार कहर बरपा सकती है। नतीजन भारत के बड़े-बड़े व्यापारी नये उद्योगों के निवेश नहीं कर रहे और उनका प्रयास यह है कि जो उद्योग वो चला रहे हैं उनमें से भी अपनी व्यक्तिगत पूंजी निकाल लें ताकि विदेशी निवेशकर्ता के कारण उन्हें किसी तरह का आर्थिक नुकसान सहन न करना पड़े।


