नई दिल्ली (अग्रगामी) केंद्र की भाजपानीत नरेन्द्र मोदी सरकार का एक वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर सरकारी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने के लिये देशभर में इस हफ्ते से प्रेस कांफ्रेंसों और मीटिगों का दौर चलेगा। सभी जानते हैं कि आमसभाओं में जनता कम ही आती है। दलों के नेता अपने कार्यकर्ताओं के जरिये भीड़ इक_ी करते हैं और पार्टी के बड़े नेता भाषण झाड़ कर मीटिंग स्थल से पलायन कर जाते हैं। राजस्थान को ही लें तो 6 करोड़ से अधिक की आबादी में से अगर पचास हजार या एक लाख लोग किसी पार्टी के नेता की आमसभा में शामिल होते हैं तो इसका मतलब यह नहीं होता है कि प्रदेश की पूरी जनता उस आमसभा में शामिल हो गई। इसी तरह कुछ पत्रकारों को इक_ा करके अपने मन की भड़ास निकालने से आम अवाम का कोई भला नहीं होता है।
देश का अवाम चाहता है कि उसे रोजगार मिले और मंहगाई तथा गरीबी से निजात दिलाई जाये। आम अवाम को रहने के लिये मकान, खाने के लिये खाद्यान्न और पहनने के लिये कपड़ा प्रमुख रूप से चाहिये। इसके अलावा वह ज्यादा कुछ नहीं मांगता है। प्रेस कांफ्रेंस करने या आमसभायें करने से आम नागरिक का न तो पेट भरने वाला है, ना ही शरीर पर उसके कोई कपड़ा आयेगा और ना ही कोई रहने के लिये आसरा मिलेगा।
आम अवाम को चाहिये मंहगाई से छुटकारा, रोजगार परक शिक्षा और उससे जुड़ा रोजगार तथा भ्रष्टाचार से छुटकारा। आज स्थिति यह है कि बिचौलियों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों ने जनता का जीना हराम कर रखा है। उधर सरकारी दफ्तरों में अफसरों और बाबूओं का भ्रष्टाचार मुंह खोल कर पड़ा है। ऐसी स्थिति में नरेन्द्र मोदी सरकार के एक वर्ष का जश्र क्या अवाम की कसौटी पर खरा उतरता है? राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के आकाओं और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को स्पष्ट रूप से सोचना चाहिये कि विज्ञापनबाजी और मार्केटिंग के तुक्कों से अगर आम अवाम को मूर्ख बनाने की कोशिश की तो उनके लिये दुखदायी होगा। क्योंकि आम अवाम सब जानता है और चुप रह कर सहन करता है! लेकिन जब अपनी पर आता है तो वोट के जरिये सत्ता पलट भी कर देता है।
जश्र मनाने के बजाय भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को चाहिये कि वे गांव-ढाणी, गली, मोहल्लों के स्तर पर अवाम से सम्पर्क करें तथा उनकी दुख तकलीफों को सुने और उनके निराकरण हेतु कार्य करें। अन्यथा सत्ता से वनवास की तैयारी में जुट जायें।
देश का अवाम चाहता है कि उसे रोजगार मिले और मंहगाई तथा गरीबी से निजात दिलाई जाये। आम अवाम को रहने के लिये मकान, खाने के लिये खाद्यान्न और पहनने के लिये कपड़ा प्रमुख रूप से चाहिये। इसके अलावा वह ज्यादा कुछ नहीं मांगता है। प्रेस कांफ्रेंस करने या आमसभायें करने से आम नागरिक का न तो पेट भरने वाला है, ना ही शरीर पर उसके कोई कपड़ा आयेगा और ना ही कोई रहने के लिये आसरा मिलेगा।
आम अवाम को चाहिये मंहगाई से छुटकारा, रोजगार परक शिक्षा और उससे जुड़ा रोजगार तथा भ्रष्टाचार से छुटकारा। आज स्थिति यह है कि बिचौलियों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों ने जनता का जीना हराम कर रखा है। उधर सरकारी दफ्तरों में अफसरों और बाबूओं का भ्रष्टाचार मुंह खोल कर पड़ा है। ऐसी स्थिति में नरेन्द्र मोदी सरकार के एक वर्ष का जश्र क्या अवाम की कसौटी पर खरा उतरता है? राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के आकाओं और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को स्पष्ट रूप से सोचना चाहिये कि विज्ञापनबाजी और मार्केटिंग के तुक्कों से अगर आम अवाम को मूर्ख बनाने की कोशिश की तो उनके लिये दुखदायी होगा। क्योंकि आम अवाम सब जानता है और चुप रह कर सहन करता है! लेकिन जब अपनी पर आता है तो वोट के जरिये सत्ता पलट भी कर देता है।
जश्र मनाने के बजाय भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को चाहिये कि वे गांव-ढाणी, गली, मोहल्लों के स्तर पर अवाम से सम्पर्क करें तथा उनकी दुख तकलीफों को सुने और उनके निराकरण हेतु कार्य करें। अन्यथा सत्ता से वनवास की तैयारी में जुट जायें।


