भारतीय जनता पार्टीनीत केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के कार्यकाल का सत्ता में एक साल पूरा होने की वर्षगांठ पर जोरशोर से कार्यक्रम आयोजित करने के दौर चल रहे हैं। अगर केंद्र की भाजपानीत नरेन्द्र मोदी की सरकार ने जनहित के वास्तव में कोई कार्य किये होते तो उसे इस तरह के कोई कार्यक्रम करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। वास्तव में केंद्र की भारतीय जनता पार्टीनीत नरेन्द्र मोदी की सरकार की उपलब्धियां लगभग शून्य हैं।
उदाहरण के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर जिले में पिछले दिनों एक जनसभा को संबोधित करते हुये घोषणा की थी कि उस क्षेत्र में हजारों करोड़ रूपये व्यय करके एक स्टील प्लांट लगाया जायेगा। नात्सीवादी, सामंतवादी और पूंजीवादी सोच के नरेन्द्र मोदी को कौन समझाये कि इतना बड़ा स्टील प्लांट गरीब मजदूर और किसान स्थापित नहीं कर सकता है। यह तो पूंजीपति और पूंजीपतियों को सहयोग करने वाली सरकार ही लगा सकती है। वो भी गरीब मजदूर और किसानों की जमीनों को हथियाने के बाद!
इस तरह के स्टील प्लांट लगाने या खनन गतिविधियां शुरू करने के लिये जंगलों को नष्ट करने से आदिवासी मजदूरों और किसानों को ही नुकसान होगा क्योंकि उन्हें अपनी जमीन गंवानी पड़ेगी।
एक और उदाहरण हम यहां देना चाहेंगे कि सरकार शहरों के पास की बेशकीमती खेतीयोग्य जमीनें अधिग्रहण कर वहां व्यवसायिक गतिविधियां चलाने पर आमादा है। अगर सरकार को व्यवसायिक गतिविधियां चलाने के लिये जमीन की आवश्यकता है तो देश में लाखों एकड़ बंजड़ जमीन देशभर में बेकार पड़ी है। उसका उपयोग किया जा सकता है और इस पर किसी को आपत्ती भी नहीं होगी। लेकिन सरकार इस बंजड़ और ऊसर जमीन का उपयोग क्यों नहीं करना चाहती है? इसका जवाब तो सत्ताधीश ही दे सकते हैं! हम तो सिर्फ इतना ही कह सकते हैं कि खेतीयोग्य कृषि भूमि पर कृषि कार्यों के अलावा अन्य सभी कार्यों पर पाबंदी लगा देनी चाहिये।
हम एक उदाहरण यहां ओर देना चाहेंगे कि केंद्र की भाजपानीत नरेन्द्र मोदी सरकार ग्रामीण आंचलों के किसानों और मजदूरों के पक्ष में कार्य नहीं कर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में काश्तकारों की उपज को रखने के लिये गोदाम बनाने, ग्रामीण किसानों और मजदूरों के दैनिक काम में आने वाली वस्तुओं के निर्माण हेतु लद्यु उद्योग एवं कुटीर उद्योग के निर्माण एवं संचालन हेतु मोटी पूंजी की भी आवश्यकता नहीं होती।
अग्रगामी संदेश के पिछले अंकों में सुझाया था कि ग्रामीण क्षेत्रों में सौर एवं पवन ऊर्जा के छोटे-छोटे संयत्र ग्राम स्तर पर बनाये जाय जिनमें न्यूनतम पूंजी की आवश्यकता होती है और सौर ऊर्जा के लिये अलग से जमीन की आवश्यकता भी नहीं होती है। क्योंकि वे ग्रामीणों के आवास की छतों पर लगा कर संचालित किये जा सकते हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टीनीत नरेन्द्र मोदी सरकार ने अब तक जो नीतियां बनाई है वे ज्यादातर बड़े पूंजीपति व उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने वाली है। पिछले दिनों अक्षय ऊर्जा के लिये बैंको द्वारा 15 हजार करोड़ रूपये गुजरात के अडानी ग्रुप को स्वीकृत हुये हैं।
एक बड़े उद्योगपति को इतनी मोटी रकम बैंकों द्वारा उधार हेतु स्वीकृत किये जाने के बजाय तो सहकारी संस्थाओं के माध्यम से यह पैसा ग्रामीणों में वितरित कर अक्षय ऊर्जा सयंत्र ग्राम स्तर पर संचालित करते तो आम अवाम को ज्यादा फायदा होता।
उधर राजस्थान के कवई में लगाये जाने वाले 1320 मेगावोट पावर प्लांट में उत्पादित बिजली के दामों में अभी से ही बढ़ोतरी के लिये अडानी पावर राजस्थान लि. ने उठापटक शुरू कर दी है। अडानी पावर की मांग को राजस्थान विद्युत नियामक आयोग ने ठुकरा दिया है।
अब हम पुन: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह सुझाना चाहेंगे कि वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के वैज्ञानिक समाजवाद के रास्ते पर चलकर देश को तरक्की के रास्ते पर अग्रसर करें। अगर वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के वैज्ञानिक समाजवाद को अपना कर उसके अनुरूप कार्य करते हैं तो उन्हें विदेशियों के सामने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिये झोली फैलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इस देश में इतना सोना और पैसा है कि उसके उपयोग से 25 साल तक बिना टैक्स लगाये देश में प्रशासनिक संचालन किया जा सकता है।
उदाहरण के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर जिले में पिछले दिनों एक जनसभा को संबोधित करते हुये घोषणा की थी कि उस क्षेत्र में हजारों करोड़ रूपये व्यय करके एक स्टील प्लांट लगाया जायेगा। नात्सीवादी, सामंतवादी और पूंजीवादी सोच के नरेन्द्र मोदी को कौन समझाये कि इतना बड़ा स्टील प्लांट गरीब मजदूर और किसान स्थापित नहीं कर सकता है। यह तो पूंजीपति और पूंजीपतियों को सहयोग करने वाली सरकार ही लगा सकती है। वो भी गरीब मजदूर और किसानों की जमीनों को हथियाने के बाद!
इस तरह के स्टील प्लांट लगाने या खनन गतिविधियां शुरू करने के लिये जंगलों को नष्ट करने से आदिवासी मजदूरों और किसानों को ही नुकसान होगा क्योंकि उन्हें अपनी जमीन गंवानी पड़ेगी।
एक और उदाहरण हम यहां देना चाहेंगे कि सरकार शहरों के पास की बेशकीमती खेतीयोग्य जमीनें अधिग्रहण कर वहां व्यवसायिक गतिविधियां चलाने पर आमादा है। अगर सरकार को व्यवसायिक गतिविधियां चलाने के लिये जमीन की आवश्यकता है तो देश में लाखों एकड़ बंजड़ जमीन देशभर में बेकार पड़ी है। उसका उपयोग किया जा सकता है और इस पर किसी को आपत्ती भी नहीं होगी। लेकिन सरकार इस बंजड़ और ऊसर जमीन का उपयोग क्यों नहीं करना चाहती है? इसका जवाब तो सत्ताधीश ही दे सकते हैं! हम तो सिर्फ इतना ही कह सकते हैं कि खेतीयोग्य कृषि भूमि पर कृषि कार्यों के अलावा अन्य सभी कार्यों पर पाबंदी लगा देनी चाहिये।
हम एक उदाहरण यहां ओर देना चाहेंगे कि केंद्र की भाजपानीत नरेन्द्र मोदी सरकार ग्रामीण आंचलों के किसानों और मजदूरों के पक्ष में कार्य नहीं कर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में काश्तकारों की उपज को रखने के लिये गोदाम बनाने, ग्रामीण किसानों और मजदूरों के दैनिक काम में आने वाली वस्तुओं के निर्माण हेतु लद्यु उद्योग एवं कुटीर उद्योग के निर्माण एवं संचालन हेतु मोटी पूंजी की भी आवश्यकता नहीं होती।
अग्रगामी संदेश के पिछले अंकों में सुझाया था कि ग्रामीण क्षेत्रों में सौर एवं पवन ऊर्जा के छोटे-छोटे संयत्र ग्राम स्तर पर बनाये जाय जिनमें न्यूनतम पूंजी की आवश्यकता होती है और सौर ऊर्जा के लिये अलग से जमीन की आवश्यकता भी नहीं होती है। क्योंकि वे ग्रामीणों के आवास की छतों पर लगा कर संचालित किये जा सकते हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टीनीत नरेन्द्र मोदी सरकार ने अब तक जो नीतियां बनाई है वे ज्यादातर बड़े पूंजीपति व उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने वाली है। पिछले दिनों अक्षय ऊर्जा के लिये बैंको द्वारा 15 हजार करोड़ रूपये गुजरात के अडानी ग्रुप को स्वीकृत हुये हैं।
एक बड़े उद्योगपति को इतनी मोटी रकम बैंकों द्वारा उधार हेतु स्वीकृत किये जाने के बजाय तो सहकारी संस्थाओं के माध्यम से यह पैसा ग्रामीणों में वितरित कर अक्षय ऊर्जा सयंत्र ग्राम स्तर पर संचालित करते तो आम अवाम को ज्यादा फायदा होता।
उधर राजस्थान के कवई में लगाये जाने वाले 1320 मेगावोट पावर प्लांट में उत्पादित बिजली के दामों में अभी से ही बढ़ोतरी के लिये अडानी पावर राजस्थान लि. ने उठापटक शुरू कर दी है। अडानी पावर की मांग को राजस्थान विद्युत नियामक आयोग ने ठुकरा दिया है।
अब हम पुन: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह सुझाना चाहेंगे कि वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के वैज्ञानिक समाजवाद के रास्ते पर चलकर देश को तरक्की के रास्ते पर अग्रसर करें। अगर वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के वैज्ञानिक समाजवाद को अपना कर उसके अनुरूप कार्य करते हैं तो उन्हें विदेशियों के सामने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिये झोली फैलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इस देश में इतना सोना और पैसा है कि उसके उपयोग से 25 साल तक बिना टैक्स लगाये देश में प्रशासनिक संचालन किया जा सकता है।


