यह अजीब बात है कि एक ओर जहां नये जैन मंदिरों के निर्माण में करोड़ों रूपये बहाये जा रहे हैं, वहीं अल्पसंख्यक जैन समुदाय में ज्यादातर लोगों में धार्मिक आस्था कम होती चली जा रही है। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि अगर किसी धार्मिक कार्यक्रम को पूरा करने के लिये स्वामीवात्सल्य की आड़ में भोज का आयोजन नहीं किया जाता है तो उस धार्मिक कार्यक्रम में लोग कम ही भाग लेते हैं। यहां तक कि स्वामीवात्सल्य की आड़ में आयोजित भोज वाले धार्मिक कार्यक्रमों में भी समाजबंधु भोज प्रारम्भ होने के आसपास ही कार्यक्रम में शामिल होते हैं। जबकि होना यह चाहिये कि समाजबंधु धार्मिक कार्यक्रम में तो अवश्य भाग लें और भोज में भाग लेना एच्छिक रखे। जैन संस्कृति के प्रति लोगों में आखीर आस्था क्यों टूट रही है? यह एक विचारणीय विषय है!
बड़े-बड़े पंडालों में अपने प्रवचन करने वाले साधु-संत-साध्वी प्रवचन सुनने वालों की भीड़ जुटाने के लिये पूंजीपतियों का सहारा लेते हैं और अपने मन की भड़ास निकालते हैं। आम समाजबंधु के सामने अपनी रोजी रोटी और बच्चों को पालने के लिये धन कमाने के लिये कर्म करने से फुर्सत मिले तभी तो वह धर्मध्यान की बात करे। ऐसी स्थिति के मद्देनजर साधु-संत-साध्वी पूंजीपतियों के जरिये आम समाजबंधु को अपना प्रवचन सुनाने के लिये जो तरीके इस्तेमाल करते हैं, वे उचित नहीं होते हैं और लालच के जरिये जो भीड़ इक्_ी होती है वह महज लालच की पूर्ति के लिये इक्_ी होती है। जिन संस्कृति (जैन) पांच हजार साल से अधिक पुरानी है। 23वें तीर्थंकर पाश्र्व वीरभट्ट से पहले तक मूर्ति पूजा का कोई प्रावधान नहीं था। वर्तमान में अपने आप को जो साधु-संत साध्वी कहते हैं, उनको भी ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी तक के जिनशासन के इतिहास को कोई जानकारी नहीं है। आज से तीन हजार साल पहले जब पाश्र्व वीरभट्ट बेबीलोन के शासक अबुकिडिंजर को हरा कर उनकी बेटी प्रभावती के साथ शादी कर भारत लौटे उसके बाद ही जैन समुदाय में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ। ज्ञातव्य रहे कि अपनी पत्नी प्रभावती के साथ पाश्र्व वीरभट्ट 70 हजार टन सोना भी साथ लेकर आये थे।
आज स्थिति यह है कि हमारे 24 तीर्थंकरों का सही इतिहास किसी को पता नहीं है और जैन संस्कृति के ग्रंथ भारत के बाहर जर्मनी, जापान, चीन, टर्की, साऊदीअरब, ईराक सहित अन्य देशों में या तो म्यूजियमों में पड़े हैं या व्यक्तियों के निजी संरक्षण में पड़े हैं। जिन्हें भारत वापस लाने का कोई भी प्रयास किसी भी स्तर पर नहीं किया जा रहा है। अब तो हालात यहां तक बिगड़ गये हैं कि हमारे पहले तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रपौत्र भरत के नाम से स्थापित भारत का नाम ही बदलने के प्रयास किये जा रहे हैं।
जैन समुदाय में समाज के संगठन को महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन साधु-संत-साध्वियों की हठ के कारण जैन समुदाय में विघटन होता ही जा रहा है। पहिले श्वेताम्बर और दिगम्बर के रूप में विघटन हुआ। उसके बाद अब साधु-संतों के समर्थकों के बीच समाज विघटन हो रहा है। जैन समाज में चाहे वो दिगम्बर हो या श्वेताम्बर, साधु-संतों पर कोई अंकुश नहीं है। नतीजन जैन समाज छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटता ही चला जा रहा है। लेकिन किसी को जैसे समाज के इस तरह विघटित होने के बारे में कोई चिंता नहीं है। एक समय 14वीं शताब्दी तक जैन शासक के रूप में हुआ करते थे! लेकिन आज स्थिति यह है कि जैन समुदाय संख्या बल में भी अल्पसंख्यक हो गया है।
अभी भी समय है कि जैन समुदाय के विभिन्न संगठनों के अगड़े मिल बैठकर जैन समुदाय की तरक्की की बात करें और उसके पुराने मुकाम तक पहुंचायें।
बड़े-बड़े पंडालों में अपने प्रवचन करने वाले साधु-संत-साध्वी प्रवचन सुनने वालों की भीड़ जुटाने के लिये पूंजीपतियों का सहारा लेते हैं और अपने मन की भड़ास निकालते हैं। आम समाजबंधु के सामने अपनी रोजी रोटी और बच्चों को पालने के लिये धन कमाने के लिये कर्म करने से फुर्सत मिले तभी तो वह धर्मध्यान की बात करे। ऐसी स्थिति के मद्देनजर साधु-संत-साध्वी पूंजीपतियों के जरिये आम समाजबंधु को अपना प्रवचन सुनाने के लिये जो तरीके इस्तेमाल करते हैं, वे उचित नहीं होते हैं और लालच के जरिये जो भीड़ इक्_ी होती है वह महज लालच की पूर्ति के लिये इक्_ी होती है। जिन संस्कृति (जैन) पांच हजार साल से अधिक पुरानी है। 23वें तीर्थंकर पाश्र्व वीरभट्ट से पहले तक मूर्ति पूजा का कोई प्रावधान नहीं था। वर्तमान में अपने आप को जो साधु-संत साध्वी कहते हैं, उनको भी ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी तक के जिनशासन के इतिहास को कोई जानकारी नहीं है। आज से तीन हजार साल पहले जब पाश्र्व वीरभट्ट बेबीलोन के शासक अबुकिडिंजर को हरा कर उनकी बेटी प्रभावती के साथ शादी कर भारत लौटे उसके बाद ही जैन समुदाय में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ। ज्ञातव्य रहे कि अपनी पत्नी प्रभावती के साथ पाश्र्व वीरभट्ट 70 हजार टन सोना भी साथ लेकर आये थे।
आज स्थिति यह है कि हमारे 24 तीर्थंकरों का सही इतिहास किसी को पता नहीं है और जैन संस्कृति के ग्रंथ भारत के बाहर जर्मनी, जापान, चीन, टर्की, साऊदीअरब, ईराक सहित अन्य देशों में या तो म्यूजियमों में पड़े हैं या व्यक्तियों के निजी संरक्षण में पड़े हैं। जिन्हें भारत वापस लाने का कोई भी प्रयास किसी भी स्तर पर नहीं किया जा रहा है। अब तो हालात यहां तक बिगड़ गये हैं कि हमारे पहले तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रपौत्र भरत के नाम से स्थापित भारत का नाम ही बदलने के प्रयास किये जा रहे हैं।
जैन समुदाय में समाज के संगठन को महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन साधु-संत-साध्वियों की हठ के कारण जैन समुदाय में विघटन होता ही जा रहा है। पहिले श्वेताम्बर और दिगम्बर के रूप में विघटन हुआ। उसके बाद अब साधु-संतों के समर्थकों के बीच समाज विघटन हो रहा है। जैन समाज में चाहे वो दिगम्बर हो या श्वेताम्बर, साधु-संतों पर कोई अंकुश नहीं है। नतीजन जैन समाज छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटता ही चला जा रहा है। लेकिन किसी को जैसे समाज के इस तरह विघटित होने के बारे में कोई चिंता नहीं है। एक समय 14वीं शताब्दी तक जैन शासक के रूप में हुआ करते थे! लेकिन आज स्थिति यह है कि जैन समुदाय संख्या बल में भी अल्पसंख्यक हो गया है।
अभी भी समय है कि जैन समुदाय के विभिन्न संगठनों के अगड़े मिल बैठकर जैन समुदाय की तरक्की की बात करें और उसके पुराने मुकाम तक पहुंचायें।


