जयपुर (अग्रगामी) देश में इलेक्ट्रोनिक मीडिया की लाईव डिबेट कार्यक्रम से अवाम परेशान है और आक्रोशित होने की डगर पर चल निकला है। प्रिंट मीडिया में छपी हुई डिस्पेच को बदला नहीं जा सकता है। लेकिन इलेक्ट्रोनिक मीडिया लाईव डिबेट में असली मुद्दे से हट कर बेतुकी बहस से अवाम में नाराजगी पनप रही है! लोकसभा चुनावों में इलेक्ट्रोनिक मीडिया का झुकाव एक विचारधारा एवं राजनैतिक पार्टी के पक्ष में रहा। नतीजन अवाम ने भ्रमित होकर अपने वोटों का उपयोग मीडिया द्वारा फैलाये गये भ्रम के आधार पर किया।
इलेक्ट्रोनिक मीडिया और बड़े अखबारों में उन्हीं खबरों को स्थान मिलता है, जिससे सम्बन्धित इलेक्ट्रोनिक चैनल या बड़े अखबारों को टीआरपी में बढ़त मिलती है! लेकिन छोटे साप्ताहिक और पाक्षिक अखबारों में जो खबरे छपती हैं वे आम अवाम के सरोकारों से जुड़ी होती है। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये कुछ इलेक्ट्रोनिक चैनल छोटे अखबारों की खबरों को भी आधार बनाकर अपना स्लॉट शूट करते हैं। केंद्र व राज्य सरकारें ऐसे टीवी चैनलों और अखबारों को तो भरपूर विज्ञापन देती है, लेकिन छोटे अखबारों को विज्ञापनों से महरूम रखती है।
राजस्थान को ही लें तो सरकार ने साप्ताहिक और पाक्षिक अखबारों को दिये जा रहे विज्ञापनों को बंद कर बड़े अखबारों और टीवी चैनलों के विज्ञपनों में बढ़ोतरी कर दी है। संघर्षशील छोटे अखबारों की एकता में ढील देखकर सरकार ने यह निर्णय लिया है। अब वक्त आ गया है कि छोटे अखबारों को संगठित होकर संघर्षशील हो जाना चाहिये। इसके लिये छोटे अखबारों के सम्पादकों और पत्रकारों को अब अग्रगामी पत्रकार परिषद् के साथ मिलकर एक हो जाना चाहिये ताकि छोटे अखबारों के संविधान प्रदत्त अधिकारों पर हो रहे कुठाराघात को रोका जा सके। उम्मीद है कि छोटे अखबारों के सम्पादकों और उनसे जुड़े पत्रकारों को एकजुट होकर संघर्ष करने का मानस बनायेंगे और संघर्षरत रहेंगे। अपने अधिकारों के लिये!
इलेक्ट्रोनिक मीडिया और बड़े अखबारों में उन्हीं खबरों को स्थान मिलता है, जिससे सम्बन्धित इलेक्ट्रोनिक चैनल या बड़े अखबारों को टीआरपी में बढ़त मिलती है! लेकिन छोटे साप्ताहिक और पाक्षिक अखबारों में जो खबरे छपती हैं वे आम अवाम के सरोकारों से जुड़ी होती है। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये कुछ इलेक्ट्रोनिक चैनल छोटे अखबारों की खबरों को भी आधार बनाकर अपना स्लॉट शूट करते हैं। केंद्र व राज्य सरकारें ऐसे टीवी चैनलों और अखबारों को तो भरपूर विज्ञापन देती है, लेकिन छोटे अखबारों को विज्ञापनों से महरूम रखती है।
राजस्थान को ही लें तो सरकार ने साप्ताहिक और पाक्षिक अखबारों को दिये जा रहे विज्ञापनों को बंद कर बड़े अखबारों और टीवी चैनलों के विज्ञपनों में बढ़ोतरी कर दी है। संघर्षशील छोटे अखबारों की एकता में ढील देखकर सरकार ने यह निर्णय लिया है। अब वक्त आ गया है कि छोटे अखबारों को संगठित होकर संघर्षशील हो जाना चाहिये। इसके लिये छोटे अखबारों के सम्पादकों और पत्रकारों को अब अग्रगामी पत्रकार परिषद् के साथ मिलकर एक हो जाना चाहिये ताकि छोटे अखबारों के संविधान प्रदत्त अधिकारों पर हो रहे कुठाराघात को रोका जा सके। उम्मीद है कि छोटे अखबारों के सम्पादकों और उनसे जुड़े पत्रकारों को एकजुट होकर संघर्ष करने का मानस बनायेंगे और संघर्षरत रहेंगे। अपने अधिकारों के लिये!


