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राजस्थान में भाजपाई राज के हाल बेहाल!

जयपुर (अग्रगामी) आगामी वर्ष जनवरी में ग्रामीण जनता अपनी सरकार चुनने का काम चालू करेगी। लेकिन जिस तरह से शहरी जनता के साथ छलावा हुआ है, उसके मद्देनजर ग्रामों की जनता सतर्क है और ग्रामीण किसी भी हालत में किसी भी राजनैतिक पार्टी के आश्वासनों के छलावे में आने के मूड में नहीं है। वसुन्धरा राजे सरकार को गतिशील हुये लगभग एक साल हो गया लेकिन किसी भी स्तर पर सरकार जनहित का कार्य करने में असफल रही है। कानून और व्यवस्था की स्थिति को देखें तो विधायक भवानी सिंह राजावत और विधायक प्रहलाद गुंजल सहित मंत्री नंदलाल मीणा और नैनवां नगर पालिका के अध्यक्ष प्रमोद जैन के बोल ही स्पष्ट करते हैं कि प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति कैसी है!
चुनिंदा जनप्रतिनिधियों के आगे बौना साबित होते हुये स्थानीय प्रशासन और पुलिस प्रशासन जनहित का कोई भी काम करने में सफल नहीं हो पा रहा है। प्रदेश में अपराधों का ग्राफ ऊंचाई की ओर चढ़ रहा है। वहीं पुलिस अनुसंधान का ग्राफ नीचे की ओर जा रहा है। पुलिस थानों में जरूरत के मुताबित नफरी का अभाव है वहीं अपराधियों से दो-दो हाथ करने के लिये पुलिसकर्मियों के पास आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता निहायत कम है। झाडू हाथ में लकर फोटो खिंचवाने से अपराध कम नहीं होंगे। हुजूरों!
पुलिस थानों में बीट सिस्टम कमजोर होता चला जा रहा है। उसका मुख्य कारण थानों में नफरी के साथ-साथ थानों में उपलब्ध नफरी को भी वीआईपी ड्यूटी, धरना-प्रदर्शन, नाकाबंदी आदि में लगा देने से बीट सिस्टम धराशाही होने के कगार पर है। अधिकांश थानों में गुप्तचरकर्मियों की या तो नियुक्ति नहीं की गई है या फिर उन्हें दूसरे कार्यों में लगा दिया जाता है, नतीजन थाना प्रभारी और सर्किल आफीसर तक को भी थाने से सम्बन्धित कार्यवाही में दिक्कत आती है। लेकिन सरकार के स्तर से पुलिस प्रशासन के माध्यम से बीट सिस्टम और गुप्तचर व्यवस्था को मजबूत करने के लिये कोई कदम नहीं उठाये जा रहे हैं।
मंहगाई को लें तो जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों के खिलाफ कोई भी कार्य करने से वसुन्धरा राजे सरकार गुरेज कर रही है। नतीजन प्रदेश में जमाखोरी, कालाबाजारी और मुनाफाखोरी को प्रोत्साहन मिल रहा है और जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों के हौंसले बुलंद है।
यही हाल स्थानीय निकायों में व्याप्त भ्रष्टाचार के हैं। राजस्थान की राजधानी जयपुर को ही लें तो जयपुर नगर निगम से एक भी भ्रष्ट अफसर को नहीं हटाया गया है और वहीं भ्र्रष्ट अफसरों और कारिंदों को हटाने के कोई संकेत भी सरकार नहीं दे रही है। जिसके चलते इन निकायों के रेकार्ड में हेराफेरी और अवैध निर्माणों के मामलों में बाढ ही आ गई है और कार्यवाही करने वालों का दूर-दूर तक अतापता नहीं है।
रोजगार के मुद्दे पर अगर हम आयें तो पायेंगे कि पिछले एक साल में वसुन्धरा राजे सरकार ने एक भी बेरोजगार को रोजगार उपलब्ध नहीं करवाया है। सरकार अब यह कैफियत दे रही है कि फरवरी, 2015 के अन्त तक रोजगार दिलाने के लिये ठोस कदम उठाये जायेंगे! लेकिन हकीकत यह है कि इसके लिये सरकार के पास कोई ठोस योजना ही नहीं है।
प्रदेश में अरबों रूपयों का कालाधन पूंजीपतियों और सेठियों की तिजोरियों में भरा पड़ा है या फिर यह कालाधन निर्माण सेक्टर में खपाया जा रहा है। लेकिन राज्य सरकार और केंद्र सरकार की कोई भी ऐजेंसी कालेधन के प्रभाव को रोकने हेतु सक्रिय नजर नहीं हो पा रही है।
अन्तराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतें घटी हैं जिसके चलते तेल कम्पनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम घटा दिये लेकिन राज्य की वसुन्धरा राजे सरकार ने टैक्स बढ़ाकर जनता को मिली राहत को भी अपने खाते में जमा करन शुरू कर दिया है। पेट्रोल-डीजल पर वैसे ही राजस्थान में टैक्स पड़ौसी राज्यों से बहुत अधिक है। नतीजन राजस्थान के अलावा अन्य दूसरे प्रदेशों के वाहन मालिक राजस्थान में पेट्रोल-डीजल खरीदना पसंद नहीं करते हैं। राजस्थान से पड़ौसी राज्यों में आपरेट होने वाले वाहन भी पेट्रोल-डीजल पड़ौसी राज्यों से ही भरवा कर लाते हैं। इसका खमियाजा इस व्यापार में लगे राज्य के व्यापार में लगे व्यापारियों को उठाना पड़ रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह अराजकता व्याप्त है। उच्च शिक्षा हो चाहे माध्यमिक शिक्षा! दोनों ही क्षेत्रों में सरकार का परफोरमेंस नकारात्मक है ओर विभागों की तरह शिक्षा विभाग भी तबादलों की चपेट में है, हालात यह है कि कुछ कॉलेजों व स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है वहीं कुछ कॉलेज व स्कूलों में शिक्षकों की मारामारी है। लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार के पास बालकों के भविष्य को संवारने के लिये कोई ठोस योजना हो, ऐसा नजर नहीं आता है!
लेकिन वसुन्धरा राजे सरकार के लिये राहत भरी बात यह है कि वामपंथी जनवादियों सहित जनता परिवार और अन्य राजनैतिक दलों के नेता अभी तक अवाम को साथ लेकर जनता के हित में संघर्ष करने का मूड़ नहीं बना पाये हैं। शहरी निकायों के पहले चरण के चुनाव समाप्त हो गये हैं। जिनको जीतना था वो जीत गये जिनको हारना था वो हार गये! लेकिन अवाम के मुंह पर एक ही सवाल है कि विपक्षी दल क्यों उसके साथ मिल कर जनहित में संघर्ष नहीं करना चाहते हैं।

 
AGRAGAMI SANDESH

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