रायपुर (अग्रगामी) नक्सलवाद को तो माओवाद ने बरसों पहले ही अपनी जड़े जमाने के लिये ढिकाने लगा दिया था और नक्सलवाद से जुड़े अधिकांश नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने छाते के नीचे ले लिया था। अब देश में माओवाद बनाम पूंजीवाद का संघर्ष चल रहा है यह सबकी जानकारी में है। आज स्थिति यह है कि गरीब और अमीर की लड़ाई ने माओवाद बनाम पूंजीवाद का स्वरूप ले लिया है। छत्तीसगढ़ हो या मध्यप्रदेश, उड़ीसा हो या झारखंड, देश में गरीब और अमीर की लड़ाई तेज होती जा रही है। लेकिन नक्सलबाडी में जागीदारों और किसानों के बीच जो संघर्ष हुआ था उसमें विचारधारा का जुड़ाव नहीं था, जबकि माओवाद बनाम पूंजीवाद में स्पष्टत: यह नजर आता है कि दोनों तरफ विचारधाराओं का जुड़ाव है।
चूंकि यह संघर्ष विचारधाराओं के बीच का है। इससे जुड़ा एक पक्ष मेहनतकश श्रेणी का है, वहीं दूसरा पक्ष पूंजीवाद का हिमायती और अपने स्वार्थों की पूर्ति में जुड़ा है। यह पक्ष गरीबों के जमीन, जंगल पर कब्जा कर अपने आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति में लगा है। इस पूंजीवादी विचारधारा के कार्पोरेटजगत को सरकार का समर्थन प्राप्त है। छत्तीसगढ़ के सुकना जिले में केंद्रीय सुरक्षा बल के चौदह सुरक्षाकर्मियों की मौत का मामला निहायत दर्दनाक है। हम मृत सुरक्षाकर्मियों के परिवारों की दु:ख की बेला में साथ हैं। यह मुद्दा महज माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ का नहीं है। इस घटनाक्रम के पीछे सरकार और कार्पोरेट घरानों के बीच की मिलीभगत है। कार्पोरेट घराने चाहते हैं कि वे गरीब आदिवासियों की जमीन हड़प कर उसका दोहन बिना रोकटोक के करें और इस हेतु सरकार उन्हें मदद कर रही है।
सरकार कार्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिये ताकत का इस्तेमाल कर रही है। वहीं आदिवासियों में पढ़े लिखे युवा लामबंद होकर हथियारों का इस्तेमाल कर सरकार द्वारा कार्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने का विरोध कर रहे हैं। इसका नतीजा सुरक्षाकर्मी और आदिवासी भुगत रहे हैं। क्योंकि वे ही तो गरीब तबके से होते हैं!
राजनेता और कार्पोरेट घराने के पूंजीपती दूर बैठे गरीबों को आपस में लड़वा रहे हैं। आज स्थिति यह है कि छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सहित कोबरा फोर्स एवं सेना के कई कालमस् ट्रेनिंग के बहाने आदिवासी इलाकों में कैंप किये हुये हैं और आदिवासियों पर कहर बरपाने में लिप्त हैं। वहीं सरकार 11000 अर्ध सैनिक बल और इलाके में भेज रही है। जबकि होना यह चाहिये कि केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ राज्य सरकार और आदिवासियों-माओवादियों में सीधी बातचीत हो और मामलों को बातचीत के जरिये सुलझाया जाये। लेकिन केंद्र व राज्य सरकारें गरीबों की बात सुनने को तैयार ही नहीं हैं और सुरक्षा बलों के जरिये दमन कर रही है, जोकि अनुचित है। हम इस विषय में आगे विस्तार से लिखेंगे।
चूंकि यह संघर्ष विचारधाराओं के बीच का है। इससे जुड़ा एक पक्ष मेहनतकश श्रेणी का है, वहीं दूसरा पक्ष पूंजीवाद का हिमायती और अपने स्वार्थों की पूर्ति में जुड़ा है। यह पक्ष गरीबों के जमीन, जंगल पर कब्जा कर अपने आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति में लगा है। इस पूंजीवादी विचारधारा के कार्पोरेटजगत को सरकार का समर्थन प्राप्त है। छत्तीसगढ़ के सुकना जिले में केंद्रीय सुरक्षा बल के चौदह सुरक्षाकर्मियों की मौत का मामला निहायत दर्दनाक है। हम मृत सुरक्षाकर्मियों के परिवारों की दु:ख की बेला में साथ हैं। यह मुद्दा महज माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ का नहीं है। इस घटनाक्रम के पीछे सरकार और कार्पोरेट घरानों के बीच की मिलीभगत है। कार्पोरेट घराने चाहते हैं कि वे गरीब आदिवासियों की जमीन हड़प कर उसका दोहन बिना रोकटोक के करें और इस हेतु सरकार उन्हें मदद कर रही है।
सरकार कार्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिये ताकत का इस्तेमाल कर रही है। वहीं आदिवासियों में पढ़े लिखे युवा लामबंद होकर हथियारों का इस्तेमाल कर सरकार द्वारा कार्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने का विरोध कर रहे हैं। इसका नतीजा सुरक्षाकर्मी और आदिवासी भुगत रहे हैं। क्योंकि वे ही तो गरीब तबके से होते हैं!
राजनेता और कार्पोरेट घराने के पूंजीपती दूर बैठे गरीबों को आपस में लड़वा रहे हैं। आज स्थिति यह है कि छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सहित कोबरा फोर्स एवं सेना के कई कालमस् ट्रेनिंग के बहाने आदिवासी इलाकों में कैंप किये हुये हैं और आदिवासियों पर कहर बरपाने में लिप्त हैं। वहीं सरकार 11000 अर्ध सैनिक बल और इलाके में भेज रही है। जबकि होना यह चाहिये कि केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ राज्य सरकार और आदिवासियों-माओवादियों में सीधी बातचीत हो और मामलों को बातचीत के जरिये सुलझाया जाये। लेकिन केंद्र व राज्य सरकारें गरीबों की बात सुनने को तैयार ही नहीं हैं और सुरक्षा बलों के जरिये दमन कर रही है, जोकि अनुचित है। हम इस विषय में आगे विस्तार से लिखेंगे।


