हमने पिछले अंक में लिखा था कि जैन समाजबंधु अपने मत-पंथ के पंजीकृत संस्था-सोसायटियों के सदस्य जरूर बनें। हम यहां यह जोडऩा चाहेंगे कि सिर्फ सदस्य बनना ही काफी नहीं है सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय शिरकत करना भी आवश्यक है। व्यवहारिक रूप से ही नहीं संवैधानिक रूप से भी जैन समुदाय अल्पसंख्यक है और अधिकांशत: गरीब और मध्यम वर्ग के अल्पसंख्यक जैन समुदाय को मिलने वाले सरकारी सहयोग से वंचित करवाने की सेठियों की हरकतें बर्दाश्त करने योग्य नहीं हैं।
लेकिन समाजबंधुओं की सक्रिय शिरकत नहीं होने के कारण सामाजिक संस्थाओं पर सेठियों और उनके दुमछल्लों ने कब्जा कर रखा है। नतीजन ये सेठिये और इनके दुमछल्ले सामाजिक संस्थाओं का अपने हित में दुरूपयोग करते हैं। नतीजन आम समाजबंधु अपने हितों की पूर्ति से वंचित रह जाता है।
यह जरूरी है कि आम समाजबंधु अपने समाज की गतिविधियों में सक्रियता से शिरकत करें। वैसे भी आम समाजबंधुओं के गले में पट्टे की तरह लिपटे इन सेठियों को छिटका कर एक तरफ डालने का वक्त आ गया है। आम समाजबंधु अपने सामूहिक हितों के लिये जब सक्रिय हो जायेगा तो सेठियों और दुमछल्लों को अपना निजी स्वार्थ त्याग कर आम समाजबन्धुओं के साथ मिलकर समाज के हित के लिये काम करने के लिये मजबूर होना पड़ेगा।
उपरोक्त स्थितियों में जैन समाज के आम समाजबंधुओं का यह दायित्व बनता है कि वे अपने-अपने समुदाय की पंजीकृत संस्थाओं के सदस्य बने और सदस्य के रूप में अपने दायित्व के निर्वहन में जुट जायें। ताकि अल्पसंख्यक समुदाय के सामुहिक हितों का पोषण हो सके।
अल्पसंख्यक जैन समुदाय के समाजबंधुओं को अपने अधिकारों की प्राप्ती के लिये जैनत्व और उसकी विचारधारा से अलग हटकर दूसरी विचारधारा के समुदायों की आधीनता स्वीकार करने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। अगर जैन समाज के समाज बंधु एकजुट हो जायें और सभी पंथों के समाजबंधु वैचारिक सामजस्यता बढ़ा देते हैं तो हम मजबूत हो जायेंगें और हमारे दिलों से हीन भावना दूर हो जायेगी और किसी अन्य समाज की तरफ मुंह ताकना नहीं पड़ेगा।


