पिछले लगभग दो माह से बार और बैंच की तनातनी के चलते पूरे प्रदेश की न्यायिक प्रक्रिया थमी हुई है। दोनों पक्ष चाहते तो शुरूआती स्तर पर ही मामले को सुलझाया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नये मुद्दे जुड़ते गये और मामला गम्भीर हो गया! दोनों ही पक्ष अब मूल मुद्दे को भुला कर सारे प्रकरण को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर बैठ गये हैं।
अब सरकार को तीसरा पक्ष बनाकर उस पर इस सारे मामले को ढ़ोल कर उसे बलि का बकरा बनाने का प्रयास किया जा रहा है जोकि उचित नहीं है। सरकार इस सारे झंझट में कहीं भी नहीं थी और अपने हित साधन के लिये बार और बैंच का कोई भी पक्ष सरकार को बलि का बकरा बनाता है तो उसे कैसे उचित कहा जा सकता है? झमेला तो वास्तव में बार बौर बैंच के बीच का है और वकीलों की दो माह की एक जुटता ने इसे गम्भीर रूप दे दिया है अपेक्षा यही है कि दोनों पक्ष अपनी हटधर्मिता को त्याग कर एक जाजम पर बैठें और समस्या का समाधान करेंगे।
अब सरकार को तीसरा पक्ष बनाकर उस पर इस सारे मामले को ढ़ोल कर उसे बलि का बकरा बनाने का प्रयास किया जा रहा है जोकि उचित नहीं है। सरकार इस सारे झंझट में कहीं भी नहीं थी और अपने हित साधन के लिये बार और बैंच का कोई भी पक्ष सरकार को बलि का बकरा बनाता है तो उसे कैसे उचित कहा जा सकता है? झमेला तो वास्तव में बार बौर बैंच के बीच का है और वकीलों की दो माह की एक जुटता ने इसे गम्भीर रूप दे दिया है अपेक्षा यही है कि दोनों पक्ष अपनी हटधर्मिता को त्याग कर एक जाजम पर बैठें और समस्या का समाधान करेंगे।


