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श्राविका आश्रम पाठशाला बनाम वीर बालिका स्कूल!-3

हम पिछले दो अंकों में श्री वीर बालिका स्कूल के अतीत के बारे में पाठकों को अवगत करा रहे हैं। अब तो मौखिक ही नहीं लिखित दस्तावेजों से प्रमाणिता होता जा रहा है कि श्राविका आश्रम पाठशाला/श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला/श्री वीर बालिका स्कूल की स्थापना में राजरूप टांक का कोई योगदान नहीं रहा है। इस कन्या पाठशाला की स्थापना विक्रम संवत 1965 में साध्वी मणिश्री के आदेशानुसार एवं उनके मार्गदर्शन में स्व.सेठ बाछुलाल जी बुरड़ एवं उनके पुत्र स्व.सेठ तेजकरण जी बुरड़ ने की और साध्वी मणिश्री के देहान्त के बाद साध्वी पुण्यश्री का मार्गदर्शन इस पाठशाला के संचालन में स्व.सेठ तेजकरण जी बुरड़  को मिलता रहा। जिनने कि अपने जीवन पर्यन्त श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला की आर्थिक जरूरतें पूरी की तथा प्रशासनिक दायित्व निर्वहन किया।
ज्ञातव्य रहे कि राजरूप टांक का जन्म चिड़ावा में विक्रम संवत 1964 में हुआ और वे स्व.छगनलाल टांक की पत्नी गौराबाई के यहां विक्रम संवत 1970 में गोद आये अब कोई समझदार व्यक्ति इस बात से सहमत नहीं होगा कि एक साल या 8 साल का बच्चा श्वेताम्बर समाज की धार्मिक संस्था की स्थापना कैसे कर सकता है और उसे समग्र जैन समाज की छोटी कन्याओं के लिये विस्तारित कर सकता है! दरअसल विक्रम संवत 1965 में साध्वी मणिश्री के आदेशानुसार एवं उनके मार्गदर्शन में सेठ बाछुलाल जी बुरड़ एवं उनके पुत्र सेठ तेजकरण जी बुरड़ द्वारा स्थापित श्राविका आश्रम पाठशाला की स्थापना छोटी विद्यार्थिनी साध्वियों को शास्त्रों के अध्ययन की व्यवस्था हेतु की गई थी और साध्वी पुण्यश्री के जयपुर आगमन से पहले ही स्थापित हो चुकी थी। अत: इस स्कूल की स्थापना में साध्वी मणिश्री का योगदान रहा है न कि साध्वी पुण्यश्री का! साध्वी मणिश्री की मूर्ति आज भी विस्थापित होकर श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ (रजि.) जयपुर के आधीन पड़ी है। जोकि समाज को शर्मसार करने की श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ (रजि.) जयपुर के अध्यक्ष और उनके दुमछल्लों की करतूतों को उजागर करती है।
श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला/वीर बालिका स्कूल की स्थापना में कुशलचंद, विमलचंद सुराना व इनके पूर्वजों का भी कोई योगदान नहीं रहा है। ओसवाल बिरादरी के ज्ञानभंडार को भी श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ (रजि.) जयपुर के पदाधिकारियों ने लगभग नेस्तनाबूद कर दिया है। हालांकि इस ज्ञानभंडार को पुस्तकालय का स्वरूप दे दिया गया है लेकिन भारी तादाद में अलमारियों की चाबियां एक भूतपूर्व संघमंत्री के नियन्त्रण में है और इन अलमारियों में बंद ग्रंथों को नष्ट होने से बचाने की कोई जुगत नहीं बैठाई जा रही है। खरतरगच्छ समाज के आम समाज बंधुओं में चर्चा है कि अध्यक्ष कुशलचंद सुराना और उनके सहयोगियों द्वारा अघोषित रूप से यह प्रयास किये जा रहे हैं कि जयपुर के ओसवाल समाज के पुराने इतिहास को नष्ट कर दिया जाये और अपने परिवारों एवं सहयोगियों को समाज के हितैषी के रूप में थोपा जाये। हम अगले अंकों में इस विषय में विस्तार से आगे भी लिखेंगें। -हीराचंद जैन

 
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