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श्राविका आश्रम पाठशाला बनाम वीर बालिका स्कूल!-2

पिछले अंक में हमने श्राविका आश्रम पाठशाला/श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला/वीर बालिका स्कूल की स्थापना के बारे में हकीकत से अग्रगामी संदेश के पाठकों को रूबरू करवाया था। विक्रम सम्वत् 1965 में साध्वी मणिश्री जी के आदेशानुसार और उनके मार्गदर्शन में स्व.सेठ बाछुलालजी बुरड़ और उनके पुत्र स्व.सेठ तेजकरणजी बुरड़ ने इस शिक्षण संस्था की स्थापना की थी और सम्पूर्ण आर्थिक व्यवस्था की जुम्मेदारी सम्भाली थी। जिसका निर्वहन स्व.सेठ तेजकरणजी बुरड़ अपने जीवन पर्यन्त निभाते रहे थे। जबकि राजरूप टांक का जन्म विक्रम सम्वत् 1964 में चिड़ावा में हुआ था तथा स्व.छगनलालजी की पत्नी गौराबाई ने उन्हें 1970 में गोद लिया था अत: यह कथन पूरी तरह असत्य है कि स्व.राजरूप टांक ने इस संस्था की स्थापना की। विक्रम सम्वत् 1980 में राजरूप टांक का विवाह केवलचंद धांधिया की सुपुत्री श्रीमती सिताब देवी से हुआ था। तब तक का उनका इतिहास बताता है कि वे किसी भी तरह के समाज सेवा के काम में संलिप्त नहीं थे। साध्वी मणिश्री के देहान्त के बाद श्राविका आश्रम/श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला की सम्पूर्ण प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था व्यक्तिगत तौर पर स्व.सेठ तेजकरण जी बुरड़ ने ही सम्भाली और इस हेतु मार्गदर्शन साध्वी पुण्यश्री जी का रहा। विक्रम सम्वत् 1972 में छोटी बालिकाओं के अध्यापन का कार्य भी श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला में प्रारम्भ हो गया था और इस पाठशाला का नाम श्राविका आश्रम पाठशाला से बदल कर श्री जैन श्वेताम्बर श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला कर दिया गया था। उस समय स्व.राजरूप टांक की उम्र मात्र आठ (8) वर्ष रही होगी और जयपुर में गौराबाई धर्मपत्नी स्व. छगनलाल जी टांक के यहां गोद आये दो वर्ष हुये थे। अत: जो लोग स्व.राजरूप टांक को वीर बालिका स्कूल का संस्थापक बताने की बेजा हरकतें कर रहे हैं उनसे हमारा एक ही सवाल है कि क्या सात-आठ साल का एक बालक एक बड़ी महिला शिक्षण संस्था की स्थापना कर सकता है और आर्थिक सहयोग करने की स्थिति में हो सकता है? हमारा आग्रह है कि ऐसे लोगों को अपनी सोच सुधार लेना चाहिये! स्व.राजमल सुराना व इनके वंशजों का भी श्राविका आश्रम कन्या पाठशाला/वीर बालिका स्कूल की स्थापना में कभी कोई योगदान नहीं रहा। हालांकि विमलचंद सुराना वर्तमान में इस संस्था के अध्यक्ष हैं। विक्रम सम्वत् 1972 में पूज्य मुनिवर क्षेमसागरजी, मुनि आनंद सागरजी व वल्लभ सागर जी महाराज का चौमासा जयपुर में था उसमें भी टांक अथवा सुराना परिवार का कोई योगदान नहीं रहा है। हम अधिक विस्तार से अगले अंकों में और भी जानकारियां देंगे।

 
AGRAGAMI SANDESH

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