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जनता से मुंह चुराना भारी पड़ सकता है सत्ताधीशों को!

मंहगाई की मार से त्रस्त अवाम के दु:खदर्दों को नजरन्दाज कर राजस्थान में भाजपानीत सरकार की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे अपना सिंहासन छोड़ कर अब फिर से जिलों का रूख कर रही है।
सत्ता सम्भालने के छह महिने बीत जाने के बाद भी सरकार मंहगाई पर अंकुश लगाने की जुगत तक नहीं बैठा पाई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जमाखोरों-कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों पर सख्त कार्यवाही करने की बात कर रहे हैं लेकिन राजस्थान में वसुन्धरा राजे सरकार जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों  की गर्दन पर हाथ डालने की औकात भी नहीं रखती है!
वसुन्धरा राजे द्वारा राज्य की सत्ता सम्भालने के छह महिने बीत जाने के बाद भी वसुन्धरा राजे प्रशासन ने एक भी जमाखोर, कालाबाजारिये, मुनाफाखोर के खिलाफ कार्यवाही नहीं की है। अब मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने एक नया राग अलापा है कि मेरे पास जादू की छड़ी नहीं है कि जिसे घुमाते ही बदलाव आ जाये! अगर उनके पास जादू की छड़ी नहीं है तो कोई बात नहीं है। अवाम भी नहीं चाहता है कि उनके पास जादू की छड़ी हो! लेकिन वे राज्य की राजधानी में शासन सचिवालय में बैठ कर प्रशासन पर अनुशासन क अंकुश तो लगा सकती हैं। इसके लिये उन्हें जादू की छड़ी की जरूरत नहीं है! जरूरत है अपने अधिनायकवादी-सामन्तवादी सोच में बदलाव की! क्यों वे जिलों में भटकती हैं और राज्य प्रशासन को जिलों में भटका कर पूरे प्रदेश के प्रशासनिक अनुशासन को तितर-बितर कर रहीं हैं। उनके इस सोच का ही नतीजा है कि पूरे राजस्थान में प्रशासनिक अनुशासन चरमरा रहा है और भ्रष्टाचारियों की पो-बारह पच्चीस हो रही है।
अवाम जानता है कि वसुन्धरा राजे प्रशासन के जिलों में जाने के कारण! मैडम जी लाख बहाना बनायें लेकिन इसके पीछे छिपा हुआ ऐजेण्डा है आरएसएस को जिलों में मजबूत करना! अपने पिछले कार्यकाल में मैडम जी ने संघ से पंगा लिया था और फिर मात भी खाई थी। अब वे दुबारा संघ से पंगा लेने के मूड में नहीं लगती हैं और तालमेल के रास्ते तलाश रहीं है।
लेकिन उनका यह कहना कि उन्हें जनता ने पांच साल दिये हैं! अर्थात अवाम की पीड़ा पर मरहम लगाने के लिये उनके पास पांच साल का वक्त पड़ा है। इससे साफ जाहिर है कि अपने वोटों की ताकत से भाजपा को सत्ता में लाकर वसुन्धरा राजे को सत्ता में लाने वाले अवाम को अभी फिलहाल कोई राहत मिलने वाली नहीं है।
मैडम जी को साफ समझ लेना चाहिये कि अपने वोट के अधिकार का भाजपा के पक्ष में उपयोग करके अवाम ने अगर कोई गलती की है तो वह सड़कों  पर उतर कर अपनी गलती को ठीक भी कर सकता है और अगर अवाम सड़कों पर उतरने के लिये मजबूर हुआ तो फिर उन्हें विधानसभा में मिला दो तिहाई बहुमत भी उनके किसी काम का नहीं रहेगा। बेहतर होगा कि वे जिलों में सैर करने के अपनी सामन्तवादी-अधिनायकवादी सोच को विराम दें और सीएमओ में अपनी कुर्सी सम्भाल कर राज्य में प्रशासनिक अनुशासन को सख्ती से मजबूती प्रदान करे! साथ ही एक बात उन्हें संजीदगी से समझ लेनी चाहिये कि पर्दे के पीछे से विपक्ष के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर तीर चलाना भी आनेवाले समय में उनके लिये घातक सिद्ध हो सकता है।

 
AGRAGAMI SANDESH

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