केंद्र की भाजपानीत नरेन्द्र मोदी सरकार ने राज्य सरकारों को सलाह दी है कि वे जमाखोरों और कालाबाजारियों को त्वरित दण्ड दिलवाने के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना करें!
केंद्र की मोदी सरकार की जमाखोरों-कालाबाजारियों को दण्डित करने के लिये राज्य सरकारों को विशेष न्यायालय खोलने की सलाह अपनी जगह पर सही है। लेकिन सवाल उठता है कि न्यायालय में जब जमाखोरों-कालाबाजारियों के मामले पहुंचेंगे तभी तो न्यायालय मामलों की सुनवाई करेंगे! राजस्थान को ही लें, पिछले छह माह से जमाखोरों-कालाबाजारियों पर कार्यवाही का ग्राफ लगभग शून्य पर ही अटका हुआ है। गत छह महिनों में जमाखोरों-कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों पर कार्यवाही करने के बारे में राज्य सरकार ने, खास कर सरकार की मुखिया मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने अपना मानस ही नहीं बनाया है! आम अवाम में पिछले कई महिनों से इस बात की भी जोरदार चर्चा है कि गत विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों, भू-माफियाओं और बिल्डर माफियाओं ने भाजपा के पार्षदों, छुटभैय्या नेताओं और भ्रष्ट नौकरशाही के माध्यम से भाजपा और भाजपा के उम्मीदवारों को मोटा चुनावी चंदा दिया बताया जाता है। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार और उसकी नौकरशाही की हिम्मत ही नहीं हो रही है कि वे इन पर अपना शिकंजा जकड़े!
एक अनुमान के अनुसार राज्य के गोदामों में जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों ने 12 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा की उपभोक्ता जिंसों का भंडारण कर रखा बताया जाता है। व्यावसायिक सूत्रों की माने तो गोदामों में बंद इन उपभोक्ता वस्तुओं की मुनाफाखोरों द्वारा बारी-बारी से बाजार में किल्लत पैदा कर उनकी ऊंचे दामों पर बिक्री कर मोटा मुनाफा कमाया जा रहा है, लेकिन राज्य की भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार जमाखोरों, मुनाफाखोरों, भ्रष्टाचारियों, कालाबाजरियों पर लगाम कसने के लिये हिम्मत ही नहीं जुटा पा रही है। नतीजन खुदरा बाजार में उपभोक्ता जिंसों पर जमकर मुनाफाखोरी-कालाबाजारी हो रही है।
दु:खद् स्थिति यह है कि आज जब मंहगाई और बेरोजगारी से पीडि़त अवाम भ्रष्टाचारियों, जमाखोरों, कालाबाजारियों, भू-माफियाओं और बिल्डर माफियाओं की करतूतों से बेहद आहत है तब राज्य की भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार बीकानेर संभाग में भटक रही है। यह सरकार आगामी जुलाई, 2014 में राज्य विधानसभा के अधिवेशन में व्यस्त रहेगी और उसके बाद उदयपुर जिले और उदयपुर संभाग में चलायमान हो जायेगी। भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार को पिछले छह महिनों में भ्रष्टाचारियों और मुनाफाखोरों की गर्दन नापने की न तो फुर्सत मिली और न ही अगले छह माह तक फुर्सत मिलती नजर आ रही है। हां! इस सरकार को अपने विरोधियों पर शिकंजा जकडऩे के लिये पूरी फुर्सत है!
दु:खद् स्थिति यह भी है कि वामपंथी जनवादी पार्टियों के नेताओं में अहम एवं तुष्टिकरण का जो मुलम्मा चिपक गया है, ये नेता जनहित के मद्देनजर भी इसे नहीं उतारना चाहते हैं। कांग्रेसी अलग ही अपनी जूतमपैजार में व्यस्त हैं। वामपंथी जनवादी पार्टियां हों या फिर कांग्रेस पार्टी! इनके नेताओं की आपसी नूराकुश्ती के चलते आम कार्यकर्ता पस्त होकर अपने-अपने घरों में बैठ गये हैं। उनके समझमें नहीं आ रहा है कि अपनी ही पार्टी को डुबोऊ नेताओं की करतूतों से कैसे निपटा जाये? बाकी सिंगल लीडरशिप वाली पार्टियों का तो ऊपरवाला ही मालिक है!
शर्मनाक स्थिति यह भी है कि चुनावों में शिकस्त खाने के बाद भी विपक्षी राजनैतिक पार्टियों का नेतृत्व अवाम के दु:खदर्दों में एकजुट होने के लिये अवाम के पास जाने से कतरा रहा है। इन विपक्षी पार्टियों की अवाम के बीच अनुपस्थिति से अवाम में भी इनके खिलाफ नाराजगी पनपने की स्थितियां बन रही है। देखिये आगे-आगे होता है क्या?
केंद्र की मोदी सरकार की जमाखोरों-कालाबाजारियों को दण्डित करने के लिये राज्य सरकारों को विशेष न्यायालय खोलने की सलाह अपनी जगह पर सही है। लेकिन सवाल उठता है कि न्यायालय में जब जमाखोरों-कालाबाजारियों के मामले पहुंचेंगे तभी तो न्यायालय मामलों की सुनवाई करेंगे! राजस्थान को ही लें, पिछले छह माह से जमाखोरों-कालाबाजारियों पर कार्यवाही का ग्राफ लगभग शून्य पर ही अटका हुआ है। गत छह महिनों में जमाखोरों-कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों पर कार्यवाही करने के बारे में राज्य सरकार ने, खास कर सरकार की मुखिया मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने अपना मानस ही नहीं बनाया है! आम अवाम में पिछले कई महिनों से इस बात की भी जोरदार चर्चा है कि गत विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों, भू-माफियाओं और बिल्डर माफियाओं ने भाजपा के पार्षदों, छुटभैय्या नेताओं और भ्रष्ट नौकरशाही के माध्यम से भाजपा और भाजपा के उम्मीदवारों को मोटा चुनावी चंदा दिया बताया जाता है। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार और उसकी नौकरशाही की हिम्मत ही नहीं हो रही है कि वे इन पर अपना शिकंजा जकड़े!
एक अनुमान के अनुसार राज्य के गोदामों में जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों ने 12 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा की उपभोक्ता जिंसों का भंडारण कर रखा बताया जाता है। व्यावसायिक सूत्रों की माने तो गोदामों में बंद इन उपभोक्ता वस्तुओं की मुनाफाखोरों द्वारा बारी-बारी से बाजार में किल्लत पैदा कर उनकी ऊंचे दामों पर बिक्री कर मोटा मुनाफा कमाया जा रहा है, लेकिन राज्य की भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार जमाखोरों, मुनाफाखोरों, भ्रष्टाचारियों, कालाबाजरियों पर लगाम कसने के लिये हिम्मत ही नहीं जुटा पा रही है। नतीजन खुदरा बाजार में उपभोक्ता जिंसों पर जमकर मुनाफाखोरी-कालाबाजारी हो रही है।
दु:खद् स्थिति यह है कि आज जब मंहगाई और बेरोजगारी से पीडि़त अवाम भ्रष्टाचारियों, जमाखोरों, कालाबाजारियों, भू-माफियाओं और बिल्डर माफियाओं की करतूतों से बेहद आहत है तब राज्य की भाजपानीत वसुन्धरा राजे सरकार बीकानेर संभाग में भटक रही है। यह सरकार आगामी जुलाई, 2014 में राज्य विधानसभा के अधिवेशन में व्यस्त रहेगी और उसके बाद उदयपुर जिले और उदयपुर संभाग में चलायमान हो जायेगी। भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार को पिछले छह महिनों में भ्रष्टाचारियों और मुनाफाखोरों की गर्दन नापने की न तो फुर्सत मिली और न ही अगले छह माह तक फुर्सत मिलती नजर आ रही है। हां! इस सरकार को अपने विरोधियों पर शिकंजा जकडऩे के लिये पूरी फुर्सत है!
दु:खद् स्थिति यह भी है कि वामपंथी जनवादी पार्टियों के नेताओं में अहम एवं तुष्टिकरण का जो मुलम्मा चिपक गया है, ये नेता जनहित के मद्देनजर भी इसे नहीं उतारना चाहते हैं। कांग्रेसी अलग ही अपनी जूतमपैजार में व्यस्त हैं। वामपंथी जनवादी पार्टियां हों या फिर कांग्रेस पार्टी! इनके नेताओं की आपसी नूराकुश्ती के चलते आम कार्यकर्ता पस्त होकर अपने-अपने घरों में बैठ गये हैं। उनके समझमें नहीं आ रहा है कि अपनी ही पार्टी को डुबोऊ नेताओं की करतूतों से कैसे निपटा जाये? बाकी सिंगल लीडरशिप वाली पार्टियों का तो ऊपरवाला ही मालिक है!
शर्मनाक स्थिति यह भी है कि चुनावों में शिकस्त खाने के बाद भी विपक्षी राजनैतिक पार्टियों का नेतृत्व अवाम के दु:खदर्दों में एकजुट होने के लिये अवाम के पास जाने से कतरा रहा है। इन विपक्षी पार्टियों की अवाम के बीच अनुपस्थिति से अवाम में भी इनके खिलाफ नाराजगी पनपने की स्थितियां बन रही है। देखिये आगे-आगे होता है क्या?


