राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी राजस्थान में कट्टर हिन्दुत्ववादी नात्सीवादी सामन्तवादी राज कायम करने के लिये किस हद तक नीचे गिर सकती है उसका एक शर्मनाक नमूना हम नीचे बयां कर रहे हैं।
केंद्र सरकार ने जैन समुदाय को उसका अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिये पिछली 27 जनवरी, 2014 को गजट नोटिफिकेशन जारी किया था। बकौल केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलात मंत्रालय के सचिव ललित पंवार के, इस गजट नोटिफिकेशन की एक कापी राजस्थान सरकार को तत्काल भिजवा दी गई थी। राजस्थान के अल्पसंख्यक मामलात विभाग के प्रमुख शासन सचिव जी.एस.संधु ने भी फरवरी, 2014 के दूसरे सप्ताह में माना था कि गजट नोटिफिकेशन की प्रति उन्हें मिल गई है और उस पर प्रशासनिक प्रक्रिया चल रही है। लेकिन 05 मार्च को चुनावी आचार संहिता लागू होने के दिन तक वसुन्धरा राजे सरकार ने गजट नोटिफिकेशन पर कार्यवाही को दबाये रखा और कार्यवाही नहीं की। नतीजन वित्तीय वर्ष 2013-14 में जैन समुदाय को अल्पसंख्यक के रूप में मिलने वाले आर्थिक पैकेजों का करोड़ों रूपया आगामी 31 मार्च, 2014 को लैप्स हो जायेगा।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टी की वसुन्धरा राजे सरकार का जैन समुदाय के हितों के खिलाफ कार्य करने का यह पहला मामला नहीं है। वर्ष-2004 में जब वसुन्धरा राजे सत्ता में आई थी, तब भी उनके नेतृत्व वाली सरकार ने ऐसा ही शर्मनाक कारनामा किया था और जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलाने से सम्बन्धित बिल को उन्होंने विधानसभा में पेश कर पास नहीं करवाया था। नतीजन तब भी जैन समुदाय को अपने वाजिब संवैधानिक हकों से वंचित रहना पड़ा था।
ठीक इसके विपरीत नैतिकता को ठोकर मार कर हिन्दुत्ववादियों को फायदा पहुंचाने की नात्सीवादी सामन्तवादी सोच के तहत 1975-77 के दौरान जेल गये भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के आर्थिक रूप से सम्पन्न स्वंयसेवकों और कार्यकर्ताओं को फायदा पहुंचाने के लिये 12 हजार रूपये मासिक पेंशन और 1200 रूपये मेडीकल भत्ता देने के आदेश तुरत-फुरत कर दिये गये। याने कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के आर्थिक रूप से सम्पन्न हिन्दुत्वादी कार्यकर्ताओं पर तो सरकार नोटों की बरसात कर रही है वह भी राजस्थान की गरीब जनता की जेब काट कर! वहीं जैन समुदाय के आर्थिक रूप से कमजोर तबके को उसके अल्पसंख्यक के रूप में मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों से राज्य की वसुन्धरा राजे सरकार जानबूझ कर वंचित कर रही है। जबकि उस पर किसी भी तरह का कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ रहा है। जैन समुदाय के कमजोर तबके को जो कुछ मिलेगा, वह केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत ही मिलेगा।
सवाल यहां यह उठता है कि क्या नात्सीवादी सामन्तवादी और हिन्दुत्ववादी अधिनायकवाद के जरिये भारत गणतंत्र के नागरिक जैन समुदाय को उसके संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित रखा जाना चाहिये या फिर रखा जा रहा है? हमारे इस सवाल का जवाब राजस्थान में भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार को देना ही होगा! अगर भारत गणतंत्र के संवैधानिक प्रावधानों का उलंघन करने की प्रवृति पर अंकुश नहीं लगा तो देश में एक नई क्रान्ति का जन्म हो सकता है जो सत्ताधीशों के मुंह पर एक तमाचा होगा।
केंद्र सरकार ने जैन समुदाय को उसका अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिये पिछली 27 जनवरी, 2014 को गजट नोटिफिकेशन जारी किया था। बकौल केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलात मंत्रालय के सचिव ललित पंवार के, इस गजट नोटिफिकेशन की एक कापी राजस्थान सरकार को तत्काल भिजवा दी गई थी। राजस्थान के अल्पसंख्यक मामलात विभाग के प्रमुख शासन सचिव जी.एस.संधु ने भी फरवरी, 2014 के दूसरे सप्ताह में माना था कि गजट नोटिफिकेशन की प्रति उन्हें मिल गई है और उस पर प्रशासनिक प्रक्रिया चल रही है। लेकिन 05 मार्च को चुनावी आचार संहिता लागू होने के दिन तक वसुन्धरा राजे सरकार ने गजट नोटिफिकेशन पर कार्यवाही को दबाये रखा और कार्यवाही नहीं की। नतीजन वित्तीय वर्ष 2013-14 में जैन समुदाय को अल्पसंख्यक के रूप में मिलने वाले आर्थिक पैकेजों का करोड़ों रूपया आगामी 31 मार्च, 2014 को लैप्स हो जायेगा।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टी की वसुन्धरा राजे सरकार का जैन समुदाय के हितों के खिलाफ कार्य करने का यह पहला मामला नहीं है। वर्ष-2004 में जब वसुन्धरा राजे सत्ता में आई थी, तब भी उनके नेतृत्व वाली सरकार ने ऐसा ही शर्मनाक कारनामा किया था और जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलाने से सम्बन्धित बिल को उन्होंने विधानसभा में पेश कर पास नहीं करवाया था। नतीजन तब भी जैन समुदाय को अपने वाजिब संवैधानिक हकों से वंचित रहना पड़ा था।
ठीक इसके विपरीत नैतिकता को ठोकर मार कर हिन्दुत्ववादियों को फायदा पहुंचाने की नात्सीवादी सामन्तवादी सोच के तहत 1975-77 के दौरान जेल गये भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के आर्थिक रूप से सम्पन्न स्वंयसेवकों और कार्यकर्ताओं को फायदा पहुंचाने के लिये 12 हजार रूपये मासिक पेंशन और 1200 रूपये मेडीकल भत्ता देने के आदेश तुरत-फुरत कर दिये गये। याने कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के आर्थिक रूप से सम्पन्न हिन्दुत्वादी कार्यकर्ताओं पर तो सरकार नोटों की बरसात कर रही है वह भी राजस्थान की गरीब जनता की जेब काट कर! वहीं जैन समुदाय के आर्थिक रूप से कमजोर तबके को उसके अल्पसंख्यक के रूप में मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों से राज्य की वसुन्धरा राजे सरकार जानबूझ कर वंचित कर रही है। जबकि उस पर किसी भी तरह का कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ रहा है। जैन समुदाय के कमजोर तबके को जो कुछ मिलेगा, वह केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत ही मिलेगा।
सवाल यहां यह उठता है कि क्या नात्सीवादी सामन्तवादी और हिन्दुत्ववादी अधिनायकवाद के जरिये भारत गणतंत्र के नागरिक जैन समुदाय को उसके संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित रखा जाना चाहिये या फिर रखा जा रहा है? हमारे इस सवाल का जवाब राजस्थान में भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार को देना ही होगा! अगर भारत गणतंत्र के संवैधानिक प्रावधानों का उलंघन करने की प्रवृति पर अंकुश नहीं लगा तो देश में एक नई क्रान्ति का जन्म हो सकता है जो सत्ताधीशों के मुंह पर एक तमाचा होगा।


