राजस्थान की वसुन्धरा राजे सरकार की साठ दिवसीय कार्ययोजना सत्ताधीशों द्वारा किये गये प्रदेश के भारतीय प्रशासनिक एवं पुलिस सेवा, राजस्थान प्रशासनिक एवं पुलिस सेवा एवं अन्य प्रादेशिक सेवाओं के अफसरों के थोक तबादलों की भेंट चढ़ गई। राजस्थान में वसुन्धरा राजे को मुख्यमंत्री पद की शपथ लिये लगभग तीन महिने पूरे हो चुके हैं, लेकिन इस दौरान भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार लोकसभा चुनावों में भाजपा के मिशन-25 को पूरा करने के एक सूत्रीय काम में जुटी रही। वह भूल गई कि राजस्थान के जिस अवाम ने उसे दो तिहाई से ज्यादा बहुमत के साथ सत्तासीन किया, उस अवाम के दुख:तकलीफों को दूर करना उसकी प्राथमिक नैतिक जुम्मेदारी है। प्रदेश की जनता को बेराजगारी, मंहगाई, कालाबाजारी, जमाखोरी, मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार, अनाचार से छुटकारा दिलाना वसुन्धरा राजे सरकार की पहली प्राथमिकता थी। लेकिन अपनी इस महत्वपूर्ण जुम्मेदारी को निभाने से किनारा करने के लिये साठ दिवसीय कार्ययोजना और भरतपुर सम्भाग मुख्यालय पर मंत्रिमण्डल की बैठक आयोजित की। यही नहीं राजस्थान में लोकसभा चुनावों में मिशन-25 को पूरा करने के लिये प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी के थोक में तबादले कर अवाम की समस्याओं को सुलझाने के बजाय उसकी पीड़ा और दु:ख दर्दों को बढ़ाने की जुर्रत की!
वसुन्धरा राजे द्वारा राजस्थान के मुख्यमंत्री का पद सम्भालने के बाद आज तक जनहित का कोई कार्य प्रदेश में नहीं हुआ है और चूंकि गत 5 मार्च से प्रदेश में लोकसभा चुनावों के संदर्भ में आचार संहिता लागू हो चुकी है। ऐसी स्थिति में सरकार आचार संहिता की आड़ लेकर काम करने से भी सरकार किनारा कर रही है।
प्रदेश में मंहगाई चरम सीमा पार कर चुकी है। जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों और भ्रष्टाचारियों की पो बारह पच्चीस हो रही है। कानून और व्यवस्था की स्थिति बद् से बद्तर होती जा रही है, महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। लेकन वसुन्धरा राजे सरकार के पास अवाम की पीड़ा दूर करने का सिर्फ एक ही इलाज बचा है कि अवाम लोकसभा चुनावों में भाजपा के मिशन-25 को सफल बनायें, इसके बाद ही जनसमस्याओं को हल करने के लिये सरकार अपनी माथापच्ची करेगी। सरकार की इस सोच से साफ होता है कि अगर भाजपा का मिशन-25 फेल हो जाता है तो अवाम को अपने चुनिंदा जनप्रतिनिधियों और उनकी सरकार की सत्ता में तकलीफों से संघर्ष करना ही पड़ेगा।
वैसे अभी भी वक्त है, सरकार चेते और अवाम का थोडा बहुत जो भी हित हो सकता है करें अन्यथा ...!
वसुन्धरा राजे द्वारा राजस्थान के मुख्यमंत्री का पद सम्भालने के बाद आज तक जनहित का कोई कार्य प्रदेश में नहीं हुआ है और चूंकि गत 5 मार्च से प्रदेश में लोकसभा चुनावों के संदर्भ में आचार संहिता लागू हो चुकी है। ऐसी स्थिति में सरकार आचार संहिता की आड़ लेकर काम करने से भी सरकार किनारा कर रही है।
प्रदेश में मंहगाई चरम सीमा पार कर चुकी है। जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों और भ्रष्टाचारियों की पो बारह पच्चीस हो रही है। कानून और व्यवस्था की स्थिति बद् से बद्तर होती जा रही है, महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। लेकन वसुन्धरा राजे सरकार के पास अवाम की पीड़ा दूर करने का सिर्फ एक ही इलाज बचा है कि अवाम लोकसभा चुनावों में भाजपा के मिशन-25 को सफल बनायें, इसके बाद ही जनसमस्याओं को हल करने के लिये सरकार अपनी माथापच्ची करेगी। सरकार की इस सोच से साफ होता है कि अगर भाजपा का मिशन-25 फेल हो जाता है तो अवाम को अपने चुनिंदा जनप्रतिनिधियों और उनकी सरकार की सत्ता में तकलीफों से संघर्ष करना ही पड़ेगा।
वैसे अभी भी वक्त है, सरकार चेते और अवाम का थोडा बहुत जो भी हित हो सकता है करें अन्यथा ...!


