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मीना और मीणा शब्दों पर विवाद बेशर्मी से कहो हम अंग्रेजों के हैं गुलाम!

जी हां! राजस्थान में मीना और मीणा शब्दों को लेकर जो राजनैतिक उठापटक चल रही है, उस पर यही कहा जा सकता है कि गर्व से और बेशर्मी से कहो कि हम अंग्रेजों के गुलाम हैं!
मीना और मीणा शब्दों पर विवाद का मूल कारण अंग्रेजी के (रूश्वश्वहृ्र या रूढ्ढहृ्र) शब्दों को बताया जा रहा है। हम इस सम्बन्ध में न्यायपालिका में विचाराधीन मुद्दों-मामलों में अपना किसी भी तरह का कोई मत व्यक्त नहीं करना चाहेंगे। साथ ही न्यायपालिका में मीना या मीणा शब्दों को लेकर चल रहे प्रकरण/प्रकरणों पर कोई टिप्पणी भी नहीं करना चाहेंगे। क्योंकि यह मामला न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार का है और न्यायपालिका का फैसला सभी को मान्य होना चाहिये!
लेकिन इसके बाद भी हमारा एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि मीना या फिर मीणा समुदाय राजस्थान में आया कहां से? इन की वास्तविक सांस्कृतिक पहिचान का इतिहास क्या है? एक बात तो साफ है कि राजस्थान में मीना और मीणा समुदाय का इतिहास अंग्रेजों के भारत आने के समय काल से हजारों साल पुराना है। महाभारत काल में राजस्थान को मत्स्य प्रदेश के नाम से जाना जाता था। इस ही प्रदेश में मीन समुदाय सांस्कृतिक रूप से पल्लवित हुआ है। मीन समुदाय को ही ब्रिटिश शासन काल में मीना या मीणा शब्दों से संबोधित किया गया है। अब सवाल यहां यह भी उठता है कि महाभारत काल के मत्स्य प्रदेश, जिसे ब्रिटिश काल में राजपूताना और आजादी के बाद राजस्थान के नाम से जाना जाता है, में मीन समुदाय की उत्पत्ति और विकास का पूर्ववर्ती और पश्चात्वर्ती इतिहास क्या है? एक बात साफ है कि मीन शब्द का अर्थ मछली है। यदि मीन शब्द का अर्थ मछली से जुडा है तो स्पष्ट हो जाता है कि मत्स्य प्रदेश में रहने वाले मीन समुदाय का मीन (मछली) से गहरा सम्बन्ध है। हम यहां आपकी जानकारी में ला दें कि राजस्थान की राजधानी जयपुर की बड़ी चौपड़ (माणक चौक चौपड़) के एक खन्दे में बाई जी का मंदिर के नाम से मशहूर मीन माता का मंदिर है। यह मीन माता का मंदिर रियासतकाल का बना हुआ प्राचीन मंदिर है। मीना और मीणा शब्दों पर महाभारत करने वालों से हमारा सवाल है कि ये मीनमाता, जिनका मंदिर जयपुर रियासत के शासनकाल में निर्मित हुआ है, आखिर किस समुदाय की आराध्य देवी है? मीना या फिर मीणा समुदाय की! जहां तक हमारी जानकारी है, मीन माता मीन समुदाय की आराध्य देवी है, कुलमाता है मीना बनाम मीणा समुदाय की। अंग्रेजी के रूढ्ढहृ्र और रूश्वश्वहृ्र शब्दों के चलते इस समुदाय में विभेद नहीं किया जा सकता है। मीणा और मीना एक ही समुदाय है और इनकी एक ही आराध्य देवी और कुलदेवी है मीन माता। हम मीना और मीणा शब्दों पर बाजू चढा कर खम ठोकने वालों से एक सीधा सवाल पूछना चाहते हैं। हिंदी में हीराचन्द को अंगे्रजी मे  (॥ढ्ढक्र्र ष्ट॥्रहृष्ठ) या फिर (॥श्वश्वक्र्र ष्ट॥्रहृष्ठ) लिखा जाता है। अब भाषा के विद्वान बताएं कि अंग्रेजी में लिखे गये ॥ढ्ढक्र्र और ॥श्वश्वक्र्र में कौनसा शब्द गलत है। हिंदी में लिखे गये हीराचंद को अंग्रेजी में दोनों ही तरह से लिखा जा सकता है और दोनों ही स्पैलिंग सही है। ठीक इसही तरह मीना शब्द को अंग्रेजी में रूढ्ढहृ्र या फिर रूश्वश्वहृ्र लिखा जा सकता है और दोनों ही स्पैलिंग सही है। तो फिर विवाद कैसा? जंहा तक हमने समझा है, विवाद की समस्या अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद से जुडी है। जैसा कि हमने ऊपर लिखा है, हिंदी में हीराचंद को अंग्रेजी में (॥ढ्ढक्र्र ष्ट॥्रहृष्ठ)और (॥श्वश्वक्र्र ष्ट॥्रहृष्ठ)  लिखा जा सकता है। लेकिन जब पुन: अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करेंगें तो अर्थ हो जायेगा हीरा चांद। क्योंकि अंग्रेजी के सीएच के बाद ए लगा है जो चंद को चांद बना देता है। इस तरह हिंदी में लिखा हुआ हीराचंद अंग्रेजी में अनुवाद होते हुए जब पुन: हिंदी में अनुवादित हो कर हीरा चांद हो जाता है। यही समस्या मीना और मीणा के अंग्रेजी अनुवाद से वापस हिंदी में अनुवाद से बनी है। लेकिन एक बात निर्विवाद सत्य है कि मीना हो या मीणा, इनका प्राचीन इतिहास हजारों साल पुराना है। मीन माता के अनुयायी इस समुदाय का अस्तित्व तब से भारत में है जब वर्तमान मारवाड़, जोधपुर और जैसलमेर का इलाका समुद्री तट हुआ करता था। इतिहास के पुराने पन्ने पलटे जाएं तो आज का जोधपुर शाकद्वीप कहलाता था और समुद्र इसके चारों और लहरें बिखेरता था। वहीं आज भी मारवाड़ जंकशन के तहसील-उपखंड का नाम खारची है। इसलिये स्पष्ट है कि मीना या फिर मीणा शब्दों से संबोधित किये जाने वाला समुदाय हकीकत में आदिवासी है और इस तथ्य की हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में अंग्रेजों की गुलामी वाली मानसिकता और नात्सीवादी सामंतवादी सोच के लोगों को भारत की प्राचीन संस्कृति और इतिहास को नकारने की प्रवृत्ति को तत्काल त्यागना होगा। उन्हें चाहिये कि वे भारत के प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास का गंभीरता से अध्ययन करें ताकि उनके अतीत की हकीकत से रूबरू हो सकें। सत्ता की प्राप्ति की जोड़ तोड़ में जुटे राजनेताओं को भी समझ लेना चाहिये कि सत्ता की प्राप्ति के लिये समुदायों में फूट डालने के परिणाम अन्तत: दु:खदायी ही होते हैं। क्योंकि सत्ता चलायमान होती है वह किसी एक की बपौती नहीं होती है।

 
AGRAGAMI SANDESH

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