राजस्थान विधानसभा का सत्र 20 फरवरी तक स्थगित कर दिया गया है। सत्र की कार्यवाही स्थगित करने के पीछे कारण है, मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे का सामन्तवादी राठौड़ी रवैया और उस पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का नात्सीवादी चेपा! राजस्थान की सरकार अब से लेकर 19 फरवरी तक भरतपुर संभाग के चार जिलों में ही सिमट कर रह जायेगी। राजस्थान की राजधानी जयपुर जहां से पूरे प्रदेश का राजकाज संचालित होता है, वह 19 फरवरी तक सूना-सूना रहेगा!
वसुन्धरा राजे ने राज्य की सत्ता पर कब्जा जमाने के लिये प्रदेश की जनता से वादों पर वादे किसे थे, लेकिन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के बूते पर सत्तासीन होने के बाद अब उनके सब वादे हवा हवाई हो गये हैं। अपने नात्सीवादी सामन्तवादी राठौड़ी व्यवहार के जरिये वसुन्धरा राजे ने पर्दे के पीछे से विरोधियों के खिलाफ अपने तरकश के तीर छोडऩे शुरू कर दिये हैं। वसुन्धरा राजे ने पिछले दिनों कहा था कि वे बदले की भावना से नहीं बल्कि बदलने के सोच के साथ काम करेंगी! लेकिन बदलने के नाम पर वे सिर्फ अपने चहेते अफसरों को मलाई वाले पदों पर बैठा रही हैं और पिछली अशोक गहलोत सरकार में महत्वपूर्ण पद सम्भालने वाले अफसरों को बर्फ में लगाया रहीं है।
आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की कालाबाजारी को वसुन्धरा राजे सरकार रोकने के लिये कोई प्रयास ही नहीं कर रही है। वसुन्धरा राजे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दो महिने बीत जाने के बाद भी आज तक जमाखोरों-कालाबाजारियों के खिलाफ कार्यवाही करने के बारे में सोचने की जहमत भी नहीं उठाई है। राज्य विधानसभा में राजस्थान माल (उत्पादन, प्रदाय वितरण, व्यापार और वाणिज्य नियन्त्रण) विधेयक 2014 को पारित करवाने के पीछे भी सरकार की जमाखोरों और कालाबाजारियों को पनाह देने की सोच ही सामने आई है और गुलाबचंद कटारिया, घनश्याम तिवाड़ी, राव राजेन्द्र सिंह जैसे दिग्गज भाजपा नेताओं सहित खासी तादाद में सत्तारूढ़ भाजपा विधायकों के विरोध के बावजूद इस कानून को आखीर क्यों पास करवाया गया यह तो मैड़मजी ही सही तरीके से अवाम को समझा सकती है।
सवाल यह भी उठता है कि केंद्र सरकार के आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में उल्लेखित आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की जमाखोरी-कालाबाजारी करने वालों पर क्यों सरकार कार्यवाही नहीं करना चाहती है? अवाम में यह चर्चा जोरों पर है कि जमाखोरों-कालाबाजरियों पर सरकारी हथौड़ा नहीं चलाने के पीछे, भाजपा को इन तत्वों से मिलने वाला मोटा चंदा आड़े आ रहा है। अवाम में चर्चा है कि जमाखोरों-कालाबाजारियों पर अगर कार्यवाही की गई तो ये जमाखोरिये भाजपा को चंदा देना बंद कर देंगे और नतीजन भाजपा को करोड़ों के चंदे से हाथ धोना पड़ेगा।
प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। महिलाओं पर अत्याचारों में बेहताश वृद्धि हो रही है जिसको अंकुशित करने की बजाय वसुन्धरा राजे ने राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष से सारी शासकीय सुविधायें वापस लेकर महिला आयोग को ही पंगु बना दिया है। ताकि उनके राज में महिलाओं पर बढ़ते जा रहे अत्याचारों पर परदा डाला जा सके। स्थिति यह है कि वसुन्धरा राजे सरकार की कथनी और करनी में विरोधाभास तेजी से अवाम के सामने उजागर हो रहा है। खुद भारतीय जनता पार्टी के चुनिंदा जनप्रतिनिधियों में भी मैड़म वसु के व्यवहार से अन्दर ही अन्दर खासी नाराजगी पनप ने लगी है। यह साफ होता जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ समर्थित भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार अब आम अवाम के दु:खदर्दों को दरकिनार कर प्रदेश में नात्सीवादी, सामन्तवादी तानाशाही कायम करने में जुट गई है।
अब देखिये आगे आगे होता है क्या?
वसुन्धरा राजे ने राज्य की सत्ता पर कब्जा जमाने के लिये प्रदेश की जनता से वादों पर वादे किसे थे, लेकिन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के बूते पर सत्तासीन होने के बाद अब उनके सब वादे हवा हवाई हो गये हैं। अपने नात्सीवादी सामन्तवादी राठौड़ी व्यवहार के जरिये वसुन्धरा राजे ने पर्दे के पीछे से विरोधियों के खिलाफ अपने तरकश के तीर छोडऩे शुरू कर दिये हैं। वसुन्धरा राजे ने पिछले दिनों कहा था कि वे बदले की भावना से नहीं बल्कि बदलने के सोच के साथ काम करेंगी! लेकिन बदलने के नाम पर वे सिर्फ अपने चहेते अफसरों को मलाई वाले पदों पर बैठा रही हैं और पिछली अशोक गहलोत सरकार में महत्वपूर्ण पद सम्भालने वाले अफसरों को बर्फ में लगाया रहीं है।
आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की कालाबाजारी को वसुन्धरा राजे सरकार रोकने के लिये कोई प्रयास ही नहीं कर रही है। वसुन्धरा राजे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दो महिने बीत जाने के बाद भी आज तक जमाखोरों-कालाबाजारियों के खिलाफ कार्यवाही करने के बारे में सोचने की जहमत भी नहीं उठाई है। राज्य विधानसभा में राजस्थान माल (उत्पादन, प्रदाय वितरण, व्यापार और वाणिज्य नियन्त्रण) विधेयक 2014 को पारित करवाने के पीछे भी सरकार की जमाखोरों और कालाबाजारियों को पनाह देने की सोच ही सामने आई है और गुलाबचंद कटारिया, घनश्याम तिवाड़ी, राव राजेन्द्र सिंह जैसे दिग्गज भाजपा नेताओं सहित खासी तादाद में सत्तारूढ़ भाजपा विधायकों के विरोध के बावजूद इस कानून को आखीर क्यों पास करवाया गया यह तो मैड़मजी ही सही तरीके से अवाम को समझा सकती है।
सवाल यह भी उठता है कि केंद्र सरकार के आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में उल्लेखित आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की जमाखोरी-कालाबाजारी करने वालों पर क्यों सरकार कार्यवाही नहीं करना चाहती है? अवाम में यह चर्चा जोरों पर है कि जमाखोरों-कालाबाजरियों पर सरकारी हथौड़ा नहीं चलाने के पीछे, भाजपा को इन तत्वों से मिलने वाला मोटा चंदा आड़े आ रहा है। अवाम में चर्चा है कि जमाखोरों-कालाबाजारियों पर अगर कार्यवाही की गई तो ये जमाखोरिये भाजपा को चंदा देना बंद कर देंगे और नतीजन भाजपा को करोड़ों के चंदे से हाथ धोना पड़ेगा।
प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। महिलाओं पर अत्याचारों में बेहताश वृद्धि हो रही है जिसको अंकुशित करने की बजाय वसुन्धरा राजे ने राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष से सारी शासकीय सुविधायें वापस लेकर महिला आयोग को ही पंगु बना दिया है। ताकि उनके राज में महिलाओं पर बढ़ते जा रहे अत्याचारों पर परदा डाला जा सके। स्थिति यह है कि वसुन्धरा राजे सरकार की कथनी और करनी में विरोधाभास तेजी से अवाम के सामने उजागर हो रहा है। खुद भारतीय जनता पार्टी के चुनिंदा जनप्रतिनिधियों में भी मैड़म वसु के व्यवहार से अन्दर ही अन्दर खासी नाराजगी पनप ने लगी है। यह साफ होता जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ समर्थित भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार अब आम अवाम के दु:खदर्दों को दरकिनार कर प्रदेश में नात्सीवादी, सामन्तवादी तानाशाही कायम करने में जुट गई है।
अब देखिये आगे आगे होता है क्या?


