अग्रगामी संदेश हिन्‍दी साप्ताहिक ***** प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित एवं प्रसारित ***** सटीक राजनैतिक विश्लेषण, लोकहित के समाचार, जनसंघर्ष का प्रहरी

डायन गरीबी चुडैल अमीरी!-7

हमने पिछले अंक में डायन गरीबी और चुडैल अमीरी के दो पाटों के बीच पिस रही मानवीय संवेदनाओं के बारे में लिखा था। जैसलमेर जिले में स्थित लोद्रवा किसी जमाने में एक स्वतंत्र गणराज्य रहा है। राजस्थान में यह स्थान जैन शासक वर्ग का अंतिम राज्य रहा है। हम इस राज्य की स्थापना से पतन तक के इतिहास पर फिर कभी चर्चा करेंगे! लेकिन आज लोद्रवा तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध इस लोद्रवा रियासत से पलायन कर जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, ब्यावर और अजमेर होते हुए जयपुर पहुंचे एक प्रतिष्ठित परिवार की विलुप्त सांस्कृतिक, सामाजिक पहिचान के वारे में हमें जितनी जानकारी उपलब्ध है, उसे जाहिर करना कर्तव्य निर्वहन में हम अपना दायीत्व समझते हैं।
लोद्रवा से पलायन कर सेठ हीरालाल जी बुरड़ वर्तमान जैसलमेर पहुंचे। अपना आशियाना वहां बनाया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद परिस्थितिवश उनके पुत्र बाच्छूलाल जी बुरड़ को जयपुर आना पड़ा। बाच्छूलाल जी ने जयपुर रियासत की राजधानी जयपुर में आश्रय स्थल तलाशा और चौकड़ी घाटगेट में एक मकान किराये पर लेकर परिवार के साथ अपने भविष्य को नये सिरे से संवारने में जुट गये।
एक मंजिले इस किराये के मकान में ग्राऊंड फ्लोर पर बने चौबारे में उनकी पत्नी ने एक पुत्ररत्न को जन्म दिया! इस रत्न का नामकरण किया गया और नाम रखा गया तेजकरण! इस ही मकान में तेजकरण बड़े हुए और उनकी पहली शादी हुई। एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म देने के बाद तेजकरण जी की पत्नी का देहान्त हो गया। पारिवारिक एवं रिश्तेदारों के सहयोग से आर्थिक रूप से सुदृढ़ तेजकरण जी की दूसरी शादी स्थानीय वैद परिवार में हुई। जिससे उन्हें एक पुत्र और एवं एक पुत्री हुई। इस ही बीच तेजकरण जी ने वर्तमान में पीतलियों का चौक में किराये का मकान लेकर वहां आवास बना लिया। 12 अप्रेल, 1915 को तेजकरण जी बुरड़ ने बेरी का बास, चौकड़ी घाटगेट के उसी ही मकान को खरीद लिया, जिसके ग्राऊंड फ्लोर में स्थित चौबारे में उन्होंने जन्म लिया था। बाद में सोतियों के मौहल्ले में उन्होंने एक मकान ओर खरीदा।
बेरी का बास वाले मकान में उन्होंने तीन मंजिला निर्माण करवाया और तीसरी मंजिल पर सोने का सुन्दर कारीगरी का काम करवाना प्रारम्भ किया। लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था और युवा तेजकरण जी बुरड़ का 44 वर्ष की आयु में जयपुर में फैली प्लेग की महामारी में देहान्त हो गया। अचानक आई इस मुसीबत में धैर्य और साहस के साथ तेजकरण जी की पत्नी ने अपनी बड़ी बेटी का विवाह किया। लेकिन पति के देहान्त के रूप में आई पीड़ा को वे सहन नहीं कर पाई और अपने तीन अवयस्क पुत्र एवं पुत्री छोड़ कर वे भी अनन्त में विलीन हो गई। एक करोड़पति परिवार की बर्बादी का पहला पड़ाव यहीं से शुरू हुआ।
हम यहां बतायें कि अपने युवा जीवन में तेजकरण जी बुरड़ को अपने ओसवाल समाज के प्रति स्नेह और समर्पण की भावना रही। उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिल कर जयपुर में समग्र ओसवाल समुदाय को एकजुट करने का महति कार्य किया। श्री संघ का नाम रखा गया बिरादरी ओसवालान (ओसवाल समाज)! इसके साथ ही उन्होंने यतिवर लीलाधर जी के मार्गदर्शन में उनकी प्रेरणा से अपने सहयोगियों के साथ मिल कर घी वालों का रास्ता में स्थित उनके उपाश्रय (लीलाधर जी का उपाश्रय) में बच्चों के लिये एक पाठशाला की स्थापना की, जिसका नाम लीलाधर जी की पाठशाला और बाद में श्री जैन श्वेताम्बर पाठशाला तथा अब श्री जैन श्वेताम्बर सी.सैकण्डरी स्कूल है। यही नहीं उन्होंने एक क्रान्तिकारी कदम भी उठाया और ओसवाल बिरादरी (ओसवाल समाज) की महिलाओं को शिक्षित करने हेतु श्राविकाश्रम पाठशाला की स्थापना की। बाद में इसका नाम श्राविकाश्रम कन्या पाठशाला और अब श्री वीर बालिका उच्चतर माध्यमिक विद्यालय है!
पिता के देहान्त के बाद एक करोड़पति पिता की अनाथ सन्तानें, मुन्नीलाल बुरड़ ओर माणकचंद बुरड़ को अपने रिश्तेदारों के परिवारों में अपना बाल्यकाल और युवा अवस्था गुजारनी पड़ी। उनकी शिक्षा नहीं हो पाई और वे ठीक से साक्षर भी नहीं हो पाये। युवा भाइयों में अहम और रिश्तेदारों और गलत लोगों की चुगलखोरी और स्वार्थ के चलते दुराव रहता। एक ही मकान में रह कर वे खाना तक अलग बनाते। अन्तत: उनमें सम्पत्ति का बंटवारा हुआ और बड़े भाई मुन्नीलाल जी बुरड़ सोतियों के मोहल्ले में दूसरे मकान में चले गये और माणकचंदजी बेरी का बास वाले मकान में काबिज हुए।
परिजनों-रिश्तेदारों के सहयोग से माणकचंद बुरड़ का विवाह अलवर के पालावत परिवार में हो गया। रतन कुमारी जी से विवाह के बाद परिवार की स्थिति में स्थायित्व आने की आशा जाग्रह हुई। युगल ने एक पुत्र को जन्म दिया। जिसका नाम वीरेन्द्र रखा गया। नियति को परिवार की खुशहाली मंजूर नहीं थी ओर रतन कुमारी जी का देहान्त हो गया। परिवार उजड़ गया, बेटा अनाथ हो गया। परिजनों की कोशिशों से माणकचंद जी का पुर्नविवाह उत्तर प्रदेश के हाथरस के पास स्थित कोसीकलां के खूबीलाल सकलेचा की पुत्री कपूर कुमार (कप्पो) से हुई। उम्मीद यही थी कि इस परिवार के दिन बहुरेगें। लेकिन सट्टे में रूचि ओर अन्य अनुचित हरकतों के चलते माणकचंद जी ने अपनी पैत्रिक चल सम्पत्ति को खुर्दबुर्द कर दिया। इस ही दौरान मां की गोद भरी और वीरेन्द्र कुमार के बाद शीतल, हीराचंद, महेन्द्र कुमार, पुष्पलता और सुशील कुमार ने इस परिवार में पदार्पण किया।
आर्थिक हालात बिगड़ते गये और एक समय ऐसी स्थिति आ गई कि सट्टे में हारी 1100 रूपये की राशि            
चुकाने के लिये माणकचंद बुरड़ ने पुश्तैनी हवेली को गिरवी रख दिया। सूदखोर बनिया चक्कर लगाने लगा। लेकिन छोटे बेटे हीराचंद ने सूझबूझ और हिम्मत से सूदखोर को पटखनी लगा कर अपनी पुश्तैनी हवेली को बचा लिया। उधर वीरेन्द्र कुमार अपने मामा राजेन्द्र कुमार जैन (पालावत) के पास हिन्दुस्तान मोटर्स उत्तरपाड़ा (हावड़ा) में नौकरी के लिये चले गये।
एक करोड़पति बाप की, जिसने मणो के हिसाब से सोना और क्विंटल के हिसाब से चांदी विरासत में बेटे के लिये छोड़ी उसके बेटे और परिवार की गर्दिश के हालात हम अगले अंकों में साया करेंगे और बतायेंगे खुदगर्जों की जमीनी हकीकत!

 
AGRAGAMI SANDESH

AGRAGAMI SANDESH
AGEAGAMI SANDESH

मुख्‍य पृष्‍ठ | जयपुर संस्‍करण | राज्‍य समाचार | देश समाचार | विज्ञापन दर | सम्‍पर्क