राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टी के नेता डॉ.मुरलीमनोहर जोशी का कहना है कि जैन समुदाय अल्पसंख्यक नहीं है। पंडि़त जी विज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं। जब विज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं तो प्राथमिक स्कूल के बच्चे जितना ज्ञान तो उनको होगा ही। पंडि़त जी बतायें कि सवा सौ करोड़ और पचास लाख में से अल्प संख्या क्या है? सवा सौ करोड़ या फिर पचास लाख! प्राथमिक कक्षा का एक छात्र भी स्पष्ट बता देगा कि सवा सौ करोड़ बहु संख्या है और पचास लाख अल्प संख्या है। अब पंडि़त जी और विज्ञान के भी पण्डित मुरलीमनोहर जोशी को बहुसंख्या (बहुसंख्यक) और अल्प संख्या (अल्पसंख्यक) में फर्क समझ में आ गया होगा। अगर नहीं आया हो तो फिर उन्हें अपनी शिक्षा की डिग्रियां जहां से मिली हैं वहां वापस लौटा देनी चाहिये। जिसे बहु संख्या और अल्प संख्या में फर्क नजर नहीं आ रहा हो तो ऐसे पढ़े लिखे से तो अनपढ़ कहीं ज्यादा सही है!
एक बात ओर, पंडि़त जी और विज्ञान के पंडि़त मुरलीमनोहर जोशी साहब जैन समुदाय में हर सौ पुरूषों में महिलाऐं 84 हैं। याने हर सौ पुरूषों में से 16 पुरूष कुंआरे। मेहरबानी करो पंडि़त जी जैन समाज के कुंआरे युवकों की शादियां करवा दो बहुसंख्यक समुदाय की लड़कियों से! कम से कम ये नये शादी शुदा तो बहुसंख्यकों से जुड़ जायेंगे।
जहां तक अपने आपको बहुसंख्यक समाज आरोपित करने वालों की हकीकत का सवाल है अगर इनके बारे में खुलासा हो गया तो भाग छूटेंगे पंडि़त जी और उनका कथित बहुसंख्यक समाज!
गोएलबल्स की तरह एक ही झूठ को बार-बार दोहराने से झूठ सच नहीं हो सकता है। पंडि़त जी आपका बहुसंख्यक समाज हिब्रू संस्कृति का ही एक हिस्सा है। जैन संस्कृति (जिन संस्कृति) से उसका दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। ज्यादा पोल मत खुलवाओ! फजीहत हो जायेगी आपकी और आपके बहुसंख्यक समाज की! इसलिये पहिले संस्कृतियों के इतिहास का अध्ययन करने की कोशिश करो और फिर जवान खोलो!
एक बात ओर पंडि़त जी को समझ लेना चाहिये कि बहुसंख्यक की नौटंकी कर जैन समुदाय के हकों पर कुण्डली मारना बेहद खतरनाक है। इस तरह की दुधारी करतूतों का नतीजा गम्भीर होता है।
वैसे तेरापंथ आचार्य महाश्रमण जी भी हकीकत से परिचित हैं।
एक बात ओर, पंडि़त जी और विज्ञान के पंडि़त मुरलीमनोहर जोशी साहब जैन समुदाय में हर सौ पुरूषों में महिलाऐं 84 हैं। याने हर सौ पुरूषों में से 16 पुरूष कुंआरे। मेहरबानी करो पंडि़त जी जैन समाज के कुंआरे युवकों की शादियां करवा दो बहुसंख्यक समुदाय की लड़कियों से! कम से कम ये नये शादी शुदा तो बहुसंख्यकों से जुड़ जायेंगे।
जहां तक अपने आपको बहुसंख्यक समाज आरोपित करने वालों की हकीकत का सवाल है अगर इनके बारे में खुलासा हो गया तो भाग छूटेंगे पंडि़त जी और उनका कथित बहुसंख्यक समाज!
गोएलबल्स की तरह एक ही झूठ को बार-बार दोहराने से झूठ सच नहीं हो सकता है। पंडि़त जी आपका बहुसंख्यक समाज हिब्रू संस्कृति का ही एक हिस्सा है। जैन संस्कृति (जिन संस्कृति) से उसका दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। ज्यादा पोल मत खुलवाओ! फजीहत हो जायेगी आपकी और आपके बहुसंख्यक समाज की! इसलिये पहिले संस्कृतियों के इतिहास का अध्ययन करने की कोशिश करो और फिर जवान खोलो!
एक बात ओर पंडि़त जी को समझ लेना चाहिये कि बहुसंख्यक की नौटंकी कर जैन समुदाय के हकों पर कुण्डली मारना बेहद खतरनाक है। इस तरह की दुधारी करतूतों का नतीजा गम्भीर होता है।
वैसे तेरापंथ आचार्य महाश्रमण जी भी हकीकत से परिचित हैं।
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बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक!
महाश्रमण जी जरा गौर फरमाइये अतीत के इतिहास पर!
जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा मिलने के खिलाफ डॉ.मुरलीमनोहर जोशी ने लाडऩूं में आचार्य महाश्रमण के सानिध्य में हुई सभा में जो बेतुकी बकवास की और उस बकवास का ''ओम अर्हम्ÓÓ का उच्चारण कर कथित रूप से समर्थन करने वाले अनुयाइयों को थोड़ा अपने अतीत में भी झांक लेना चाहिये।
आज से लगभग 40 साल पहिले स्वर्गीय आचार्य तुलसी द्वारा लिखित पुस्तक सीता को लेकर बबाल मचा था। मध्यप्रदेश के रायपुर में जैन समुदाय पर बहुसंख्यक आरएसएसपंथी और कट्टरपंथियों के हमले हुए और आचार्य तुलसी को रायपुर से भागना पड़ा था। शायद ओम अर्हम् का घोष करने वाले तेरापंथी यह भूल गये कि जिस बहुसंख्यक समुदाय का उन्हें हिस्सा बताया जा रहा है उस ही बहुसंख्यक समुदाय से जुड़े लोग हमलावर थे, उनके आचार्य और समग्र जैन समुदाय पर हमला करने में! जैन समुदाय के युवकों ने ही आचार्य तुलसी को इन बहुसंख्यक हमलावरों से बचा कर इंदौर में मनोरमागंज स्थित गीता भवन में ठहराया था। वहां से आचार्य तुलसी को कोटा पहुंचाने वाले भी बहादुर जैन युवा ही थे। वहां से आचार्य तुलसी पहुंचे चूरू, तो वहां आचार्य तुलसी और जैन समुदाय पर हमला करने वाले भी ये ही बहुसंख्यक थे। भूल गये क्या? तेरापंथ के आचार्य महाश्रमण और उनके अनुयाई!
हम फिर आचार्य महाश्रमण और उनके तेरापंथ अनुयाइयों को याद दिलादें कि जब पुरी के शंकराचार्य और हिन्दु महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष आचार्य करपात्री जी ने सरदारशहर के ताल मैदान में चार्तुमास किया था, तब भी आचार्य तुलसी को चार्तुमास के दौरान ही सरदारशहर के मोमासर पलायन करना पड़ा था, हालांकि तेरापंथ के अलावा अन्य जैन समुदाय के युवाओं ने आचार्य तुलसी को बहुत समझाया था कि वे सरदारशहर में ही चार्तुमास करें। लेकिन सरदारशहर के साधों के ठिकाने से वे दिन निकलने से पहिले ही मोमासर के लिये पलायन कर गये थे। क्योंकि हकीकत में डर था, इस ही बहुसंख्यक समाज के एक कट्टरपंथी धड़े का!
हम मानते हैं कि तेरापंथी के जो युवा वर्ष 1972 से 1978 के बीच पैदा ही नहीं हुए थे या फिर अपने बाल्यकाल में थे, उन्हें इसकी जानकारी न होगी, ऐसी स्थिति में वे ओम अर्हम का घोष कर सकते हैं। लेकिन ये और अन्य जानकारियां जो फिलहाल हम यहां साया नहीं कर रहे हैं, महाश्रमणजी की जानकारी में तो है ही। वे समझायें अपने अनुयाइयों को बहुसंख्यकों की करतूतों की हकीकत के बारे में साफ-साफ!
एक बात ओर! यह है आचार्य महाश्रमण ही से! पिछले सालों उनके सानिध्य में लाडऩूं को तेरापंथ की राजधानी घोषित किया गया था। जब आचार्य महाश्रमणजी और उनके अनुयाइयों ने लाडऩूं को तेरापंथ की राजधानी घोषित किया है तो फिर वे बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा कैसे हो गये? बतायेंगे तेरापंथ धर्माचार्य और उनके अनुयाई!
जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने से जिन्हें मिर्ची लग रही है, अगर आचार्य महाश्रमण और उनके अनुयाई उनकी मातहती स्वीकारते हैं तो अपने आगे जैन शब्द का उपयोग बंद कर दो हुजूरों, लेकिन जैन समुदाय में फूट डालने की राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की चालों के मोहरे बनने का प्रयास मत करो, इस ही में सभी की भलाई है।
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