राजस्थान विधानसभा का सत्र शुक्रवार को अनिश्चितकाल के लिये स्थगित कर दिया गया। चौदहवीं विधानसभा के इस पहिले सत्र से अवाम को कुछ उम्मीदें थी। सत्तारूढ़ दल ने यह दावा किया था कि विधानसभा के इस पहिले सत्र में राजस्थान माल (उत्पादन, प्रदाय, वितरण, व्यापार और वाणिज्य नियन्त्रण) विधेयक-2014 पारित होने और कानून बनने के बाद राज्य में जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों पर अंकुश लगेगा। हालांकि जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों पर अंकुश लगाने के लिये पहिले से ही आवश्यक उपभोक्ता वस्तु अधिनियम-1955 देश में लागू है।
अब राजस्थान माल (उत्पादन, प्रदाय, वितरण, व्यापार और वाणिज्य नियन्त्रण) विधेयक-2014 और आवश्यक उपभोक्ता वस्तु अधिनियम- 1955, दोनों ही प्रदेश में लागू हो चुके हैं, लेकिन सरकारी स्तर से इन दोनों कानूनों के तहत जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों के खिलाफ कार्यवाही नहीं की जा रही है!
उधर राजस्थान विधानसभा में मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे जिनके पास वित्त विभाग का भी प्रभार है, ने राज्य का अन्तरिम बजट विधानसभा में पेश किया। अपने दस मिनिट के बजट भाषण में भी उन्होंने आम अवाम को किसी भी स्तर पर कोई राहत देने का उल्लेख नहीं किया। उनका भाषण पूरी तरह निराशाजनक रहा।
हां, 14वीं विधानसभा के पहिले सत्र में एक विशेष घटनाक्रम चला। राव राजेन्द्र सिंह ने पिछले मुख्यमंत्री और वित्त विभाग के प्रभारी मंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया जिसे विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने विशेषाधिकार समिति को प्रेषित कर दिया। समिति छह माह में जांच कर रिपोर्ट पेश करेगी। संसदीय इतिहास में अपने किस्म का यह पहिला प्रकरण है।
हम यहां संसदीय परम्पराओं, कार्य संचालन प्रक्रियाओं पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे और न ही करना चाहते हैं। हमारा स्पष्ट सवाल कार्यपालिका-सरकार और सत्तारूढ़ दल से है कि क्या उनके पास इतनासा भी वक्त नहीं है कि वे अवाम को मंहगाई से निजात दिलाने के लिये भ्रष्टाचारियों, जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों की अवाम विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिये सरकारी मशीनरी को सक्रिय कर सकें! अगर आम जनता के दु:खदर्दों को दूर करने के लिये सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की वसुन्धरा राजे सरकार के पास फुर्सत नहीं है तो फिर मानवीय नैतिकता के आधार पर इन्हें सत्ता में बने रहने का कोई अधिकार भी नहीं है।
फिर भी जनविरोधी और विपक्ष के प्रति दुर्भावनापूर्वक सोच के साथ भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार सत्ता में बनी रहती है तो आने वाले समय में अवाम ही धीरे-धीरे कमर कसेगा इस जनविरोधी सरकार को सत्ता से उखाड़ फैंकने के लिये!
अब राजस्थान माल (उत्पादन, प्रदाय, वितरण, व्यापार और वाणिज्य नियन्त्रण) विधेयक-2014 और आवश्यक उपभोक्ता वस्तु अधिनियम- 1955, दोनों ही प्रदेश में लागू हो चुके हैं, लेकिन सरकारी स्तर से इन दोनों कानूनों के तहत जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों के खिलाफ कार्यवाही नहीं की जा रही है!
उधर राजस्थान विधानसभा में मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे जिनके पास वित्त विभाग का भी प्रभार है, ने राज्य का अन्तरिम बजट विधानसभा में पेश किया। अपने दस मिनिट के बजट भाषण में भी उन्होंने आम अवाम को किसी भी स्तर पर कोई राहत देने का उल्लेख नहीं किया। उनका भाषण पूरी तरह निराशाजनक रहा।
हां, 14वीं विधानसभा के पहिले सत्र में एक विशेष घटनाक्रम चला। राव राजेन्द्र सिंह ने पिछले मुख्यमंत्री और वित्त विभाग के प्रभारी मंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया जिसे विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने विशेषाधिकार समिति को प्रेषित कर दिया। समिति छह माह में जांच कर रिपोर्ट पेश करेगी। संसदीय इतिहास में अपने किस्म का यह पहिला प्रकरण है।
हम यहां संसदीय परम्पराओं, कार्य संचालन प्रक्रियाओं पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे और न ही करना चाहते हैं। हमारा स्पष्ट सवाल कार्यपालिका-सरकार और सत्तारूढ़ दल से है कि क्या उनके पास इतनासा भी वक्त नहीं है कि वे अवाम को मंहगाई से निजात दिलाने के लिये भ्रष्टाचारियों, जमाखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों की अवाम विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिये सरकारी मशीनरी को सक्रिय कर सकें! अगर आम जनता के दु:खदर्दों को दूर करने के लिये सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की वसुन्धरा राजे सरकार के पास फुर्सत नहीं है तो फिर मानवीय नैतिकता के आधार पर इन्हें सत्ता में बने रहने का कोई अधिकार भी नहीं है।
फिर भी जनविरोधी और विपक्ष के प्रति दुर्भावनापूर्वक सोच के साथ भाजपा की वसुन्धरा राजे सरकार सत्ता में बनी रहती है तो आने वाले समय में अवाम ही धीरे-धीरे कमर कसेगा इस जनविरोधी सरकार को सत्ता से उखाड़ फैंकने के लिये!


