जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा मिल जाने से बहुसंख्यक हिन्दू समाज के कुछ कट्टर अतिवादी हिन्दुत्ववादी लीडरों को मानो ततैये लग गये हैं। उनका स्यापा सुने तो ऐसा लगेगा कि मानो हिन्दू समुदाय का विघटन हो रहा हो। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत कुछ चुनिंदा जैन संतों के चक्कर लगा रहे हैं, मानो उनको काबू में कर लेने से देशभर का जैन समुदाय उनका मातहत हो जायेगा।
आज जैन समुदाय में जिन संस्कृति (जैन संस्कृति) के इतिहास को जानने-समझने की गहरी जिज्ञासा पैदा हो गई है। जैन समुदाय धर्म की आड़ में पूंजीपतियों के बूते पर किये जा रहे आड़म्बरों से तो परेशान था ही, लेकिन जैन समुदाय के पूंजीपतियों द्वारा अपने लिये आर्थिक फायदे बटोरने के चक्कर में अपने ही समुदाय को हिन्दुओं का ताबेदार बनाने की साजिशें उजागर होने के बाद अब वह अपने अस्तित्व के बारे में भी गम्भीरता से सोचने लगा है। उच्च शिक्षा से जुड़े आईआईएम, आईआईटी जैसे केंद्रीय संस्थानों में प्रवेश हेतु 4.5 प्रतिशत रिजर्वेशन, छोटा-मोटा व्यवसाय करने के लिये 5 लाख रूपये तक का कम ब्याज पर मिलने वाला ऋण, शैक्षणिक संस्थाओं में छात्रवृत्तियां, धार्मिक स्थलों को कानूनी रूप से संरक्षण, जैन समुदाय की शिक्षण संस्थाओं को सरकारी लालफीताशाही से मुक्ति, जैन समुदाय की शिक्षण संस्थाओं में समाज के 50 फीसदी विद्यार्थियों को अनिवार्य: प्रवेश, समुदाय के बेरोजगारों को जैन समाज की संस्थाओं में प्राथमिकता से नियुक्तियां जैसे अन्य लाभ प्राप्त होने के चलते जैन समाज के मध्यम, निम्र मध्यम व गरीब तकबे को राहत मिलने से वह समाज के पूंजीपति शोषक वर्ग के चंगुल से मुक्त होकर खुले आसमां में सांस ले सकेगा!
आज हालात है कि दौलत के बूते पर जैन समुदाय के संस्थानों पर पूंजीपतियों ने कब्जा जमा रखा है। ये निकृष्ट पूंजीपति संस्थानों में अपना कब्जा और रूतबा बरकरार रखने के लिये जैन समाज के शिक्षित बेरोजगारों का हक मार कर इतर समुदायों के लोगों को नियुक्तियां देते हैं ताकि जैन संस्थानों पर उनका और उनके रिश्तेदारों और चाट्टूकारों का शिकंजा अन्य समाजों के कर्मचारियों के बूते पर बना रहे। वहीं जैन समुदाय का शिक्षित युवा वर्ग अपने ही समाज के संस्थानों में रोजगार प्राप्त करने से वंचित रहता है।
जैन समुदाय में स्वार्थी और निकृष्ट पूंजीपति वर्ग के आचरण पर गौर किया जाये तो समुदाय में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक शोध से सम्बन्धित एक भी अकादमी नहीं है। हम श्वेताम्बर समाज को ही लें, इस समाज से जुडी कितनी साहित्य अकादमियां हैं जिनमें शोध होता है! कितनी सांस्कृतिक अकादमियां हैं या फिर कितनी जैन इतिहास से सम्बन्धित अकादमियां हैं जहां जैन संस्कृति के इतिहास, संस्कृति पर शोध होता है, जैन संस्कृति और उसके इतिहास को अक्षुण्ण रखने का कार्य होता है। बतायें श्वेताम्बर समाज के ये निकृष्ट पूंजीपति, जो अपने निजी हितों की पूर्ति के लिये अपने समाज के संस्थानों पर सांप की तरह कुंडली मार कर बैठे हैं।
अब जब जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा मिला है और जैन इतिहास, संस्कृति और साहित्य पर शोध और उन्हें अक्षुण्ण रखने के लिये सरकारी स्तर से शोध अकादमियों के खुलने के लिये रास्ता साफ हो रहा है तो पंूजीपति जैन संस्थानों में अपनी सत्ता को पतन के रास्ते पर जाने की आशंका से चिंतित है। परेशान हैं कुछ साधु-संतों के पोंगापंथ की आड़ में उनके द्वारा फैलाये जा रहे अंधविश्वास की कलई खुलने से!
जैन समुदाय में कुछ साधु-संतों ने साधु-संत शब्दों की आड़ लेकर पूंजीपतियों का सहारा लेकर अपने-अपने मठ बना लिये हैं। नोटों और भोजों का सहारा लेकर अपने पांडाल सजा कर ये साधु संत जैन समुदाय के आमजनों को दिग्भ्रमित करते हैं। लेकिन अब जब जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक सम्बलता मिलेगी तो निश्चित रूप से समाज पर सांप की तरह कुण्डली जमाये बैठे मठाधीशों के नीचे की धरती भी खिसकेगी। समय रहते इन मठाधीशों और पूंजीपतियों को जैन समुदाय में आ रही सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और ऐतिहासिक चेतना के साथ कदमताल करना होगा अन्यथा अपनी उन्नति के लिये संघर्षरत जैन समुदाय के मध्यम, निम्नमध्यम एवं गरीब तकबों से ये अलग-थलग हो जायेंगे और फिर बचेगा इनके पास सिर्फ इनका अतीत! क्योंकि अपने नीहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये वे भविष्य के बारे में सोचने का तो माद्दा ही नहीं रखते हैं!
आज जैन समुदाय में जिन संस्कृति (जैन संस्कृति) के इतिहास को जानने-समझने की गहरी जिज्ञासा पैदा हो गई है। जैन समुदाय धर्म की आड़ में पूंजीपतियों के बूते पर किये जा रहे आड़म्बरों से तो परेशान था ही, लेकिन जैन समुदाय के पूंजीपतियों द्वारा अपने लिये आर्थिक फायदे बटोरने के चक्कर में अपने ही समुदाय को हिन्दुओं का ताबेदार बनाने की साजिशें उजागर होने के बाद अब वह अपने अस्तित्व के बारे में भी गम्भीरता से सोचने लगा है। उच्च शिक्षा से जुड़े आईआईएम, आईआईटी जैसे केंद्रीय संस्थानों में प्रवेश हेतु 4.5 प्रतिशत रिजर्वेशन, छोटा-मोटा व्यवसाय करने के लिये 5 लाख रूपये तक का कम ब्याज पर मिलने वाला ऋण, शैक्षणिक संस्थाओं में छात्रवृत्तियां, धार्मिक स्थलों को कानूनी रूप से संरक्षण, जैन समुदाय की शिक्षण संस्थाओं को सरकारी लालफीताशाही से मुक्ति, जैन समुदाय की शिक्षण संस्थाओं में समाज के 50 फीसदी विद्यार्थियों को अनिवार्य: प्रवेश, समुदाय के बेरोजगारों को जैन समाज की संस्थाओं में प्राथमिकता से नियुक्तियां जैसे अन्य लाभ प्राप्त होने के चलते जैन समाज के मध्यम, निम्र मध्यम व गरीब तकबे को राहत मिलने से वह समाज के पूंजीपति शोषक वर्ग के चंगुल से मुक्त होकर खुले आसमां में सांस ले सकेगा!
आज हालात है कि दौलत के बूते पर जैन समुदाय के संस्थानों पर पूंजीपतियों ने कब्जा जमा रखा है। ये निकृष्ट पूंजीपति संस्थानों में अपना कब्जा और रूतबा बरकरार रखने के लिये जैन समाज के शिक्षित बेरोजगारों का हक मार कर इतर समुदायों के लोगों को नियुक्तियां देते हैं ताकि जैन संस्थानों पर उनका और उनके रिश्तेदारों और चाट्टूकारों का शिकंजा अन्य समाजों के कर्मचारियों के बूते पर बना रहे। वहीं जैन समुदाय का शिक्षित युवा वर्ग अपने ही समाज के संस्थानों में रोजगार प्राप्त करने से वंचित रहता है।
जैन समुदाय में स्वार्थी और निकृष्ट पूंजीपति वर्ग के आचरण पर गौर किया जाये तो समुदाय में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक शोध से सम्बन्धित एक भी अकादमी नहीं है। हम श्वेताम्बर समाज को ही लें, इस समाज से जुडी कितनी साहित्य अकादमियां हैं जिनमें शोध होता है! कितनी सांस्कृतिक अकादमियां हैं या फिर कितनी जैन इतिहास से सम्बन्धित अकादमियां हैं जहां जैन संस्कृति के इतिहास, संस्कृति पर शोध होता है, जैन संस्कृति और उसके इतिहास को अक्षुण्ण रखने का कार्य होता है। बतायें श्वेताम्बर समाज के ये निकृष्ट पूंजीपति, जो अपने निजी हितों की पूर्ति के लिये अपने समाज के संस्थानों पर सांप की तरह कुंडली मार कर बैठे हैं।
अब जब जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा मिला है और जैन इतिहास, संस्कृति और साहित्य पर शोध और उन्हें अक्षुण्ण रखने के लिये सरकारी स्तर से शोध अकादमियों के खुलने के लिये रास्ता साफ हो रहा है तो पंूजीपति जैन संस्थानों में अपनी सत्ता को पतन के रास्ते पर जाने की आशंका से चिंतित है। परेशान हैं कुछ साधु-संतों के पोंगापंथ की आड़ में उनके द्वारा फैलाये जा रहे अंधविश्वास की कलई खुलने से!
जैन समुदाय में कुछ साधु-संतों ने साधु-संत शब्दों की आड़ लेकर पूंजीपतियों का सहारा लेकर अपने-अपने मठ बना लिये हैं। नोटों और भोजों का सहारा लेकर अपने पांडाल सजा कर ये साधु संत जैन समुदाय के आमजनों को दिग्भ्रमित करते हैं। लेकिन अब जब जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक सम्बलता मिलेगी तो निश्चित रूप से समाज पर सांप की तरह कुण्डली जमाये बैठे मठाधीशों के नीचे की धरती भी खिसकेगी। समय रहते इन मठाधीशों और पूंजीपतियों को जैन समुदाय में आ रही सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और ऐतिहासिक चेतना के साथ कदमताल करना होगा अन्यथा अपनी उन्नति के लिये संघर्षरत जैन समुदाय के मध्यम, निम्नमध्यम एवं गरीब तकबों से ये अलग-थलग हो जायेंगे और फिर बचेगा इनके पास सिर्फ इनका अतीत! क्योंकि अपने नीहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये वे भविष्य के बारे में सोचने का तो माद्दा ही नहीं रखते हैं!


