जयपुर (अग्रगामी) श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ जयपुर के तीन साला चुनाव गत 22 दिसम्बर, 2013 को सम्पन्न हो गये। नई कार्यकारिणी गठित हो गई और शपथ ग्रहण समारोह की सम्पन्नता के साथ कार्यभार भी सम्भाल लिया। शपथ ग्रहण करने के बाद नवनिर्वाचित संघमंत्री अनूप पारख ने एक केबल चैनल के रिपोर्टर को कहा था कि उनकी प्राथमिकता मौनबाड़ी (मोहनबाड़ी) में निर्मित राजमल सुराणा अतिथि भवन पर ओर दो मंजिलें निर्मित करवाना हैं। अध्यक्ष कुशलचंद सुराणा ने भी मौनबाड़ी (मोहनबाड़ी) में निर्माण से सम्बन्धित कुछ इस ही तरह के अपने उद्भाव व्यक्त किये थे।
हम इन महानुभावों और खरतरगच्छ संघ जयपुर की कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों खास कर जो पुरानी दो कार्यकारिणियों में भी पदाधिकारी अथवा सदस्य के रूप में रहे हैं, को याद दिला दें कि उपाध्याय सुखसागर जी के शिष्य मुनि कांतिसागर जी के चरणों को शहीद करने के मामले में श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की साधारण सभा में उन्हें पुर्नस्थापित करने का फैसला लिया था। पिछली संघ कार्यकारिणी ने पुन: महान् इतिहासकार, पुरातत्ववेता और उत्तरप्रदेश सरकार तथा भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित आदरणीय मुनि कांतिसागर जी के चरणों को पुन: स्थापित करने का संकल्प भी लिया है।
चूंकि संघ की वर्तमान कार्यकारिणी के अध्यक्ष वरिष्ठ उपाध्यक्ष, संघमंत्री सहित लगभग तीन चौथाई पदाधिकारी एवं सदस्य इस मुद्दे से वाकिफ हैं और समय-समय पर वे मुनि कांतिसागर जी के चरणों को पुन: स्थापित करने का सार्वजनिक आश्वासन देते रहे हैं, लेकिन इस दौरान मौनबाड़ी में राजमल सुराणा अतिथि भवन का निर्माण हो गया, वैवाहिक व अन्य कार्यों के लिये लॉन तैयार हो गये। शर्मनाक स्थिति यह भी रही कि इस लॉन में ही स्थित मुनि कांतिसागर जी के चरण स्थल के अवशेषों को भी विलोपित कर दिया गया।
वैशाख कृष्णा द्वितीय संवत् 1837 को पंच ओसवालों द्वारा किये गये निवेदन पर वैशाख शुक्ला 15 संवत् 1837 में 35 बीघा जमीन बंजड़ जरायत बागवा बाग उक्त भूमि को धार्मिक कार्यों के उपभोग हेतु पंच ओसवाल को दी गई थी। इस भूमि का उपयोग व्यवसायिक व अन्य गैर धार्मिक कार्यों के लिये नहीं किया जा सकता है।
जयपुर ओसवाल समाज के इतिहास में इस मौनबाड़ी (मंदिर-दादाबाड़ी) से जुड़ी इस 25 बीघा जमीन का उपयोग पिछले कुछ सालों पूर्व तक केवल धार्मिक कार्यों के लिये ही होता रहा है। लेकिन जब से सुराणा बन्धुओं का वर्चस्व खरतरगच्छ संघ जयपुर पर हुआ है, वे इसे धार्मिक संस्था की आड़ में व्यवसायिक स्थल बनाने जा रहे हैं। पहिले से ही समाज के साधु-साध्वियों का दाहसंस्कार मौनबाड़ी (मोहनबाड़ी) में ही होता आ रहा है। उनके चरण और प्रतिमायें यहां स्थापित होती रहीं है। लेकिन एक साजिश के तहत चरणबद्ध तरीके से उन्हें गैर कानूनी तरीके से विलोपित कर मौनबाड़ी को व्यावसायिक स्थल का रूप दिये जाने के प्रयास चल रहे हैं।
इस ही क्रम में खरतरगच्छ संघ जयपुर की साधारण सभा के स्पष्ट निर्णय और संघ कार्यकारिणी के स्पष्ट संकल्प के बावजूद महान् क्रांतिकारी इतिहासकार और पुरातत्ववेता मुनि कांतिसागर जी के चरणों की पुर्नस्थापना शर्मनाक तरीके से नहीं की जा रही है। अच्छा यही होगा कि आदरणीय मुनि कांतिसागर जी के चरणों की स्थापना प्राथमिकता के आधार पर तत्काल शुरू हो और मैरिज गार्डन जैसी गतिविधियां तत्काल बंद की जायें।
उम्मीद है कि समाज में आक्रोश उबाल पर आये उससे पहिले ही खरतरगच्छ संघ जयपुर के पदाधिकारी और कार्यकारिणी सदस्य अपनी मदहोंशी को त्यागेगें और साधारण सभा तथा कार्यकारिणी में लिये गये फैसलों को अमलीजामा पहिनाने में इंसानियत, नैतिकता व मानवीय संवेदना के मद्देनजर सक्षमता से कार्य करेंगे। अन्यथा फिर अपनी गैर जुम्मेदारान हरकतों से होने वाले नुकसान के लिये वे खुद दोषी होंगे!
हम इन महानुभावों और खरतरगच्छ संघ जयपुर की कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों खास कर जो पुरानी दो कार्यकारिणियों में भी पदाधिकारी अथवा सदस्य के रूप में रहे हैं, को याद दिला दें कि उपाध्याय सुखसागर जी के शिष्य मुनि कांतिसागर जी के चरणों को शहीद करने के मामले में श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की साधारण सभा में उन्हें पुर्नस्थापित करने का फैसला लिया था। पिछली संघ कार्यकारिणी ने पुन: महान् इतिहासकार, पुरातत्ववेता और उत्तरप्रदेश सरकार तथा भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित आदरणीय मुनि कांतिसागर जी के चरणों को पुन: स्थापित करने का संकल्प भी लिया है।
चूंकि संघ की वर्तमान कार्यकारिणी के अध्यक्ष वरिष्ठ उपाध्यक्ष, संघमंत्री सहित लगभग तीन चौथाई पदाधिकारी एवं सदस्य इस मुद्दे से वाकिफ हैं और समय-समय पर वे मुनि कांतिसागर जी के चरणों को पुन: स्थापित करने का सार्वजनिक आश्वासन देते रहे हैं, लेकिन इस दौरान मौनबाड़ी में राजमल सुराणा अतिथि भवन का निर्माण हो गया, वैवाहिक व अन्य कार्यों के लिये लॉन तैयार हो गये। शर्मनाक स्थिति यह भी रही कि इस लॉन में ही स्थित मुनि कांतिसागर जी के चरण स्थल के अवशेषों को भी विलोपित कर दिया गया।
वैशाख कृष्णा द्वितीय संवत् 1837 को पंच ओसवालों द्वारा किये गये निवेदन पर वैशाख शुक्ला 15 संवत् 1837 में 35 बीघा जमीन बंजड़ जरायत बागवा बाग उक्त भूमि को धार्मिक कार्यों के उपभोग हेतु पंच ओसवाल को दी गई थी। इस भूमि का उपयोग व्यवसायिक व अन्य गैर धार्मिक कार्यों के लिये नहीं किया जा सकता है।
जयपुर ओसवाल समाज के इतिहास में इस मौनबाड़ी (मंदिर-दादाबाड़ी) से जुड़ी इस 25 बीघा जमीन का उपयोग पिछले कुछ सालों पूर्व तक केवल धार्मिक कार्यों के लिये ही होता रहा है। लेकिन जब से सुराणा बन्धुओं का वर्चस्व खरतरगच्छ संघ जयपुर पर हुआ है, वे इसे धार्मिक संस्था की आड़ में व्यवसायिक स्थल बनाने जा रहे हैं। पहिले से ही समाज के साधु-साध्वियों का दाहसंस्कार मौनबाड़ी (मोहनबाड़ी) में ही होता आ रहा है। उनके चरण और प्रतिमायें यहां स्थापित होती रहीं है। लेकिन एक साजिश के तहत चरणबद्ध तरीके से उन्हें गैर कानूनी तरीके से विलोपित कर मौनबाड़ी को व्यावसायिक स्थल का रूप दिये जाने के प्रयास चल रहे हैं।
इस ही क्रम में खरतरगच्छ संघ जयपुर की साधारण सभा के स्पष्ट निर्णय और संघ कार्यकारिणी के स्पष्ट संकल्प के बावजूद महान् क्रांतिकारी इतिहासकार और पुरातत्ववेता मुनि कांतिसागर जी के चरणों की पुर्नस्थापना शर्मनाक तरीके से नहीं की जा रही है। अच्छा यही होगा कि आदरणीय मुनि कांतिसागर जी के चरणों की स्थापना प्राथमिकता के आधार पर तत्काल शुरू हो और मैरिज गार्डन जैसी गतिविधियां तत्काल बंद की जायें।
उम्मीद है कि समाज में आक्रोश उबाल पर आये उससे पहिले ही खरतरगच्छ संघ जयपुर के पदाधिकारी और कार्यकारिणी सदस्य अपनी मदहोंशी को त्यागेगें और साधारण सभा तथा कार्यकारिणी में लिये गये फैसलों को अमलीजामा पहिनाने में इंसानियत, नैतिकता व मानवीय संवेदना के मद्देनजर सक्षमता से कार्य करेंगे। अन्यथा फिर अपनी गैर जुम्मेदारान हरकतों से होने वाले नुकसान के लिये वे खुद दोषी होंगे!


