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जैन समुदाय के साधु-संतों को अपने अमर्यादित व्यवहार को सुधारना होगा!

जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा मिलने से कट्टर हिन्दुत्वादी, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ तथा उस के अग्रिम संगठन भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारी और विचारक बुरी तरह बौखला गये हैं। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत और अन्य संघ के पदाधिकारी और प्रचारक इस समय जैन समुदाय के साधु-सन्यासियों को यह समझाने की कोशिश में जुटे हैं कि वे हिन्दु समाज के अंग हैं ओर कांग्रेस ने जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दे कर हिन्दुओं की एकता को भंग कर दिया है। सोशल मीडिया में तो कट्टर हिन्दुत्वादी बेशर्मी से जैन समाज के प्रबुद्धजनों को पानी पी-पी कर कोस रहे हैं और उनके लिये बंदर शब्द तक का इस्तेमाल कर रहे हैं।
सोशल मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया तथा प्रिंट मीडिया के जरिये कट्टर हिन्दुत्वादियों और आरएसएसपंथियों द्वारा एक साजिशपूर्ण योजना के तहत जैन समुदाय के श्वेताम्बर और दिगम्बर धड़ों और उनके साधु-सन्यासियों को भी अलग-अलग ग्रुपों-धड़ों में विभाजित कर उन्हें हिन्दु समुदाय में विलीन करने का प्रयास किया जा रहा है, जो भारत गणतंत्र के भविष्य के लिये घातक हो सकता है!
दरअसल जैन संस्कृति भारत गणतंत्र की प्राचीनतम संस्कृति है। आदिपुरूष ऋषभदेव के प्रपौत्र भरत चक्रवर्ती के नाम पर इस देश का नाम भारत (भरत) पड़ा। तब से लेकर वर्तमान 15वीं शताब्दी तक इस देश में हिन्दुओं का कोई अस्तित्व ही नहीं था।
दरअसल ईसा पूर्व 34वीं शताब्दी से ईसा पूर्व 8 वीं शताब्दी के बीच मैसोपोटामिया क्षेत्र में हिब्रु संस्कृति अपने विकास के शिखर पर थी। ईसा पूर्व 20वीं शताब्दी तक हिब्रु संस्कृति ने भूमध्यसागर क्षेत्र से इजिशियन सभ्यता वाले क्षेत्र से जुड़े सम्पूर्ण क्षेत्र में अपनी जड़ें जमा ली थी। इस ही दौरान इण्डस रीवर (जोकि तिब्बत से निकलती है और वर्तमान में सिंधु नदी के रूप में अरब सागर में गिरती है) के उत्तर पश्चिम क्षेत्र के हिब्रु संस्कृति के एक धड़े ने बगावत कर हिब्रु संस्कृति का पहला विघटन किया और इण्डस रिलीजन (वर्तमान में हिन्दु धर्म) के रूप में अस्तित्व में आये। इसके बाद हिब्रु संस्कृति के ओर तीन बार विघटन हुए, जिस में क्रिश्चियन रिलीजन (ईसाई धर्म), यहूदी धर्म और इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ। यह ऐतिहासिक तथ्य है जिनसे इन्कार नहीं किया जा सकता है।
भारत में इस दौर में दो ही संस्कृतियां गतिशील रहीं और वे हैं जिन संस्कृति (वर्तमान जैन संस्कृति) और वैदिक संस्कृति! जो आ भी भारत गणतंत्र के 33 प्रदेशों में मौजूद है। इस तरह यह साफ है कि हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और यहूदी (ज्यूडो/ज्युइश) धर्मों से जैन संस्कृति का दूर तक किसी का भी कोई लेनादेना नहीं है। हिन्दु धर्म (इण्डस रिलीजन) के बारे में विस्तृत जानकारी कुछ समय पूर्व मिली बनमाली व पशुपति सहित 2325 इण्डस सीलों में विस्तार से मिलती है।
इसलिये ऐतिहासिक तथ्यों के विश्लेषण से एक बात बिल्कुल साफ है कि जैन संस्कृति ही भारत गणतंत्र की प्राचीनतम संस्कृति है और हिब्रु संस्कृति से टूट कर बने हिन्दू धर्म (इण्डस रिलीजन), मुसलमान (इस्लाम धर्म), यहूदी (ज्यूडो/ज्युइश) धर्मों का जैन संस्कृति से दूर तक का कोई नात नहीं है और इस ऐतिहासिक तथ्य को न तो छुपाया जा सकता है और न ही इसे तोड़ा मरोड़ा जा सकता है।
हमने पिछले अंक में पोल खुलेगी....! में साफ-साफ लिखा था कि गोयेबल्स की तरह झूठ को बार-बार दौहराने से भी झूठ सच नहीं होगा। क्योंकि हिन्दू, मुसलमान, यहूदी और ईसाई हिब्रु संस्कृति का हिस्सा हैं और इनका जिन संस्कृति (जैन संस्कृति) से कोई लेनादेना नहीं है। भारत सहित पूरे विश्व में जातीय हिंसा के इतिहास पर गौर करें तो झगड़े फसाद हिन्दुओं, मुसलमानों (इस्लाम), यहूदियों और ईसाईयों के बीच ही होते हैं जिन संस्कृति और वैदिक संस्कृति में झगड़े-फसादों को कोई स्थान ही नहीं है।
अत: कट्टर हिन्दुत्ववादियों और आरएसएसपंथियों को अपने अतीत के इतिहास पर विस्तृत अध्ययन-मनन करना चाहिये, ताकि वे हकीकत से दो चार हो सकें। फूट डालो और राज करो की हरकतें हिब्रु संस्कृति के अनुयाई ही करते हैं। अन्य संस्कृतियों में इसे निषेध माना गया है।
वक्त आ गया है कि जैन समुदाय के साधु-संतों को भी अब जैन संस्कृति के इतिहास पर अध्ययन शुरू कर देना चाहिये। किसी भी संस्कृति का इतिहास ही उसकी रीढ़ होता है। अगर हमारे साधु-संतों ने जैन संस्कृति के इतिहास (जोकि उनके खुद के अतीत का इतिहास भी है) से दूरी बनाये रखी तो भविष्य में जैन समुदाय की अगली पीढ़ी भी उनसे दूरी बनाने के रास्ते पर चल निकलेगी, नतीजन इन साधु-संतों को पूछने वाला भी जैन समुदाय में कोई नहीं मिलेगा। एक बात ओर! जैन समुदाय के साधु-संतों को अब अपने अमर्यादित व्यवहार को सुधारने की दिशा में भी सख्त कदम उठाने होंगे! अगर ऐसा नहीं किया गया तो इसके भी गम्भीर परिणाम हमें आने वाले समय में देखने और भुगतने होंगे।

 
AGRAGAMI SANDESH

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