डायन गरीबी चुडैल अमीरी के सातवें क्रम में हमने बताया था कि लोद्रवा से पलायन कर जैसलमेर पहुंचे हीरालाल जी बुरड़ के देहान्त के बाद उनके सुपुत्र बाच्छुलाल जी बाड़मेर, जोधपुर, ब्यावर, अजमेर होते हुए जयपुर पहुंचे! चौकडी घाटगेट के एक मकान को अपना आश्रय स्थल बनाया और सेठ तेजकरण जी बुरड़ का इस ही मकान में जन्म हुआ और बड़े हुए। तेजकरण जी ने अन्त: इस मकान को खरीद लिया और इसमें पांच मंजिल (ग्राउण्ड+4) निर्माण करवाया।
तेजकरण जी बुरड़ के सामाजिक सरोकारों के बारे में भी हमने संक्षिप्त में लिखा था। अपने ज्वैलरी के व्यवसाय में निपूर्ण तेजकरण जी ने चौकडी घाटगेट के बेरी का बास और सोतियों के मौहल्ले में दो मकान खरीदे थे ओर इसके अलावा जौंहरी बाजार में ज्वैलरी की दुकान के साथ-साथ अनाज मण्डी में दो दुकानें खरीदी और उनके देहान्त के बाद ये तीनों दुकाने उनके दोनों पुत्रों मुन्नीलालजी बुरड़ और माणकचंद जी बुरड़ के आपसी झगड़ों में बलि चढ़ गई। जौंहरी बाजार वाली दुकान बिक गई वहीं अनाज मण्डी वाली एक दुकान पर लोगों ने जबरिया कब्जा कर हथियाली वहीं दूसरी मकान में तत्कालीन रियासत की म्युनिसिपैल्टी ने आने जाने के लिये दरवाजा निकाल लिया। यह दरवाजा आज भी वर्तमान रूई मण्डी और आलू मण्डी के बीच स्थित है। वैसे इस दरवाजे का कोई उपयोग नहीं है, क्योंकि दरवाजे में कचरे का अम्बर लगा रहता है।
माणकचंद जी ने अपनी पुश्तैनी चल सम्पत्ति का सोना, चांदी व अन्य मूल्यवान ज्वैलरी में से अधिकांश सट्टे और अपने दीगर शौकों के लिये लुटा दिया और जैसा कि हमने पहिले लिखा था कि बेरी का बास वाली हवेली को उन्होंने सट्टे की उधारी चुकाने के लिये मात्र 1100 रूपये में देवडी के मंदिर के पास के ही एक व्यापारी के पास गिरवी रख दिया। हालांकि माणकचंद जी बुरड़ के दूसरे लड़के हीराचंद ही समझदारी के चलते मकान सूदखोर के चंगुल में जाते-जाते बच गया। इस ही दौरान आर्थिक तंगी और पारिवारिक खिचखिच और झगड़ों के बीच माणकचंद जी बुरड़ की नौकरी छोटी चौपड़ स्थित जयपुर को-आपरेटिव स्टोर्स में अनाज वितरण प्रभारी के रूप में लग गई। स्टोर्स के मैनेजर और अन्य कार्यकार्ताओं के सहयोग और सहानुभूति के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी और परिवार में रोजरोज होने वाले क्लेश में भी कमी आई। माणकचंद जी के सबसे बड़े बेटे वीरेन्द्र कुमार ने मैट्रिक की परीक्षा देने की तैयारी शुरू की। वे समाज के ही श्री जैन श्वेमाम्बर हाईस्कूल में शिक्षा गृहण कर रहे थे। उधर दूसरा पुत्र हीराचंद भी इस ही स्कूल में अध्ययनरत रहा।
बावजूद इसके माणकचंद जी की सट्टे की लत नहीं छूटी ओर यह लत अप्रत्यक्ष रूप से परिवार के अन्य सदस्यों के बीच भी फैलने लगी। नतीजन घर में क्लेश, लड़ाई, झगड़े फिर होने लगे। 15 अगस्त, 1950 को जयपुर के ही सवाई मानसिंह अस्पताल में माणकचंद जी बुरड़ की पत्नी कपूर कुमारी ने एक पुत्र को जन्म दिया और लड़के का नामकरण कर सुशील कुमार नाम रखा गया। जिस समय सुशील कुमार का जन्म हुआ वहां परिवार का एक मात्र सदस्य 10 वर्षीय हीराचंद ही मौजूद था। जिसने नर्स के साथ बच्चे को सम्भाला क्योंकि मां कपूर कुमारी को उनके अपेन्डिक्स ऑपरेशन हेतु तैयारी करवाना आवश्यक था। कुछ ही देर में परिवार के अन्य सदस्य और रिश्तेदार अस्पताल में पहुंच गये और उन्होंने जच्चा बच्चा को सम्भाला! मां के अपेन्डिक्स ऑपरेशन और नवजात के परिवार में आगमन से जो जुम्मेदारियां बेटे वीरेन्द्र कुमार, बेटी शीतल और बेटे हीराचंद के कंधों पर आई उसे बड़ी शिद्दत से तीनों ने निभाया।
समय चक्र को तो घूमना ही था। जयपुर को-ऑपरेटिव स्टोर के बन्द होने से माणकचंद जी बुरड़ की नौकरी चली गई वहीं वीरेन्द्र कुमार को अपने मझले मामा राजेन्द्र कुमार (पालावत) की सिफारिश पर उत्तरपाड़ा में बिड़ला समूह के हिन्दुस्तान मोटर्स में नौकरी मिल गई।
होना तो यह चाहिये था कि इस दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरती, लेकिन सट्टेबाजी इस परिवार का पीछा नहीं छोड़ रही थी। कोढ़ में खाज सट्टेबाजी के साथ-साथ खाईवाली ने भी अपना रूतबा माणकचंद जी पर जमा लिया।
हम यहां से चलेंगे वीरेन्द्र कुमार, शीतल कुमारी की शादी और परिवार के विघटनवादी वातावरण की ओर और परिवार के किरदारों की हकीकत से करायेंगे आपको रूबरू!
तेजकरण जी बुरड़ के सामाजिक सरोकारों के बारे में भी हमने संक्षिप्त में लिखा था। अपने ज्वैलरी के व्यवसाय में निपूर्ण तेजकरण जी ने चौकडी घाटगेट के बेरी का बास और सोतियों के मौहल्ले में दो मकान खरीदे थे ओर इसके अलावा जौंहरी बाजार में ज्वैलरी की दुकान के साथ-साथ अनाज मण्डी में दो दुकानें खरीदी और उनके देहान्त के बाद ये तीनों दुकाने उनके दोनों पुत्रों मुन्नीलालजी बुरड़ और माणकचंद जी बुरड़ के आपसी झगड़ों में बलि चढ़ गई। जौंहरी बाजार वाली दुकान बिक गई वहीं अनाज मण्डी वाली एक दुकान पर लोगों ने जबरिया कब्जा कर हथियाली वहीं दूसरी मकान में तत्कालीन रियासत की म्युनिसिपैल्टी ने आने जाने के लिये दरवाजा निकाल लिया। यह दरवाजा आज भी वर्तमान रूई मण्डी और आलू मण्डी के बीच स्थित है। वैसे इस दरवाजे का कोई उपयोग नहीं है, क्योंकि दरवाजे में कचरे का अम्बर लगा रहता है।
माणकचंद जी ने अपनी पुश्तैनी चल सम्पत्ति का सोना, चांदी व अन्य मूल्यवान ज्वैलरी में से अधिकांश सट्टे और अपने दीगर शौकों के लिये लुटा दिया और जैसा कि हमने पहिले लिखा था कि बेरी का बास वाली हवेली को उन्होंने सट्टे की उधारी चुकाने के लिये मात्र 1100 रूपये में देवडी के मंदिर के पास के ही एक व्यापारी के पास गिरवी रख दिया। हालांकि माणकचंद जी बुरड़ के दूसरे लड़के हीराचंद ही समझदारी के चलते मकान सूदखोर के चंगुल में जाते-जाते बच गया। इस ही दौरान आर्थिक तंगी और पारिवारिक खिचखिच और झगड़ों के बीच माणकचंद जी बुरड़ की नौकरी छोटी चौपड़ स्थित जयपुर को-आपरेटिव स्टोर्स में अनाज वितरण प्रभारी के रूप में लग गई। स्टोर्स के मैनेजर और अन्य कार्यकार्ताओं के सहयोग और सहानुभूति के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी और परिवार में रोजरोज होने वाले क्लेश में भी कमी आई। माणकचंद जी के सबसे बड़े बेटे वीरेन्द्र कुमार ने मैट्रिक की परीक्षा देने की तैयारी शुरू की। वे समाज के ही श्री जैन श्वेमाम्बर हाईस्कूल में शिक्षा गृहण कर रहे थे। उधर दूसरा पुत्र हीराचंद भी इस ही स्कूल में अध्ययनरत रहा।
बावजूद इसके माणकचंद जी की सट्टे की लत नहीं छूटी ओर यह लत अप्रत्यक्ष रूप से परिवार के अन्य सदस्यों के बीच भी फैलने लगी। नतीजन घर में क्लेश, लड़ाई, झगड़े फिर होने लगे। 15 अगस्त, 1950 को जयपुर के ही सवाई मानसिंह अस्पताल में माणकचंद जी बुरड़ की पत्नी कपूर कुमारी ने एक पुत्र को जन्म दिया और लड़के का नामकरण कर सुशील कुमार नाम रखा गया। जिस समय सुशील कुमार का जन्म हुआ वहां परिवार का एक मात्र सदस्य 10 वर्षीय हीराचंद ही मौजूद था। जिसने नर्स के साथ बच्चे को सम्भाला क्योंकि मां कपूर कुमारी को उनके अपेन्डिक्स ऑपरेशन हेतु तैयारी करवाना आवश्यक था। कुछ ही देर में परिवार के अन्य सदस्य और रिश्तेदार अस्पताल में पहुंच गये और उन्होंने जच्चा बच्चा को सम्भाला! मां के अपेन्डिक्स ऑपरेशन और नवजात के परिवार में आगमन से जो जुम्मेदारियां बेटे वीरेन्द्र कुमार, बेटी शीतल और बेटे हीराचंद के कंधों पर आई उसे बड़ी शिद्दत से तीनों ने निभाया।
समय चक्र को तो घूमना ही था। जयपुर को-ऑपरेटिव स्टोर के बन्द होने से माणकचंद जी बुरड़ की नौकरी चली गई वहीं वीरेन्द्र कुमार को अपने मझले मामा राजेन्द्र कुमार (पालावत) की सिफारिश पर उत्तरपाड़ा में बिड़ला समूह के हिन्दुस्तान मोटर्स में नौकरी मिल गई।
होना तो यह चाहिये था कि इस दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरती, लेकिन सट्टेबाजी इस परिवार का पीछा नहीं छोड़ रही थी। कोढ़ में खाज सट्टेबाजी के साथ-साथ खाईवाली ने भी अपना रूतबा माणकचंद जी पर जमा लिया।
हम यहां से चलेंगे वीरेन्द्र कुमार, शीतल कुमारी की शादी और परिवार के विघटनवादी वातावरण की ओर और परिवार के किरदारों की हकीकत से करायेंगे आपको रूबरू!


