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डायन गरीबी चुडैल अमीरी!-6

हमने पिछले अंक में डायन गरीबी और चुडैल अमीरी के दो पाटों के बीच पिस रही मानवीय संवेदनाओं के बारे में लिखा था। इन्सानियत को तारतार करने वाले इस कथानक में कुछ सवाल ओर जुड़ते जा रहे हैं।
भारत गणतंत्र में देश की जनसंख्या के अनुपात में जैन समुदाय अल्प संख्या में है। व्यवहारिक रूप से तो देश में जैन समुदाय अल्पसंख्यक ही था, लेकिन देश के संविधान की रूह में पिछले दिनों ही भारत सरकार ने जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा वैधानिक रूप से अधिसूचित किया है!
ठीक इस ही तरह जैन समुदाय के परिवारों में भी कुछ भाई अमीर होते हैं और कुछ गरीब या मध्यम वर्ग के होते हैं। यह दायीत्व परिवार के बहुसंख्यक अमीर भाइयों का होता है कि वे अपने आर्थिक रूप से कमजोर भाई या भाईयों को सम्बल प्रदान कर उन्हें अपने आर्थिक स्तर तक लाने की कोशिश करें और उनकी प्रतिभा का परिवार कल्याण में उपयोग करें।
लेकिन पिछले अंकों में हमने जिस परिवार की कहानी साया की है, उस परिवार के धनाढ्य भाई बहिन अपनी दौलत के बूते पर अपने ही एक भाई और उसके परिवार को मटियामेट करने पर तुले हैं, जिसने उनकी पैत्रिक सम्पत्ति को दो बार सूदखोरों से बचाया! कारण एक ही है कि वे पैत्रिक हवेली पर कब्जा कर उसको तोड़ कर वहां कॉमर्शियल काम्प्लेक्स बनाना चाहते हैं ताकि उन्हें करोड़ों की मोटी कमाई हो। नैतिकता, मानवीय संवेदनाऐं और पारिवारिक सद्भावना जाये भाड़ में! हम पिछले दिनों सम्बोधि धाम से मिले एक ई-मेल में संत ललितप्रभ सागर एवं चंद्रप्रभ सागर के रिश्तों के बारे में लिखा था। संत चंद्रप्रभ सागर कहते हैं कि संत ललितप्रभ सागर युग पुरूष, कर्मयोगी, शांत-मनीषी और सामाजिक समरसता के सूत्रधार संत हैं। ये मेरे सगे छोटे भाई हैं। हमने एक और जहां माता-पिता की सेवा के लिए सन्यास लेकर श्रवणकुमार का धर्म निभाया वहीं दूसरी ओर राम-लक्ष्मण की तरह भ्रातृत्व प्रेम को जीकर रामायण को पुर्नजीवित किया। हमारे लिए समाज बाद में है, मां-बाप पहले हैं। संत कितना ही बड़ा क्यों न हो, पर वह मां-बाप से कभी बड़ा नहीं हो सकता। जो बेटे मां-बाप की सेवा करते हैं वे सपूत हैं बाकी सब क्या हैं वे आप स्वंय ही निर्णय करें।
मुनि चंद्रप्रभ सागर के भाई और परिवार के प्रति सोच के ठीक विपरीत धन के मद में मदहोंश ये बड़े सौतेले भाई और छोटा करोड़पति किस गैर जुम्मेदारान तरीके से अपने ही परिवार को नेस्तनाबूद करने पर तुला है यह निकृष्ट कृत्य मनन करने योग्य है।
हमने पिछली बार बताया था कि सबसे बड़े सौतेले भाई को हवेली में वह कमरा चाहिये जहां से उनके माता-पिता की अर्थी निकली थी क्योंकि अब वे उस कमरे में अपनी अर्धांगनी को रखना चाहते हैं। हालांकि पिछले पचास साल से ये सौतेले भाई साहब इनकी अर्धांगनी और उनका परिवार इस हवेली में कभी नहीं रहा। इनकी तीनों संतानों ने इस हवेली में जन्म नहीं लिया और जन्म से लेकर आज तक इस हवेली में रहे भी नहीं! लेकिन अब ये चाहते हैं कि इस हवेली और इससे सलग्र मुशर्तका जायदाद पर एक कॉमर्शियल काम्प्लेक्स बना कर करोड़ों की कमाई कर लें। चाहे इसके लिये अपने भाई और अन्य परिजनों को बलि का बकरा बनाना पड़े! इस ही क्रम में शर्मनाक स्थिति यह है कि इन सौतेले भाई और परिवारजनों ने इस हवेली को गिरवी रख कर शामीलात में अपने परिवार के कर्ता के नाम से हवेली के पास ही एक मकान खरीदा! लेकिन बाद में सबसे छोटे भाई ने परिवार के कर्ता से उस मुशर्तका भवन को अपने नाम बेचान करवा कर गैरकानूनी रूप से सारे नैतिक आचारण को तिलांजली देकर कब्जा कर लिया! क्या बेटा बाप से परिवार की मुशर्तका सम्पत्ति खरीद सकता है? यह सामाजिक रूप से पूरे श्वेताम्बर समाज के मठाधीशों को सोचने-समझने का मुद्दा है।
इस लालची सौतेले बड़े भाई साहब और छोटे भाई और इनकी कोटा वाली बहिना की एक शर्मनाक करतूत ही हकीकत भी हम बयां कर दें! अपनी माता का देहान्त होने के तत्काल बाद इन्होंने चल सम्पत्ति पर संपौली कुंडली जमाई और इस परिवार की सारी चल सम्पत्ति जिसमें सोना, चांदी, दुर्लभ कलाकृतियों व सामान के साथ-साथ बर्तन एवं अन्य महत्वपूर्ण एवं कीमती सामान भी शामिल है, सौतेले भाई साहब की मारूती वैन में भर कर ले गये। अब ये ही बता सकते हैं कि इन्होंने क्या उस सामान का आपस मे बंटवारा किया या फिर दिल्ली के बाजारों में बेच दिया!
सौलेते भाई साहब को उनकी गर्दिश के दिनों में इनके इस ही छोटे भाई की काली करतूतों से बचाने वाले भाई को मटियामेट करने पर तुले सौतेले भाई साहब और उनके छोटे भाई और बहिन की करतूतों के अम्बार का विस्तृत विवरण हम आगे लिखेंगे।

 
AGRAGAMI SANDESH

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