आखीरकार सीपीआई (एम) के राष्ट्रीय महासचिव प्रकाश कारात ने साफ-साफ मान ही लिया कि वाम पार्टियों की शहरी क्षेत्रों में पकड़ नहीं है। लेकिन हकीकत इससे भी आगे कुछ ओर ही है। केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा राज्यों को छोड़ दें तो पूरे देश में चाहे शहरी क्षेत्र हो या फिर चाहे ग्रामीण क्षेत्र, वामपंथी पार्टियों का कोई खास वजूद नहीं है। इस असलियत को नजरन्दाज करना उस खरगोश की तरह ही होगा, जो अपनी मौत को पास आता देख आंख मंूद लेता है।
आज से डेढ़ दशक पहिले तक वामपंथी पार्टियां एकजुट होकर अवाम के हर दु:खदर्द में उनकी हमराह होती रही थी। इन पार्टियों के अग्रिम संगठन अवाम की हर छोटी-बड़ी समस्या को लेकर अफसरों/हुक्कामों के दफ्तरों-अवासों पर हंगामेदार धरने और पार्टी स्तर पर स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक बंद-प्रदर्शन का आयोजन कर हुक्कमों पर जनता के दु:खदर्द को दूर करने का दबाव बनाती थी। ट्रेड यूनियनें हों या फिर अन्य मजदूर किसान संगठन, इनके ज्यादातर सदस्यों के हाथ में लाल झण्डे होते थे। हमें याद है कि वामपंथी पार्टियों के धरने-प्रदर्शन, बंद और अन्य आन्दोलनों के दौरान पूरा प्रशासन चाक चौबंद रहता था और सरकारी स्तर पर वामंपथी जनवादी पार्टी के जरिये उठाई गई अवाम की आवाज की सुनवाई होती थी।
लेकिन आज स्थिति ठीक उलट है। वामपंथी जनवादी पार्टियां अवाम से कटती ही जा रही है। इन पार्टियों के ज्यादातर धरने-प्रदर्शन प्रतीकात्मक होते जा रहे हैं। जहां तक होता है, प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपनी बात मीडिया के आगे रख देते हैं या फिर कभी-कभी धरने प्रदर्शन और प्रतिकात्मक गिरफ्तारियां देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। इतना भर करने के लिये भी इन पार्टियों के नेताओं में वर्चस्व का द्वन्द रहता है। एक पार्टी के नेता अपने आप को दादा, तो दूसरी के नेता अपने आपको सुपरदादा साबित करने में जुटे रहते हैं। वहीं पार्टी के अंदर भी नेताओं में अन्त: द्वन्द की कोई सीमा नहीं है। नतीजन इन पार्टियों के प्रति अवाम भी दु:खी होकर बेरूखी अपनाने के लिये मजबूर हो गया है। राजस्थान को ही लें, पिछले विधानसभा चुनावों में वामपंथी पार्टियों ने अपनी ही साथी वाम जनवादी पार्टियों को दरकिनार कर लगभग एक दर्जन व्यक्तिवादी पार्टियों के साथ गठजोड़ किया। नतीजा क्या निकला, ढाक के तीन पात! जो था, उसे भी गंवा बैठे। आज स्थिति यह है कि इन पार्टियों में आका बन कर बैठे मठाधीश अपना सुट्टा सेकने के लिये अपनी ही पार्टियों को रसातल में ले जा रहे हैं।
उधर ऑल इण्डिया फारवर्ड ब्लाक की केंद्रीय समिति ने अपनी पिछली बैठक में सभी वामपंथी जनवादी पार्टियों से आग्रह किया है कि वे आगामी लोकसभा चुनाव कामन मैनीफैैस्टो और रणनीति के तहत पूरे देश में एकजुट होकर लड़ें। पार्टी ने सवाल उठाया है कि जब पूरे देश में वामपंथी जनवादी पार्टियां सरकार की अवाम विरोधी नीतियों के खिलाफ एकजूट हो कर संघर्ष कर सकती है तो वे एकजुट होकर आगामी लोकसभा चुनाव एक साथ एकमत होकर व एकजुट होकर क्यों नहीं लड़ सकती है?
वामपंथी जनवादी पार्टियों के प्रमुखों को यह भी गम्भीरता से सोचना और तैय करना होगा कि जब वे राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष में एकजुटता दिखाते हैं तो चुनावों में और बाकी वक्त क्यों अलग-अलग राग अलापते हैं? ऐसा करने से वामपंथी जनवादी एकता और इन पार्टियों के वजूद के मामले में अवाम के समक्ष गलत संदेश जाता है। जिसका फायदा भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस एवं अन्य व्यक्तिपरक राजनैतिक पार्टियां उठा रही हैं। हमारा साफ-साफ मानना है कि अगर वामपंथी-जनवादी पार्टियां आगामी लोकसभा चुनाव एकजुट होकर लड़ती है, तो निश्चित रूप से उन्हें अवाम का अच्छा खासा समर्थन निश्चित रूप से मिलेगा।
आज से डेढ़ दशक पहिले तक वामपंथी पार्टियां एकजुट होकर अवाम के हर दु:खदर्द में उनकी हमराह होती रही थी। इन पार्टियों के अग्रिम संगठन अवाम की हर छोटी-बड़ी समस्या को लेकर अफसरों/हुक्कामों के दफ्तरों-अवासों पर हंगामेदार धरने और पार्टी स्तर पर स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक बंद-प्रदर्शन का आयोजन कर हुक्कमों पर जनता के दु:खदर्द को दूर करने का दबाव बनाती थी। ट्रेड यूनियनें हों या फिर अन्य मजदूर किसान संगठन, इनके ज्यादातर सदस्यों के हाथ में लाल झण्डे होते थे। हमें याद है कि वामपंथी पार्टियों के धरने-प्रदर्शन, बंद और अन्य आन्दोलनों के दौरान पूरा प्रशासन चाक चौबंद रहता था और सरकारी स्तर पर वामंपथी जनवादी पार्टी के जरिये उठाई गई अवाम की आवाज की सुनवाई होती थी।
लेकिन आज स्थिति ठीक उलट है। वामपंथी जनवादी पार्टियां अवाम से कटती ही जा रही है। इन पार्टियों के ज्यादातर धरने-प्रदर्शन प्रतीकात्मक होते जा रहे हैं। जहां तक होता है, प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपनी बात मीडिया के आगे रख देते हैं या फिर कभी-कभी धरने प्रदर्शन और प्रतिकात्मक गिरफ्तारियां देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। इतना भर करने के लिये भी इन पार्टियों के नेताओं में वर्चस्व का द्वन्द रहता है। एक पार्टी के नेता अपने आप को दादा, तो दूसरी के नेता अपने आपको सुपरदादा साबित करने में जुटे रहते हैं। वहीं पार्टी के अंदर भी नेताओं में अन्त: द्वन्द की कोई सीमा नहीं है। नतीजन इन पार्टियों के प्रति अवाम भी दु:खी होकर बेरूखी अपनाने के लिये मजबूर हो गया है। राजस्थान को ही लें, पिछले विधानसभा चुनावों में वामपंथी पार्टियों ने अपनी ही साथी वाम जनवादी पार्टियों को दरकिनार कर लगभग एक दर्जन व्यक्तिवादी पार्टियों के साथ गठजोड़ किया। नतीजा क्या निकला, ढाक के तीन पात! जो था, उसे भी गंवा बैठे। आज स्थिति यह है कि इन पार्टियों में आका बन कर बैठे मठाधीश अपना सुट्टा सेकने के लिये अपनी ही पार्टियों को रसातल में ले जा रहे हैं।
उधर ऑल इण्डिया फारवर्ड ब्लाक की केंद्रीय समिति ने अपनी पिछली बैठक में सभी वामपंथी जनवादी पार्टियों से आग्रह किया है कि वे आगामी लोकसभा चुनाव कामन मैनीफैैस्टो और रणनीति के तहत पूरे देश में एकजुट होकर लड़ें। पार्टी ने सवाल उठाया है कि जब पूरे देश में वामपंथी जनवादी पार्टियां सरकार की अवाम विरोधी नीतियों के खिलाफ एकजूट हो कर संघर्ष कर सकती है तो वे एकजुट होकर आगामी लोकसभा चुनाव एक साथ एकमत होकर व एकजुट होकर क्यों नहीं लड़ सकती है?
वामपंथी जनवादी पार्टियों के प्रमुखों को यह भी गम्भीरता से सोचना और तैय करना होगा कि जब वे राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष में एकजुटता दिखाते हैं तो चुनावों में और बाकी वक्त क्यों अलग-अलग राग अलापते हैं? ऐसा करने से वामपंथी जनवादी एकता और इन पार्टियों के वजूद के मामले में अवाम के समक्ष गलत संदेश जाता है। जिसका फायदा भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस एवं अन्य व्यक्तिपरक राजनैतिक पार्टियां उठा रही हैं। हमारा साफ-साफ मानना है कि अगर वामपंथी-जनवादी पार्टियां आगामी लोकसभा चुनाव एकजुट होकर लड़ती है, तो निश्चित रूप से उन्हें अवाम का अच्छा खासा समर्थन निश्चित रूप से मिलेगा।


