नई दिल्ली/जयपुर (अग्रगामी) जब जम्मू काश्मीर, अरूणाचल, नागालैण्ड, मिजोरम में हिन्दू अल्पसंख्यक की श्रेणी में आ सकते हैं तो जैन समुदाय को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का संवैधानिक अधिकार देने में केंद्र की डॉ.मनमोहन सिंह सरकार क्यों हिचकिचा रही है? इस सरकार की समझ में यह क्यों नहीं आ रहा है कि जब देश में बौद्ध समुदाय को अल्पसंख्यक मान लिया गया है तो फिर जैन समुदय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा क्यों नहीं दिया जा रह है? बौद्ध समुदाय तो जैन संस्कृति से अलग हुआ मत (समुदाय) है। पिछले दिनों गौतमबुद्ध से जुड़े कुछ ऐतिहासिक तथ्य सामने आये हैं, जिनसे इतिहास में उनकी उपस्थिति काल जैन समुदय के 23वें तीर्थंकर पाश्र्व वीरभट्ट के समकालीन होने की सम्भावना को बल मिला है।
खरतरगच्छ जन चेतना मंच ने सवाल उठाया है कि आज देश में जैन संस्कृति के अनुयाइयों की संख्या मात्र पचास लाख के अंदर सिमट गई है और देश के 33 प्रदेशों में बिखरा जैन समुदाय देश की आबादी का आधा प्रतिशत (0.4 प्रतिशत) भी नहीं बचा है, ऐसे में जैन समुदाय के पूंजीपति-धनाढ्य वर्ग जैन संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिये अपने समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने की मुहिम में एकजुट क्यों नहीं हो रहा है? क्यों इस मुहिम को परवान चढऩे में अडंगा बना हुआ है?
खरतरगच्छ जन चेतना मंच ने यह सवाल भी किया है कि देश में जाना-माना उद्योग घराना टाटा समूह अल्पसंख्यक पारसी समुदाय में आता है, इस ही तरह अन्य उद्योग घराना गोदरेज समूह भी पारसी समुदाय से ही आता है, वहीं अजीम प्रेमजी अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय से हैं और अल्पसंख्यक सिक्ख समुदाय में भी दर्जनों अरबपति उद्योग समूह हैं, जो राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने आप को अल्पसंख्यक कहते और कहलवाते हैं। ऐसी स्थिति में जैन समुदाय के पूंजीपति अपने आपको अल्पसंख्यक कहलाने में क्यों शर्म महसूस करते हैं। बतायें हमारे सेठ लोग और साधु-साध्वी गण!
खरतरगच्छ जन चेतना मंच ने जैन पूंजीपतियों और धनाढ्यों से यह सवाल भी किया है कि अगर उन्हें अपने आप को अल्पसंख्यक कहलवाने में शर्म आती है, तो फिर वे अपने समाज की आबादी बढ़ाने के लिये सार्थक कदम क्यों नहीं उठाते हैं? ताजा जनगणना आंकड़ों पर गैर करें तो श्वेताम्बर जैन समुदाय में सौ पुरूषों के मुकाबले मात्र 86 महिलायें हैं। इसके साथ-साथ आर्थिक एवं अन्य कारणों से गरीब परिवारों की लड़कियों की शादियां नहीं होती हैं। इनमें से कई को मजबूर होकर दीक्षा लेने का रास्ता चुनना पड़ता है। इस तरह अगर गौर करें तो श्वेताम्बर समाज की आबादी का कम से कम एक प्रतिशत महिलाऐं या तो अविवाहित रहती है या फिर दीक्षा का रास्ता चुनती है। अर्थात इस परिस्थिति में जैन आबादी का हर सौ में से 15 युवकों को लड़कियां नहीं मिलने के चलते अविवाहित रहने पर मजबूर होना पड़ता है। पंूजीपतियों और उनके आसरे अपने पांड़ाल सजाने, प्रवचन-झाडऩे वाले साधु-साध्वियों ने कभी जैन समुदाय की इस गम्भीर समस्या की तरफ ध्यान दिया है? सवाल यह भी उठता है कि इन पूंजीपतियों और इनकी दौलत के पीछे अपनी विद्वता का पाखण्ड करने वाले साधु-साध्वियों ने कितने बेरोजगार युवाओं को रोजगार की व्यवस्था करवाई है? जैन संस्कृति के इतिहास को जानने वाले और अपने समाज के इतिहास का अध्ययन करने तथा जैन इतिहास के कितने इतिहासकार साधू-साध्वी समाज में हैं, बतायेंगे समाज के मठाधीश बने सेठ-साहूकार?
आज जब खरतरगच्छ जन चेतना मंच के कार्यकर्ताओं ने अपने जन जागरण अभियान के तहत समाज बन्धुओं से घर-घर जाकर जनसम्पर्क का कार्यक्रम शुरू किया है, तब यह उजागर होता ही जा रहा है कि पूंजीपतियों, धनाढ्यों का एक ऐसा काकस बना हुआ है जो चंद साधु-साध्वियों को अपने दौलत के बूते पर अपने लिये काम करने हेतु प्रेरित कर रहा है। इस गठजोड़ का समाजहित से कोई लेना देना नहीं है।
अब वक्त आ गया है, इन स्वार्थी पूंजीपतियों-धनाढ्यों के गठजोड़ को पूरी तरह से ध्वस्त करने के लिये समाज के युवाओं को संघर्षशील होने का।
खरतरगच्छ जन चेतना मंच ने सवाल उठाया है कि आज देश में जैन संस्कृति के अनुयाइयों की संख्या मात्र पचास लाख के अंदर सिमट गई है और देश के 33 प्रदेशों में बिखरा जैन समुदाय देश की आबादी का आधा प्रतिशत (0.4 प्रतिशत) भी नहीं बचा है, ऐसे में जैन समुदाय के पूंजीपति-धनाढ्य वर्ग जैन संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिये अपने समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने की मुहिम में एकजुट क्यों नहीं हो रहा है? क्यों इस मुहिम को परवान चढऩे में अडंगा बना हुआ है?
खरतरगच्छ जन चेतना मंच ने यह सवाल भी किया है कि देश में जाना-माना उद्योग घराना टाटा समूह अल्पसंख्यक पारसी समुदाय में आता है, इस ही तरह अन्य उद्योग घराना गोदरेज समूह भी पारसी समुदाय से ही आता है, वहीं अजीम प्रेमजी अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय से हैं और अल्पसंख्यक सिक्ख समुदाय में भी दर्जनों अरबपति उद्योग समूह हैं, जो राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने आप को अल्पसंख्यक कहते और कहलवाते हैं। ऐसी स्थिति में जैन समुदाय के पूंजीपति अपने आपको अल्पसंख्यक कहलाने में क्यों शर्म महसूस करते हैं। बतायें हमारे सेठ लोग और साधु-साध्वी गण!
खरतरगच्छ जन चेतना मंच ने जैन पूंजीपतियों और धनाढ्यों से यह सवाल भी किया है कि अगर उन्हें अपने आप को अल्पसंख्यक कहलवाने में शर्म आती है, तो फिर वे अपने समाज की आबादी बढ़ाने के लिये सार्थक कदम क्यों नहीं उठाते हैं? ताजा जनगणना आंकड़ों पर गैर करें तो श्वेताम्बर जैन समुदाय में सौ पुरूषों के मुकाबले मात्र 86 महिलायें हैं। इसके साथ-साथ आर्थिक एवं अन्य कारणों से गरीब परिवारों की लड़कियों की शादियां नहीं होती हैं। इनमें से कई को मजबूर होकर दीक्षा लेने का रास्ता चुनना पड़ता है। इस तरह अगर गौर करें तो श्वेताम्बर समाज की आबादी का कम से कम एक प्रतिशत महिलाऐं या तो अविवाहित रहती है या फिर दीक्षा का रास्ता चुनती है। अर्थात इस परिस्थिति में जैन आबादी का हर सौ में से 15 युवकों को लड़कियां नहीं मिलने के चलते अविवाहित रहने पर मजबूर होना पड़ता है। पंूजीपतियों और उनके आसरे अपने पांड़ाल सजाने, प्रवचन-झाडऩे वाले साधु-साध्वियों ने कभी जैन समुदाय की इस गम्भीर समस्या की तरफ ध्यान दिया है? सवाल यह भी उठता है कि इन पूंजीपतियों और इनकी दौलत के पीछे अपनी विद्वता का पाखण्ड करने वाले साधु-साध्वियों ने कितने बेरोजगार युवाओं को रोजगार की व्यवस्था करवाई है? जैन संस्कृति के इतिहास को जानने वाले और अपने समाज के इतिहास का अध्ययन करने तथा जैन इतिहास के कितने इतिहासकार साधू-साध्वी समाज में हैं, बतायेंगे समाज के मठाधीश बने सेठ-साहूकार?
आज जब खरतरगच्छ जन चेतना मंच के कार्यकर्ताओं ने अपने जन जागरण अभियान के तहत समाज बन्धुओं से घर-घर जाकर जनसम्पर्क का कार्यक्रम शुरू किया है, तब यह उजागर होता ही जा रहा है कि पूंजीपतियों, धनाढ्यों का एक ऐसा काकस बना हुआ है जो चंद साधु-साध्वियों को अपने दौलत के बूते पर अपने लिये काम करने हेतु प्रेरित कर रहा है। इस गठजोड़ का समाजहित से कोई लेना देना नहीं है।
अब वक्त आ गया है, इन स्वार्थी पूंजीपतियों-धनाढ्यों के गठजोड़ को पूरी तरह से ध्वस्त करने के लिये समाज के युवाओं को संघर्षशील होने का।


