पिछले माह हमने डायन गरीबी और चुडैल अमीरी के शिकंजे में जकड़े एक ऐसे परिवार की कहानी साया की थी, जो परिवार कभी समाज का सिरमौर रहा और आज चुडैल अमीरी के नशे में जकड़े एक भाई की करतूतों के कारण बर्बादी के कागार पर खड़ा है।
हमने पिछली बार सवाल उठाया था कि श्वेताम्बर परिवार का एक बेटा क्या अपनी दादागिरी और चुडैल अमीरी के बूते पर परिवार के अन्य सदस्यों के अधिकारों और उनके जायज हकों पर तिकड़म लगा कर अपना कब्जा कर उस परिवार को दोखज की भट्टी में झौंकने का कृतध्नतापूर्ण कृत्य कर सकता है? हमने एक उदाहरण भी इस परिवार के एक छोटे बेटे के घृणित कृत्य का उल्लेख करते हुए दिया है, जिसमें हमने बताया था कि परिवार की मौरूसी जायदाद को गिरवी रखकर परिवार के मुखिया (कर्ता) के नाम से खरीदी गई सम्पत्ति को मक्कारी और दादागिरी और फर्जीवाडा कर अपने नाम बेचान करवाने का घृणित कृत्य करता है और फिर अपने पिता के जिंदा रहते हुए उन पर और अन्य परिजनों पर बंटवारे का मुकदमा ठोक देता है और तिकड़म लगा कर पूरी सम्पत्ति को हड़पने की साजिश रच कर उसको क्रियान्वित करने में जुट जाता है!
चूंकि मामला न्यायपालिका से जुड़ा है और हम उस पर विस्तार से टिप्पणी नहीं करेंगे, क्योंकि कानून अपनी जगह है और कानून अपना काम करेगा। इस गणतंत्र के कानून का हम सम्मान करते हैं और इसीलिये कोई टिप्पणी भी नहीं करेंगे।
इस परिवार से सम्बन्धित हकीकत का विस्तृत ब्यौरा हमने उजागर करने के लिये बताया था और चूंकि इस प्रकरण से जुड़े दस्तावेज हमें उपलब्ध हो गये हैं और उन दस्तावेजों की रूह में हम इस परिवार से जुड़े कुछ निहायत ही निम्रस्तर की सोच वाले परिजनों का विस्तार से खुलासा करने की स्थिति में हैं और अगले पखवाड़े जैन समुदाय खास कर श्वेताम्बर खरतरगच्छ समाज के समाजबन्धुओं के समक्ष उजागर करने की कोशिश करेंगे।
इस बीच एक दिलचस्प तथ्य भी सामने आया है। इस परिवार के सबसे बड़े सौतेले भाई, जिन्होंने इस परिवार के कर्ता के सहयोग से एक आलीशान बंगला बनाया था को अपनी पत्नी के लिये पुश्तैनी मकान में ग्राउण्ड फ्लोर पर एक कमरा चाहिये! इन सौतेले भाई और इनकी पत्नी पिछले लगभग 50 साल से अधिक समय से अलग अपने बंगले में रहते रहे हैं और कभी इन्होंने तो अपने परिजनों के वैलफेयर के बारे में सोचा तक नहीं, अब अपने अन्य परिजनों को परेशान करने की छोटे भाई की मुहिम में साझा करने के लिये मैदान मेें उतरे हैं। सही है, सौतेले भाई जो ठहरे! वैसे परिवार के कर्ता पर दबाव बनाने और चार भाईयों की सम्पत्ति के बेचान की धोखाधड़ी में शामिल इन सौतेले भाईजी को एक ताजा दन्नाता सोच आया कि वे अपनी पत्नी को साझा सम्पत्ति के उस कमरे में रखना चाहते हैं जिसमें न तो लेट्रीन-बाथरूम है और न ही बिजली-पानी की व्यवस्था। सम्पत्ति पर कब्जा करने के लिये क्या नायाब रास्ता इन सौतेले भाई ने ढूंढा है यह काबिले तारीफ है। इस कमरे की असलियत भी हम बयां कर दें!
पांच मंजिला हवेली ग्राउण्ड फ्लोर में स्थित जिस कमरे में वे अपनी पत्नी को रखना चाहते हैं, उस कमरे से दो शवयात्राऐं निकल चुकी है। अपनी माताजी को ये सम्पत्ति हड़पने की स्कीम के तहत छोटे भाई के पास रहने के लिये ले गये थे, वहां देखभाल में लापरवाही के चलते एक प्राइवेट नर्सिंग होम में इन्होंने दाखिल कराया। डॉक्टरों के जवाब देने के बाद सौतेले भाई साहब और छोटे सेठजी माताजी को हवेली के इस कमरे में ले आये थे। कुछ दिन बाद इनकी करतूतों के चलते माताजी का देहान्त हो गया और उनकी शवयात्रा इस ही कमरे से निकल कर श्मशान पहुंची। चल सम्पत्ति ये लोग अपनी मारूती वैन में भरकर अपने बंगले पर ले गये।
अब इनकी अगली करतूत का जायजा लिया जाये। जायदाद पर कब्जा करने के लिये इन दोनों भाईयों ने अपने पिता पर शिकंजा कसा! छोटे भाई ने सम्पत्ति बंटवारे का मुकदमा ठोक दिया और बड़े सौतेले भाई ने साथ दिया। मकसद सिर्फ यही कि किसी भी तरह मौरूसी जायदाद में रह रहे अपने एक भाई को येन-केन-प्रकेरण बेदखल कर सम्पत्ति पर कब्जा कर कॉमर्शियल काम्प्लेक्स बना लिया जाये। लेकिन शर्मनाक स्थिति यह रही कि दोनों भाई अपने पिता की भोजन व्यवस्था करने से भी मुकर गये। शर्मनाक स्थिति यह रही कि पहिले दो-तीन दिन खाना श्वेताम्बर समाज के भोजनालय से बड़े भाई के आवास जहां पिता को रखा गया वहां शहर वाले भाई के परिजनों ने पहुंचाया। इस शहर वाले भाई के परिवार वालों को यह नागवार गुजरा और तैय किया कि खाना वे ही घर में बना कर अपने पिता-दादा को पहुंचायेंगे। दोनों भाईयों की बेरूखी और सम्पत्ति के लालच में पिता की अनदेखी हुई और उन्हें सवाईमानसिंह अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इस दौरान छोटा भाई एक दिन भी पिता को देखने अस्पताल नहीं पहुंचा। एक दिन सौतेले भाई साहब और उनके डॉक्टर दामाद रात को लगभग साढे बारह बजे पिताजी को लेकर शहर के विवादग्रस्त मौरूसी मकान के उसी कमरे में पटक कर चल दिये, जिसमें माताजी का देहान्त हो गया था। कुछ दिन बाद पिताजी का देहान्त भी उस ही कमरे में हो गया।
अब चांदी के टुकड़ों के लोलुप इन सौतेले भाई का सोच है कि अपनी पत्नी को इस ही कमरे में लाकर पटक दें ताकि सारसम्भाल इस मकान में रहने वाले भाई कर ले और उन्हें हवाला और बेनामी कारोबार के लिये फुर्सत मिल जाये।
शर्मनाक स्थिति यह है कि पिछले 50 सालों में इनकी पत्नी (जिसे इस मनहूस कमरे में लाकर पटकना चाहते हैं) ने कभी इस मकान में निवास नहीं किया। न ही इन सौतेले भाई साहब के बच्चों ने जन्म से लेकर आज तक इस मकान में निवास किया।
हम इन भाई रूपी दरिन्दों के साथ कोटा में निवास कर रही इनकी बहिन के बारे में विस्तार से अगले अंकों में लिखेंगे, जिससे इनकी बेशर्मी पूर्ण दरिन्दगी तो उजागर होगी ही साथ ही इनके रहनुमा उन पूंजीपतियों, सेठियों और उनके सरमायेदारों के काले चेहरे भी उजागर होंगे! साथ ही खरतरगच्छ संघ के आधीन उन साधु-साध्वियों के बारे में भी तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध करवाने का हम प्रयास करेंगे, जिनका वरदहस्त इन निकृष्टों पर है।
हमने पिछली बार सवाल उठाया था कि श्वेताम्बर परिवार का एक बेटा क्या अपनी दादागिरी और चुडैल अमीरी के बूते पर परिवार के अन्य सदस्यों के अधिकारों और उनके जायज हकों पर तिकड़म लगा कर अपना कब्जा कर उस परिवार को दोखज की भट्टी में झौंकने का कृतध्नतापूर्ण कृत्य कर सकता है? हमने एक उदाहरण भी इस परिवार के एक छोटे बेटे के घृणित कृत्य का उल्लेख करते हुए दिया है, जिसमें हमने बताया था कि परिवार की मौरूसी जायदाद को गिरवी रखकर परिवार के मुखिया (कर्ता) के नाम से खरीदी गई सम्पत्ति को मक्कारी और दादागिरी और फर्जीवाडा कर अपने नाम बेचान करवाने का घृणित कृत्य करता है और फिर अपने पिता के जिंदा रहते हुए उन पर और अन्य परिजनों पर बंटवारे का मुकदमा ठोक देता है और तिकड़म लगा कर पूरी सम्पत्ति को हड़पने की साजिश रच कर उसको क्रियान्वित करने में जुट जाता है!
चूंकि मामला न्यायपालिका से जुड़ा है और हम उस पर विस्तार से टिप्पणी नहीं करेंगे, क्योंकि कानून अपनी जगह है और कानून अपना काम करेगा। इस गणतंत्र के कानून का हम सम्मान करते हैं और इसीलिये कोई टिप्पणी भी नहीं करेंगे।
इस परिवार से सम्बन्धित हकीकत का विस्तृत ब्यौरा हमने उजागर करने के लिये बताया था और चूंकि इस प्रकरण से जुड़े दस्तावेज हमें उपलब्ध हो गये हैं और उन दस्तावेजों की रूह में हम इस परिवार से जुड़े कुछ निहायत ही निम्रस्तर की सोच वाले परिजनों का विस्तार से खुलासा करने की स्थिति में हैं और अगले पखवाड़े जैन समुदाय खास कर श्वेताम्बर खरतरगच्छ समाज के समाजबन्धुओं के समक्ष उजागर करने की कोशिश करेंगे।
इस बीच एक दिलचस्प तथ्य भी सामने आया है। इस परिवार के सबसे बड़े सौतेले भाई, जिन्होंने इस परिवार के कर्ता के सहयोग से एक आलीशान बंगला बनाया था को अपनी पत्नी के लिये पुश्तैनी मकान में ग्राउण्ड फ्लोर पर एक कमरा चाहिये! इन सौतेले भाई और इनकी पत्नी पिछले लगभग 50 साल से अधिक समय से अलग अपने बंगले में रहते रहे हैं और कभी इन्होंने तो अपने परिजनों के वैलफेयर के बारे में सोचा तक नहीं, अब अपने अन्य परिजनों को परेशान करने की छोटे भाई की मुहिम में साझा करने के लिये मैदान मेें उतरे हैं। सही है, सौतेले भाई जो ठहरे! वैसे परिवार के कर्ता पर दबाव बनाने और चार भाईयों की सम्पत्ति के बेचान की धोखाधड़ी में शामिल इन सौतेले भाईजी को एक ताजा दन्नाता सोच आया कि वे अपनी पत्नी को साझा सम्पत्ति के उस कमरे में रखना चाहते हैं जिसमें न तो लेट्रीन-बाथरूम है और न ही बिजली-पानी की व्यवस्था। सम्पत्ति पर कब्जा करने के लिये क्या नायाब रास्ता इन सौतेले भाई ने ढूंढा है यह काबिले तारीफ है। इस कमरे की असलियत भी हम बयां कर दें!
पांच मंजिला हवेली ग्राउण्ड फ्लोर में स्थित जिस कमरे में वे अपनी पत्नी को रखना चाहते हैं, उस कमरे से दो शवयात्राऐं निकल चुकी है। अपनी माताजी को ये सम्पत्ति हड़पने की स्कीम के तहत छोटे भाई के पास रहने के लिये ले गये थे, वहां देखभाल में लापरवाही के चलते एक प्राइवेट नर्सिंग होम में इन्होंने दाखिल कराया। डॉक्टरों के जवाब देने के बाद सौतेले भाई साहब और छोटे सेठजी माताजी को हवेली के इस कमरे में ले आये थे। कुछ दिन बाद इनकी करतूतों के चलते माताजी का देहान्त हो गया और उनकी शवयात्रा इस ही कमरे से निकल कर श्मशान पहुंची। चल सम्पत्ति ये लोग अपनी मारूती वैन में भरकर अपने बंगले पर ले गये।
अब इनकी अगली करतूत का जायजा लिया जाये। जायदाद पर कब्जा करने के लिये इन दोनों भाईयों ने अपने पिता पर शिकंजा कसा! छोटे भाई ने सम्पत्ति बंटवारे का मुकदमा ठोक दिया और बड़े सौतेले भाई ने साथ दिया। मकसद सिर्फ यही कि किसी भी तरह मौरूसी जायदाद में रह रहे अपने एक भाई को येन-केन-प्रकेरण बेदखल कर सम्पत्ति पर कब्जा कर कॉमर्शियल काम्प्लेक्स बना लिया जाये। लेकिन शर्मनाक स्थिति यह रही कि दोनों भाई अपने पिता की भोजन व्यवस्था करने से भी मुकर गये। शर्मनाक स्थिति यह रही कि पहिले दो-तीन दिन खाना श्वेताम्बर समाज के भोजनालय से बड़े भाई के आवास जहां पिता को रखा गया वहां शहर वाले भाई के परिजनों ने पहुंचाया। इस शहर वाले भाई के परिवार वालों को यह नागवार गुजरा और तैय किया कि खाना वे ही घर में बना कर अपने पिता-दादा को पहुंचायेंगे। दोनों भाईयों की बेरूखी और सम्पत्ति के लालच में पिता की अनदेखी हुई और उन्हें सवाईमानसिंह अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इस दौरान छोटा भाई एक दिन भी पिता को देखने अस्पताल नहीं पहुंचा। एक दिन सौतेले भाई साहब और उनके डॉक्टर दामाद रात को लगभग साढे बारह बजे पिताजी को लेकर शहर के विवादग्रस्त मौरूसी मकान के उसी कमरे में पटक कर चल दिये, जिसमें माताजी का देहान्त हो गया था। कुछ दिन बाद पिताजी का देहान्त भी उस ही कमरे में हो गया।
अब चांदी के टुकड़ों के लोलुप इन सौतेले भाई का सोच है कि अपनी पत्नी को इस ही कमरे में लाकर पटक दें ताकि सारसम्भाल इस मकान में रहने वाले भाई कर ले और उन्हें हवाला और बेनामी कारोबार के लिये फुर्सत मिल जाये।
शर्मनाक स्थिति यह है कि पिछले 50 सालों में इनकी पत्नी (जिसे इस मनहूस कमरे में लाकर पटकना चाहते हैं) ने कभी इस मकान में निवास नहीं किया। न ही इन सौतेले भाई साहब के बच्चों ने जन्म से लेकर आज तक इस मकान में निवास किया।
हम इन भाई रूपी दरिन्दों के साथ कोटा में निवास कर रही इनकी बहिन के बारे में विस्तार से अगले अंकों में लिखेंगे, जिससे इनकी बेशर्मी पूर्ण दरिन्दगी तो उजागर होगी ही साथ ही इनके रहनुमा उन पूंजीपतियों, सेठियों और उनके सरमायेदारों के काले चेहरे भी उजागर होंगे! साथ ही खरतरगच्छ संघ के आधीन उन साधु-साध्वियों के बारे में भी तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध करवाने का हम प्रयास करेंगे, जिनका वरदहस्त इन निकृष्टों पर है।


