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वामपंथी जनवादी पार्टियों को मंथन करना ही होगा!

वामपंथी जनवादी दलों को राजस्थान विधानसभा चुनाव-2013 में गहरी मुंह की खानी पडी! अगर कोई शोर-शराबा करे कि मोदी लहर के चलते उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा या फिर यह बहाना बनाया जाये कि राजस्थान में भाजपा की लहर थी जिसमें नये वोटर बह गये, तो उनका सोच या कथन पूरी तरह बचकाना माना जायेगा!
राजस्थान में वर्तमान में वामपंथियों-जनवादियों का कोई बड़ा जनाधार नहीं है। वैसे एक समय था कि राजस्थान विधानसभा और संसद में वाम-जनवादी अपनी ताकत रखते थे। सीपीआईएम में अमराराम के विधायक बनने के बाद जमीनी बदलाव आने लगे थे। पार्टी ने अमराराम के नेतृत्व में किसान सभा के जरिये संघर्ष पथ पर चल कर गंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर, चूरू व झुंझनूं जिलों में अपनी पकड़ बनाई। जमीनी हकीकत यह रही कि आम किसान जातिवाद-साम्प्रदायवाद को नकार कर अमराराम के नेतृत्व में संघर्ष पथ पर किसान सभा से जुडऩे लगा था। नतीजन पार्टी की अवाम के बीच अपनी पैठ बनी और उसके विधायकों की संख्या तीन तक पहुंच गई। इस बीच पार्टी शहरी और कस्बाई क्षेत्रों में पार्टी मैनेजरों के अहंकारी और सामन्तवादी रवैये के चलते पैठ खोने लगी। पार्टी मैनेजरों का अपने सहयोगी वाम-जनवादी दलों से तालमेल में भी तनाव की स्थितियां पनपने लगी।
उधर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया (सीपीआई) भी प्रदेश के पार्टी मैनेजरों के हाथों की कठपुतली बनती चली गई। आदिवासी क्षेत्रों में पहिले ही पार्टी का पाटिया साफ हो चुका था और अब पार्टी की शहरी क्षेत्रों में जो पकड़ थी वह भी धीरे-धीरे ढीली होती चली गई। आज शहरी क्षेत्र हों या फिर ग्रामीण क्षेत्र, पार्टी मैनेजर पार्टी को इस तरह हांक रहे हैं, जैसे वे एक राजनैतिक पार्टी नहीं, एनजीओ चला रहे हों! ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी अपने स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं के बूते पर जसतस चल रही है वहीं शहरी क्षेत्रों में ट्रेड यूनियनों और कच्ची बस्तियों से जुडे संगठनों के कमजोर कंधों पर टिकी है। आम अवाम से तो ये दोनों पार्टियां लगभग लम्बी दूरी बनाये हुए है।
उधर पार्टी में ही अंदरूनी स्तर पर अनदेखी के कारण पार्टी में मध्यमवर्गीय कार्यकर्ताओं के अभाव से जूझ रहा फारवर्ड ब्लाक भी अपना तेज तर्रार स्वरूप खोता जा रहा है तथा वामपंथी पार्टियों के आकाओं के सामन्तवादी अक्खड़पन के चलते फारवर्ड ब्लाक की वामदलों से दूरियां भी बनती ही चली गई।
आज स्थिति यह है कि सीपीआईएम राज्य विधानसभा चुनावों में एक फीसदी वोट भी नहीं जुटा पाई और उसके तीनों विधायक चित्त हो गये। उधर सीपीआई को महज 55 हजार (0.2 फीसदी)  वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। जबकि ये दोनों ही पार्टियां राष्ट्रीय स्तर की मान्यता प्राप्त पार्टियां हैं। फारवर्ड ब्लाक ने आर्थिक एवं अन्य कारणों से मात्र प्रतीकात्मक चुनाव लड़ा और वह प्रदेश की राजधानी जयपुर में अपने चुनाव चिन्ह को बखूबी अवाम के बीच कायम रखने में सफल रहा तथा मध्यमवर्गीय पार्टी कार्यकर्ताओं की कमी के बावजदू अवाम में आज भी पैठ बनाये हुए है।
राजस्थान में हुए विधानसभा चुनाव-2013 ने सभी वाम जनवादी पार्टियों को उनकी हकीकत बता दी है। इन चुनावों ने वाम जनवादी एकता को धता बता कर व्यक्तिपरक स्वार्थों से प्रेरित एकल नेतृत्व वाली पार्टियों से सांठगांठ में लिप्त इन पार्टियों के नेताओं को उनके असली चेहरे भी अपने आइने में दिखा दिये हैं। अब जरूरत है एकल नेतृत्व वाली व्यक्तिपरक पार्टियों के चंगुल से वामपंथी अपने आप को मुक्त करवायें और वृह्दस्तर पर वामपंथी-जनवादी पार्टियों के गठजोड़ को मजबूत बनायें। वाम पार्टियों के आकाओं को अब साफ तौर पर समझ लेना चाहिये कि अवाम वामपंथियों की एकल नेतृत्ववाली पार्टियों से गठजोड़ को नापसंद करता है और वाम-जनवादी पार्टियों से आस लगाये बैठा है कि ये पार्टियां उसके साथ मिल कर नये भारत के निर्माण में एकजुट हो। अगर वामपंथी-जनवादी पार्टियों के आका अवाम की आकांक्षाओं पर अब खरे नही उतरे तो फिर इन्हें अवाम आगे मौका देने के मूडमें भी नहीं है।
एक बात ओर! वामपंथी-जनवादी पार्टियों के आकाओं को यह भी साफ-साफ समझ लेना चाहिये कि वृहत्तर वाम-जनवादी एकता ही उनके भविष्य का आधार है और इस आधार को पुख्ता बनाने के लिये वामपंथी जनवादी पार्टियों में बराबरी की एकजुटता को तवज्जो दी जानी चाहिये। यह तभी हो सकता है, जब वामपंथी पार्टियों का एकल नेतृत्व वाली पार्टियों से मोह भंग हो!
देखना यही है कि वामपंथी-जनवादी दलों के नेता क्या इन मुद्दों पर अपनी-अपनी पार्टियों में और पार्टी-टू-पार्टी लेविल पर कुछ चर्चा कर किस नतीजे पर पहुंचते हैं!

 
AGRAGAMI SANDESH

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AGEAGAMI SANDESH

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