देश के पांच राज्यों में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों ने देश की राजनैतिक दशा और दिशा तैय करने की ओर कदम बढ़ाना चालू कर दिया है। इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय तक मीडिया खास कर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में सिर्फ चार राज्यों छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और दिल्ली के विधानसभा चुनावों से सम्बन्धित लाइव टैलीकास्ट होते रहे। लगता है कि किसी भी चैनल ने मिजोरम में हुए विधानसभा चुनावों को कोई तवज्जो नहीं दी। आखीर क्यों? यह एक गम्भीर एवं विचारणीय विषय है!
जोरशोर से यह कहा जा रहा है कि पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के नतीजों का कोई असर देश के आम चुनावों (लोकसभा चुनावों) पर नहीं पड़ेगा। देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह भी इस ही तरह का बयान पिछले दिनों दे चुके हैं। लेकिन ऐसी सोच या बयान हकीकत से परे है। क्योंकि लोकसभा चुनाव किसी भी हालत में 30 मई, 2014 तक पूरे करवाये जाने हैं। ऐसी हालत में आम चुनावों के लिये मात्र लगभग तीन से चार महिने ही राजनैतिक पार्टियों के पास लोकसभा चुनावों के लिये बचे हैं। अत: यह साफ है कि विधानसभा के इन चुनावों का निश्चित रूप से आम चुनावों में पड़ेगा। दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार का संदेश भी पूरे देश में गया है और इससे कांग्रेस के खिलाफ वातावरण बना है।
छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान में भी कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ी है और लोकसभा चुनावों से पहिले कांग्रेस ने इन राज्यों में अपने कार्यकर्ताओं के टूटे मनोबल को पटरी पर लाने के लिये तत्काल कदम नहीं उठाये तो उसका खमियाजा लोकसभा चुनावों में उठाने के लिये कांग्रेस को तैयार रहना होगा।
जहां तक राजस्थान का सवाल है, सत्ता परिवर्तन के साथ ही सरकारी हुक्कामों और कर्मचारियों में हड़कम्प मच गया है। मलाईदार पदों पर कब्जा जमाने के लिये अफसरों ने अभी से ही जोड़तोड़ और तिकड़मों के जरिये जुगत बैठाने की मुहिम शुरू कर दी है।
वहीं जुम्मेदार पदों पर बैठे आला अफसरों में से कुछ दिल्ली का रूख करने की जुगत बैठा रहे हैं। वसुन्धरा राजे के शासनकाल में जो आला अफसर जुम्मेदार पदों पर बैठे थे और जिने अशोक गहलोत प्रशासन के समय बर्फ में लगा दिया गया था, वे भी अब मुख्यधारा में आने की आस लगाने लगे हैं।
अगले माह जनवरी से राज्य के वार्षिक बजट की तैयारियां भी शुरू हो जायेगी। आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा को जीत दिलाने के लिये जनहितकारी बजट बनाना भी नई सरकार की मजबूरी होगी। इस लिहाज से नई सरकार के लिये अगले तीन माह काफी महत्वपूर्ण होंगे! देखना यही है कि नई सरकार किस तरह इन चुनौतियों से निपटती है।
जोरशोर से यह कहा जा रहा है कि पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के नतीजों का कोई असर देश के आम चुनावों (लोकसभा चुनावों) पर नहीं पड़ेगा। देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह भी इस ही तरह का बयान पिछले दिनों दे चुके हैं। लेकिन ऐसी सोच या बयान हकीकत से परे है। क्योंकि लोकसभा चुनाव किसी भी हालत में 30 मई, 2014 तक पूरे करवाये जाने हैं। ऐसी हालत में आम चुनावों के लिये मात्र लगभग तीन से चार महिने ही राजनैतिक पार्टियों के पास लोकसभा चुनावों के लिये बचे हैं। अत: यह साफ है कि विधानसभा के इन चुनावों का निश्चित रूप से आम चुनावों में पड़ेगा। दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार का संदेश भी पूरे देश में गया है और इससे कांग्रेस के खिलाफ वातावरण बना है।
छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान में भी कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ी है और लोकसभा चुनावों से पहिले कांग्रेस ने इन राज्यों में अपने कार्यकर्ताओं के टूटे मनोबल को पटरी पर लाने के लिये तत्काल कदम नहीं उठाये तो उसका खमियाजा लोकसभा चुनावों में उठाने के लिये कांग्रेस को तैयार रहना होगा।
जहां तक राजस्थान का सवाल है, सत्ता परिवर्तन के साथ ही सरकारी हुक्कामों और कर्मचारियों में हड़कम्प मच गया है। मलाईदार पदों पर कब्जा जमाने के लिये अफसरों ने अभी से ही जोड़तोड़ और तिकड़मों के जरिये जुगत बैठाने की मुहिम शुरू कर दी है।
वहीं जुम्मेदार पदों पर बैठे आला अफसरों में से कुछ दिल्ली का रूख करने की जुगत बैठा रहे हैं। वसुन्धरा राजे के शासनकाल में जो आला अफसर जुम्मेदार पदों पर बैठे थे और जिने अशोक गहलोत प्रशासन के समय बर्फ में लगा दिया गया था, वे भी अब मुख्यधारा में आने की आस लगाने लगे हैं।
अगले माह जनवरी से राज्य के वार्षिक बजट की तैयारियां भी शुरू हो जायेगी। आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा को जीत दिलाने के लिये जनहितकारी बजट बनाना भी नई सरकार की मजबूरी होगी। इस लिहाज से नई सरकार के लिये अगले तीन माह काफी महत्वपूर्ण होंगे! देखना यही है कि नई सरकार किस तरह इन चुनौतियों से निपटती है।
कांग्रेस हारी-जीता राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ!
जी हां! राजस्थान विधानसभा चुनावों का असली सच यह है कि राजस्थान में कांग्रेस बुरी तरह से हारी है, लेकिन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के जरिये शानदार जीत हांसिल की है भाजपा ने। यह भी सही है कि कांग्रेस और अशोक गहलोत राज्य में विकास के दावे करते रहे, बड़े-बड़े विज्ञापन दैनिकों खास कर बड़े दैनिक अखबारों में छपवाते रहे, लेकिन भूल गये कि चुनावों में वोट तो आम मतदाता ही को देना है और इन आम मतदाताओं में पैठ छोटे और मझौले अखबारों की है।
इसके साथ-साथ कांग्रेस और उसके चुनाव प्रबन्धक इन चुनावों में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की भूमिका के प्रति भी लापरवाह रहे, जबकि कांग्रेस के चुनाव प्रबंधकों को पता था कि इन चुनावों में आरएसएस सक्रिय रहेगा। आरएसएस सक्रिय हुआ। उसके कार्यकर्ता बिना कोई प्रचार के चुनावी जंग में उतर गये और यह उन कार्यकर्ताओं की ही रणनीति और करिश्मा है कि आज भाजपा इतने सुरक्षित बहुमत से जीत पाई। अगर आरएसएस के कार्यकर्ता-स्वंयसेवक पूरी ताकत के साथ इन चुनावों में शिरकत नहीं करते तो भाजपा को यह सुरक्षित जीत हांसिल होना मुश्किल ही नहीं नामुमकीन था।
अत: यह कहा जा सकता है कि राजस्थान विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार हुई है, लेकिन यह भी सच है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रयासों से ही भाजपा ने जीत हांसिल की है।


