जयपुर/भोपाल/नई दिल्ली (अग्रगामी) मध्यप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस का पूरी तरह सूपडा साफ हो गया है। दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस की जो र्दुगति हुई है वह कांग्रेस ही नहीं विपक्षियों के लिये भी आश्चर्यजनक है। नई दिल्ली विधानसभा सीट से अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को 22 हजार से ज्यादा वोटों से शिकस्त दी! इससे साफ हो गया कि दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के प्रति कितना गुस्सा था!
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह अपनी कुर्सी पर बने रहेंगे। वहां भाजपा की सीटों में कमी और कांग्रेस की सीटों में जरूर थोड़ी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस की कडी टक्कर है। लेकिन सरकार भाजपा की ही बनेगी!
राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी यह समाचार लिखे जाने तक लगभग तीन चौथाई बहुमत से सत्ता में आने के लिये तैयार है। कांग्रेस की यहां भी दिल्ली की तरह जनता ने गहरी पिटाई कर दी। वह विधानसभा की दस प्रतिशत सीटों के लिये भी तरस गई। कांग्रेस को जितनी सीटें मिलने की गुंजाइश है, उसके आसपास ही छोटी पार्टियों और निर्दलियों को सीटें मिलने की स्थिति है। राजस्थान में दिग्गज कांग्रेसी नेता अवाम के गुस्से के आगे पटखनी खा गये। शांति धारीवाल 14 हजार 861 वोटों से हारे वहीं दुर्रूमियां 40 हजार 106 वोटों से पटखनी खा गये! श्रीमती बीना काक को 42 हजार 643 वोटों से तो अर्चना शर्मा 48 हजार 718 वोटों से शिकस्त मिली। हेमाराम चौधरी को 33 हजार 155 से, तो हजारीलाल नागर को 33 हजार 071 वोटों से और रामनारायण मीणा को 29635 वोटों की चोट देकर जनता ने उन्हें विधानसभा से बाहर रखा! कांग्रेस के अधिकांश दिग्गज भारी मतों से हारे हैं। जिससे जनता का उनके प्रति गुस्सा साफ-साफ उजागर होता है।
इसके साथ ही इन विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के महत्वपूर्ण रोल से इन्कार नहीं किया जा सकता है। सूत्र बताते हैं कि इन चुनावों में संघ के रोल के मद्देनजर भाजपा का अगला प्रदेशाध्यक्ष संघ की सहमति से संघ पृष्ठभूमि का होगा।
चूंकि राजस्थान में भाजपा स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई है, इसलिये भाजपा के केंद्रीय और राज्य नेतृत्व का स्पष्ट दायीत्व बनता है कि वे राज्य में अवाम की आकांक्षाओं की पूर्ति करें। आज राजस्थान का अवाम मंहगाई, जमाखोरी, कालाबाजारी, कुशासन और बिगडी हुई कानून और व्यवस्था की स्थिति में त्रस्त है। ऐसी स्थिति में सत्ताधीशों का दायीत्व बनता है कि वे अवाम के दु:ख तकलीफों को दूर करें।
देखना यही है कि सत्तारूढ़ भाजपा के राजनेता अवाम के दु:खदर्दों के परिपेक्ष्य में क्या कार्यवाही करते हैं?
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह अपनी कुर्सी पर बने रहेंगे। वहां भाजपा की सीटों में कमी और कांग्रेस की सीटों में जरूर थोड़ी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस की कडी टक्कर है। लेकिन सरकार भाजपा की ही बनेगी!
राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी यह समाचार लिखे जाने तक लगभग तीन चौथाई बहुमत से सत्ता में आने के लिये तैयार है। कांग्रेस की यहां भी दिल्ली की तरह जनता ने गहरी पिटाई कर दी। वह विधानसभा की दस प्रतिशत सीटों के लिये भी तरस गई। कांग्रेस को जितनी सीटें मिलने की गुंजाइश है, उसके आसपास ही छोटी पार्टियों और निर्दलियों को सीटें मिलने की स्थिति है। राजस्थान में दिग्गज कांग्रेसी नेता अवाम के गुस्से के आगे पटखनी खा गये। शांति धारीवाल 14 हजार 861 वोटों से हारे वहीं दुर्रूमियां 40 हजार 106 वोटों से पटखनी खा गये! श्रीमती बीना काक को 42 हजार 643 वोटों से तो अर्चना शर्मा 48 हजार 718 वोटों से शिकस्त मिली। हेमाराम चौधरी को 33 हजार 155 से, तो हजारीलाल नागर को 33 हजार 071 वोटों से और रामनारायण मीणा को 29635 वोटों की चोट देकर जनता ने उन्हें विधानसभा से बाहर रखा! कांग्रेस के अधिकांश दिग्गज भारी मतों से हारे हैं। जिससे जनता का उनके प्रति गुस्सा साफ-साफ उजागर होता है।
इसके साथ ही इन विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के महत्वपूर्ण रोल से इन्कार नहीं किया जा सकता है। सूत्र बताते हैं कि इन चुनावों में संघ के रोल के मद्देनजर भाजपा का अगला प्रदेशाध्यक्ष संघ की सहमति से संघ पृष्ठभूमि का होगा।
चूंकि राजस्थान में भाजपा स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई है, इसलिये भाजपा के केंद्रीय और राज्य नेतृत्व का स्पष्ट दायीत्व बनता है कि वे राज्य में अवाम की आकांक्षाओं की पूर्ति करें। आज राजस्थान का अवाम मंहगाई, जमाखोरी, कालाबाजारी, कुशासन और बिगडी हुई कानून और व्यवस्था की स्थिति में त्रस्त है। ऐसी स्थिति में सत्ताधीशों का दायीत्व बनता है कि वे अवाम के दु:ख तकलीफों को दूर करें।
देखना यही है कि सत्तारूढ़ भाजपा के राजनेता अवाम के दु:खदर्दों के परिपेक्ष्य में क्या कार्यवाही करते हैं?


