राजस्थान में सत्ता परिर्वतन हुए एक पखवाड़ा हो चुका है, लेकिन शोरशराबे के अलावा धरातल पर कहीं यह नजर ही नहीं आता है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन हो गया है!
कानून और व्यवस्था के हाल यह हैं कि राजधानी के अजमेरी गेट पर स्थित पुलिस कंट्रोल रूम के सामने मिले नरमुण्ड की तरह ही सिविल लाइन्स क्षेत्र में रेल्वे लाइन पर फिर एक नरमुण्ड मिला। पहिले वाले नरमुण्ड की गुत्थी अभी तक नहीं सुलझ पाई है और दूसरा नरमुण्ड मिल गया। कहा जा रहा है कि जब तक धड़ नहीं मिलेगा, नरमुण्ड की गुत्थी सुलझना मुश्किल है। हालांकि नरमुण्ड से जुडी गुत्थी परिजनों के कारण सुलझ गई!
चोरी, डकैती की वारदातों में भी इजाफा होता नजर आ रहा है। ऐसा लगने लगा है कि अफसरों का मन अपने कामकाज में नहीं लग रहा है और उनक सारा सोच और एनर्जी अपने तबादले की जुगत बैठाने में लग रही है। दूसरी समस्या है वर्ष का आखरी सप्ताह! हर एक सरकारी अफसर और कर्मचारी अपनी छुट्टियां लैप्स नहीं होने देना चाहता है। नतीजन जरूरत नहीं होने के बावजूद सरकारी अफसर और कर्मचारी अवकाश लेकर घर में धूप सेक रहे हैं। उनका सोच यह भी है कि बकाया छुट्टियों के सद्उपयोग के साथ-साथ नई सरकार के रंग-ढंग चाल-ढाल को भी पैनी नजर से परख लिया जाये।
उधर सरकार की ग्यारह सूत्रीय 60 दिवसीय कार्ययोजना भी तैयार नहीं हो पा रही है। अब यह कहा जा रहा है कि उक्त योजना 30 दिसम्बर तक ही तैयार हो पायेगी और नये साल जनवरी, 2014 से ही लागू हो सकेगी।
जीत का जश्र मनाने वालों की सरकार और सरकारी तंत्र के ढीले-ढाले रवैये से अवाम नाराज होना शुरू हो गया है। उसे धीरे-धीरे ऐहसास होने लगा है कि नया निजाम भी उसे मंहगाई से निजात दिलाने और जमाखोरों -कालाबाजारियों पर अंकुश लगाने के बारे में कोई सोच नहीं रखता। उसको सिर्फ आगामी लोकसभा चुनावों की फिक्र है। खैर! अगला हफ्ता हकीकत को परत-दर-परत खोलेगा।
कानून और व्यवस्था के हाल यह हैं कि राजधानी के अजमेरी गेट पर स्थित पुलिस कंट्रोल रूम के सामने मिले नरमुण्ड की तरह ही सिविल लाइन्स क्षेत्र में रेल्वे लाइन पर फिर एक नरमुण्ड मिला। पहिले वाले नरमुण्ड की गुत्थी अभी तक नहीं सुलझ पाई है और दूसरा नरमुण्ड मिल गया। कहा जा रहा है कि जब तक धड़ नहीं मिलेगा, नरमुण्ड की गुत्थी सुलझना मुश्किल है। हालांकि नरमुण्ड से जुडी गुत्थी परिजनों के कारण सुलझ गई!
चोरी, डकैती की वारदातों में भी इजाफा होता नजर आ रहा है। ऐसा लगने लगा है कि अफसरों का मन अपने कामकाज में नहीं लग रहा है और उनक सारा सोच और एनर्जी अपने तबादले की जुगत बैठाने में लग रही है। दूसरी समस्या है वर्ष का आखरी सप्ताह! हर एक सरकारी अफसर और कर्मचारी अपनी छुट्टियां लैप्स नहीं होने देना चाहता है। नतीजन जरूरत नहीं होने के बावजूद सरकारी अफसर और कर्मचारी अवकाश लेकर घर में धूप सेक रहे हैं। उनका सोच यह भी है कि बकाया छुट्टियों के सद्उपयोग के साथ-साथ नई सरकार के रंग-ढंग चाल-ढाल को भी पैनी नजर से परख लिया जाये।
उधर सरकार की ग्यारह सूत्रीय 60 दिवसीय कार्ययोजना भी तैयार नहीं हो पा रही है। अब यह कहा जा रहा है कि उक्त योजना 30 दिसम्बर तक ही तैयार हो पायेगी और नये साल जनवरी, 2014 से ही लागू हो सकेगी।
जीत का जश्र मनाने वालों की सरकार और सरकारी तंत्र के ढीले-ढाले रवैये से अवाम नाराज होना शुरू हो गया है। उसे धीरे-धीरे ऐहसास होने लगा है कि नया निजाम भी उसे मंहगाई से निजात दिलाने और जमाखोरों -कालाबाजारियों पर अंकुश लगाने के बारे में कोई सोच नहीं रखता। उसको सिर्फ आगामी लोकसभा चुनावों की फिक्र है। खैर! अगला हफ्ता हकीकत को परत-दर-परत खोलेगा।


