चुनाव आचार सहिंता की पालना के मामले में अवाम सिर्फ इतना ही समझता है कि चुनावों के दौरान ऐसा कोई भी आचरण या कृत्य नहीं हो जो गैर कानूनी माना जाये! अगर अवाम का यह सोच गलत है तो फिर चुनाव आचार सहिंता लगाने का कोई औचित्य ही नहीं है। चुनाव आचार सहिंता ही लगाना गलत है।
प्रदेश में, खास कर प्रदेश की राजधानी जयपुर में चुनावी आचार सहिंता लागू होने के बाद गैर कानूनी और बिना इजाजत तामीर अवैध निर्माणों की सुनामी आ गई है। बजरी की उपलब्धता पर हाईकोर्ट के आदेशों के कारण संकट के बादल छाये हुए हैं। जयपुर मैट्रो सहित अन्य सरकारी प्रोजेक्टों का काम गम्भीर रूप से प्रभावित है, लेकिन जयपुर नगर निगम क्षेत्र में अवैध निर्माणों की गति लड़ाई के मैदान में फौज की सक्रियता से भी तेज है! निर्माण की गुणवत्ता को कोई देखने वाला नहीं है। सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर अवैध निर्माण करने वालों, बिना इजाजत गैर कानूनी तरीके से अवैध कॉमर्शियल काम्प्लेक्स बनाने वालों के खिलाफ शिकायत सुनने और उस पर कार्यवाही करने वाला जयपुर नगर निगम में कोई माई का लाल नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि जुम्मेदार अफसर भू-माफियाओं और सेठों की नोटों की गड्डियों के नीचे इतने दब गये हैं कि नजर आना ही मुश्किल है।
इन अवैध गैर कानूनी निर्माणों की आड़ में राजनेता करोड़ों का कालाधन भू-माफियाओं से बटोर रहे हैं। यह कालाधन अन्तत: चुनावों में ही तो काम आने वाला है। लेकिन चुनाव आयोग और उसके अधीनस्थ चुनावी मशीनरी का इन पर कोई अंकुश नहीं है। बल्कि अवैध निर्माणों को प्रश्रय देने वाले अफसर खुद चुनावी ड्यूटी से जुड़े हैं! नतीजन यह कहावत सिद्ध होती जा रही है कि सयां भये कोतवाल तो डर काहे का! अब अगर अवाम चुनाव आचार सहिंता को बेमानी समझता है तो दोष किसका!
हमें ऐसे वक्त में गांधी के बारे में भी सोचने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। मोहनदास कमरमचंद गांधी अगर आज जिंदा होते तो क्या वे आज के भारत को अपने विचारों का भारत मानते! क्या वे देश में जडें जमाये बैठे भ्रष्टाचारियों, भू-माफियाओं, असरदार पूंजीपतियों-सरमायेदारों की देशद्रोही करतूतों से सहमत होते? कदापि नहीं! वे दु:खी होते ओर नाराज होकर अनशन पर बैठ जाते!
शायद भ्रष्टाचारियेां की हरकतों को अगर बापू कहीं से देख रहे होंगे तो उनकी आंखों से आंसू टपक रहे होंगे। वैसे भी गरीब, पीडि़त-शोषित वर्ग की आत्मा में बापू बसे हैं। मंहगाई, भ्रष्टाचार, अनाचार और अत्याचार से पीडि़त यह वर्ग जब आंसू बहाता है तब भी तो रोते हैं बापू के प्राण!
प्रदेश में, खास कर प्रदेश की राजधानी जयपुर में चुनावी आचार सहिंता लागू होने के बाद गैर कानूनी और बिना इजाजत तामीर अवैध निर्माणों की सुनामी आ गई है। बजरी की उपलब्धता पर हाईकोर्ट के आदेशों के कारण संकट के बादल छाये हुए हैं। जयपुर मैट्रो सहित अन्य सरकारी प्रोजेक्टों का काम गम्भीर रूप से प्रभावित है, लेकिन जयपुर नगर निगम क्षेत्र में अवैध निर्माणों की गति लड़ाई के मैदान में फौज की सक्रियता से भी तेज है! निर्माण की गुणवत्ता को कोई देखने वाला नहीं है। सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर अवैध निर्माण करने वालों, बिना इजाजत गैर कानूनी तरीके से अवैध कॉमर्शियल काम्प्लेक्स बनाने वालों के खिलाफ शिकायत सुनने और उस पर कार्यवाही करने वाला जयपुर नगर निगम में कोई माई का लाल नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि जुम्मेदार अफसर भू-माफियाओं और सेठों की नोटों की गड्डियों के नीचे इतने दब गये हैं कि नजर आना ही मुश्किल है।
इन अवैध गैर कानूनी निर्माणों की आड़ में राजनेता करोड़ों का कालाधन भू-माफियाओं से बटोर रहे हैं। यह कालाधन अन्तत: चुनावों में ही तो काम आने वाला है। लेकिन चुनाव आयोग और उसके अधीनस्थ चुनावी मशीनरी का इन पर कोई अंकुश नहीं है। बल्कि अवैध निर्माणों को प्रश्रय देने वाले अफसर खुद चुनावी ड्यूटी से जुड़े हैं! नतीजन यह कहावत सिद्ध होती जा रही है कि सयां भये कोतवाल तो डर काहे का! अब अगर अवाम चुनाव आचार सहिंता को बेमानी समझता है तो दोष किसका!
हमें ऐसे वक्त में गांधी के बारे में भी सोचने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। मोहनदास कमरमचंद गांधी अगर आज जिंदा होते तो क्या वे आज के भारत को अपने विचारों का भारत मानते! क्या वे देश में जडें जमाये बैठे भ्रष्टाचारियों, भू-माफियाओं, असरदार पूंजीपतियों-सरमायेदारों की देशद्रोही करतूतों से सहमत होते? कदापि नहीं! वे दु:खी होते ओर नाराज होकर अनशन पर बैठ जाते!
शायद भ्रष्टाचारियेां की हरकतों को अगर बापू कहीं से देख रहे होंगे तो उनकी आंखों से आंसू टपक रहे होंगे। वैसे भी गरीब, पीडि़त-शोषित वर्ग की आत्मा में बापू बसे हैं। मंहगाई, भ्रष्टाचार, अनाचार और अत्याचार से पीडि़त यह वर्ग जब आंसू बहाता है तब भी तो रोते हैं बापू के प्राण!


