दो राजनैतिक पार्टियों के दिग्गज सत्तासीन होने के लिये आरोपों-प्रत्यारोपों की गंदी छीछालेदर में जुटे हैं! वे एक दूसरे पर आरोपों की इस कदर बौछार कर रहे हैं मानो इन आरोपों की वैतरणी के जरिये चुनावी स्वर्ग में पहुंच ही जायेंगे। नरेन्द्र मोदी हों या फिर राहुल गांधी! दोनों ही के भाषणों के तोप दड़ों से बेचारा अवाम अपने आप को आहत, अपमानित महसूस करने लगा है। मंहगाई से अवाम कितना पीडि़त है, यह इस बात से ही अंदाज लगाया जा सकता है कि देश में प्याज 60 रूपये से सौ रूपये किलो में बिक रहा है। हालांकि सस्ता प्याज बेचने के लिये चुनाव आयोग ने सरकार को इजाजत दे दी है।
लेकिन भाजपा-एनसीपी और कांग्रेस पार्टियां अपने स्तर से जमाखोरों-कालाबाजारियों के खिलाफ कार्यवाही हेतु एक शब्द भी नहीं बोल रहे हैं। उन्हें चाहिये कि वह चुनाव आयुक्त से गुजारिश करें कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उन राज्यों के लोकायुक्त को चुनाव आयुक्त निर्देशित करें कि वे अपने राज्य में जमाखोरों और कालाबाजारियों के खिलाफ कार्यवाही करें और इस हेतु लोकायुक्तों को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल मुहैया करवाया जाये। अगर ऐसा होता है तो जमाखोरों-कालाबाजारियों पर अंकुश लगेगा और मंहगाई का नाग अपने फन नहीं उठायेगा।
सभी राजनैतिक पार्टियों के आकाओं को अब फिर यह समझ लेना चाहिये कि सत्ताधीशों को अवाम, अवाम के भले के लिये चुनता है। चुनिन्दा सत्ताधीशों की पहली और आखिरी जुम्मेदारी अवाम के हितों की सुरक्षा है। अगर सत्ताधीश अवाम के हितों की सुरक्षा करने में विफल रहते हैं तो उन्हें सत्ता में रहने का भी हक नहीं होता है! अब चुनावी चकल्लस में जुटे राजनेता ही तैय करें कि वे चाहते क्या हैं?
लेकिन भाजपा-एनसीपी और कांग्रेस पार्टियां अपने स्तर से जमाखोरों-कालाबाजारियों के खिलाफ कार्यवाही हेतु एक शब्द भी नहीं बोल रहे हैं। उन्हें चाहिये कि वह चुनाव आयुक्त से गुजारिश करें कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उन राज्यों के लोकायुक्त को चुनाव आयुक्त निर्देशित करें कि वे अपने राज्य में जमाखोरों और कालाबाजारियों के खिलाफ कार्यवाही करें और इस हेतु लोकायुक्तों को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल मुहैया करवाया जाये। अगर ऐसा होता है तो जमाखोरों-कालाबाजारियों पर अंकुश लगेगा और मंहगाई का नाग अपने फन नहीं उठायेगा।
सभी राजनैतिक पार्टियों के आकाओं को अब फिर यह समझ लेना चाहिये कि सत्ताधीशों को अवाम, अवाम के भले के लिये चुनता है। चुनिन्दा सत्ताधीशों की पहली और आखिरी जुम्मेदारी अवाम के हितों की सुरक्षा है। अगर सत्ताधीश अवाम के हितों की सुरक्षा करने में विफल रहते हैं तो उन्हें सत्ता में रहने का भी हक नहीं होता है! अब चुनावी चकल्लस में जुटे राजनेता ही तैय करें कि वे चाहते क्या हैं?


