अग्रगामी संदेश हिन्‍दी साप्ताहिक ***** प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित एवं प्रसारित ***** सटीक राजनैतिक विश्लेषण, लोकहित के समाचार, जनसंघर्ष का प्रहरी

क्रान्तिकारी शासन व्यवस्था चाहता है अवाम!

गत शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में  माना है कि मतदाताओं को चुनावों में खड़े उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला आम अवाम की आवाज को बुलंद करता है।
जब संसद में सांसदों को हां या ना के साथ-साथ मतदान से अनुपस्थित रहने का अधिकार है तो मतदाता को उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार भी होना चाहिये।
मतदाता को उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार मिलने के कई फायदे हैं। जो लोग चुनावों के वक्त अपने मत का प्रयोग नहीं करते हैं, वे अपने मत का प्रयोग करने में रूचि लेंगे और मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा। वहीं फर्जी मतदान पर भी अंकुश लगेगा। राजनैतिक दलों पर भी दबाव पड़ेगा कि अगर उन्होंने दागियों को उम्मीदवार बनाया और मतदाता ने उन्हें नकार दिया तो उनकी फजीहत होगी। नतीजन वे उम्मीदवारों के चयन में सावधानी बरतेंगे। यही नहीं चुनावों  में धांधलियों पर भी राइट टू रिजेक्ट का असर गहराई से होगा। उम्मीदवारों को यही डर सताता रहेगा कि कहीं मतदाता भारी तादाद में राइट टू रिजेक्ट का बटन न दबा दें।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले को लागू करने हेतु कोई समय सीमा तैय नहीं की है और अब न्यायालय के फैसले को लागू करवाने की जुम्मेदारी चुनाव आयोग  और सरकार की है कि वे उसे कब लागू करते हैं। तत्काल प्रभाव से या फिर आगामी विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव सम्पन्न होने के बाद! यह भी हो सकता है कि सरकार इस फैसले के खिलाफ अपील भी दायर कर दे! वैसे राइट टू रिजेक्ट के प्रावधान विश्व के 13 से ज्यादा देशों में पहिले से ही लागू है। जिनमें यूक्रेन, यूनान, फ्रांस, ब्राजिल, बेल्जियम, चिली, अमरीका का नेवाद प्रांत, फिनलैण्ड, स्वीडन, बांग्लादेश, कोलम्बिया शामिल है।
यहां एक सवाल गम्भीरता से उठाया जाना चाहिये कि जनहित से सम्बन्धित ज्यादातर फैसले न्यायपालिका के जरिये आ रहे हैं, जबकि इसके लिये यह विधायिका का कार्य क्षेत्र है। आखीर अवाम के द्वारा चुनिन्दा विधायिका और उसके आधीन कार्यपालिका क्यों लगातार अपने दायीत्वों से विमुख हो रहे हैं। चुनिन्दा विधायिका और उसके आधीन गठित कार्यपालिका अगर इसही तरह अपने दायीत्वों से विमुख होते रहे तो विधायिका में बैठे चुनिन्दा जनप्रतिनिधियों ओर सत्ताधीशों को जन आक्रोश का सामना करने के लिये तत्पर हो जाना चाहिये। इस बार अवाम गांधी, जयप्रकाश नारायण का इन्तजार करने वाला नहीं है। अवाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के क्रान्तिकारी संघर्ष को याद करने लगा है और उनकी राष्ट्रवादी क्रान्तिकारी वैज्ञानिक समाजवादी शासन व्यवस्था को स्थापित करवाने के लिये तत्पर होता जा रहा है।

 
AGRAGAMI SANDESH

AGRAGAMI SANDESH
AGEAGAMI SANDESH

मुख्‍य पृष्‍ठ | जयपुर संस्‍करण | राज्‍य समाचार | देश समाचार | विज्ञापन दर | सम्‍पर्क