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क्या हमें ऐसा लोकतंत्र चाहिये? जहां तंत्र गण का गला घोटने में लगा हो!

 जयपुर (अग्रगामी) देश के पांच राज्यों दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में विधानसभा चुनावों के लिये इस ही सप्ताह किसी भी समय चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर सकता है। इन पांच विधानसभा चुनावों को आगामी आम चुनावों के पहिले मिनी आम चुनाव के रूप में देखा जा रहा है। इस बार छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश और राजस्थान में सत्तारूढ दलों की सरकारों ने अवाम के खून पसीने की कमाई को दैनिक समाचार पत्रों, इलेक्ट्रोनिक मीडिया को जीभर कर विज्ञापन देकर लुटवाया! पक्ष-विपक्ष के राजनैतिक दलों ने यात्रायें निकाली। राजस्थान में सुराज संकल्प यात्रा से शवयात्रा तक राजनैतिक दलों ने निकाली। राजनेताओं को मुकुट, तलवारें, तीर-कमान यहां तक की गदा भी भेंट की गई! उन्होंने इन्हें धारण भी किया!
पूरे राजस्थान में पक्ष-विपक्ष के नेता, खास कर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के दिग्गज दे दनादन दे की तर्ज पर अपने विरोधियों पर आरोप-प्रत्यारोपों की बौछारों में जुटे रहे। किसी एक भी माई के लाल ने यह नहीं कहा कि प्रदेश की जनता मंहगाई से त्रस्त है और मंहगाई पर काबू पाने के लिये जमाखोरों-कालाबाजारियों पर छापे मारे जायें। अगर ऐसा करते तो शायद जनता को राहत मिलती, लेकिन उनके चुनावी चंदों पर अघोषित बंदिश लग जाती। क्योंकि ज्यादातर चुनावी चंदा जमाखोरों-कालाबाजारियों, भू-माफियाओं और अन्य कालाधन्धा कर काला धन इकठ्ठा करने वाले पूंजीपतियों-धन्नासेठों से ही तो आता है।
राजस्थान में सरकार ने अवाम की गाढी कमाई से मिले सरकारी राजस्व को विज्ञापनों के जरिये बड़े अखबारों को लुटवाने के अलावा ऐसी योजनाओं और कार्यक्रमों में धन लुटवाया है जो हकीकत में उद्देश्यपूर्ण हैं ही नहीं! विज्ञापनों और मुफ्त की खैरात बांटने भर से क्या अवाम के दु:खदर्द दूर हो जायेंगे।
कम्बल-साडी वितरण, वृद्धावस्था पेंशन के आधे से ज्यादा मामले ऐसे हैं जिन पर अंगुलियां उठ रही हैं। प्रशासन शहरों के संग और प्रशासन गांवों की ओर कार्यक्रमों ने पूरे प्रशासन को पंगू बना कर रख दिया। आम अवाम को रोजमर्रा के कामकाज के लिये सरकारी दफ्तरों-अफसरों के आगे भटकना पड़ा, मिन्नतें करनी पड़ी! प्रशासन शहरों के संग हो या फिर गांवों की ओर, रसूखदारों तथा हुक्कामों और अहलकारों की जेब गरम करने वालों के काम दनादन होते रहे और गरीब, पीडि़त वर्ग हुक्कामों और सरकारी दफ्तरों में जूते-चप्पल चटकाते रहे, घिसते रहे और हार थक कर बिना काम हुए मायूस होकर लौट गये!
जननी सुरक्षा योजना हो या मुफ्त दवाई वितरण योजना! खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जाकर देखलें, अस्पतालों, दवाखानों में इन योजनाओं की बद्हाली। छात्र-छात्राओं को लेपटाप, टेबलेट वितरण की आपाधापी में मुख्यमंत्री यह भूल गये कि स्कूलों में अध्यापक ही नहीं है! अब बच्चे क्या लेपटाप, टेबलेट से अध्ययन करेंगे? क्या लेपटाप-टेबलेट उनके कोर्स पूरा करवा देंगे, ताकि वे परीक्षा में पास हो जायें?
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती वसुन्धरा राजे भी चार साल से अधिक समय तक कोप भवन में रहीं। अपनी पार्टी में अपनों से ही अपने गुरूर के चलते उलझती रही। पार्टी में अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिये वे कोप भवन में जा बिराजी! वे भूल गई राज्य की जनता के दु:खदर्दों को! भूल गई अवाम की पीड़ा को! उनके सामने सिर्फ एक ही लक्ष्य रहा कि उनकी सुपरमेसी कायम रहे। जब भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया और राज्य का भावी मुख्यमंत्री आरोपित किया तब वसुन्धरा राजे निकली अपने कोप भवन से और निकाल डाली सुराज संकल्प यात्रा! दूसरे शब्दों में कहा जाये कि राजस्थान में सत्ता प्राप्ति के लिये श्रीमती वसुन्धरा राजे की संकल्प यात्रा।
कांग्रेस-भाजपा की सत्ता प्राप्ति की आपाधापी में सरकारी अफसर और सरकारी कर्मचारी बेलगाम हो गये। सरकार और विपक्ष की भाजपा, सरकार के अफसरों और कारिंदों को बेलगाम होते देख रहे हैं क्योंकि उनकी नजर में सत्ता प्राप्ति की चाबी अफसरों और कर्मचारियों के हाथ में है। भाजपा और कांग्रेस अवाम की वोट की ताकत से ज्यादा, अफसरों-कर्मचारियों की ताकत नजर आती है। नतीजन पिछले चार महिनों से राज्य में अफसर-कर्मचारी पूरी तरह से निरकुंशित हैं। चुनिंदा जनप्रतिनिधियों का नियन्त्रण पूरी तरह से खत्म हो चुका है।
अगर हम राजस्थान की राजधानी को ही लें, तो पूरे जयपुर नगर निगम क्षेत्र में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण, गैरकानूनी निर्माणों की बाढ आ गई है। नतीजन अवाम तो परेशान है ही, खुद नगर निगम को भू-माफियाओं और नगर निगम के अफसरों-कारिंदों की मिलीभगत से पिछले तीन सालों में एक हजार करोड़ रूपये से ज्यादा के राजस्व का चूना लग चुका है और यह क्रम निरन्तर जारी है। अफसरों और नेताओं की जेबें मोटी और भारी होती जा रही है और आम अवाम का पेट धंसता जा रहा है, न जाने कब गरीब, शोषित -पीडि़त अवाम की कमर और पेट एक हो जाये!
क्या इसे ही लोकतंत्र कहते हैं? क्या इसे ही जनतंत्र कहते हैं जहां जन का, तंत्र गला घोट रहा है। श्रीमती वसुन्धरा राजे के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के राजनेता और अशोक गहलोत और डॉ.चंद्रभान की अगुआई में सत्ता के लिये दौडधूप और उछलकूद कर रहे राजनेता सोच कर बतायें कि क्या ऐसा जनतंत्र/लोकतंत्र होना चाहिये?

 
AGRAGAMI SANDESH

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AGEAGAMI SANDESH

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