भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा बताया जाता है कि यूपीएनीत कांग्रेस की अगुआई वाली डॉ.मनमोहन सिंह सरकार द्वारा दागियों को बचाने के लिये राष्ट्रपति के पास भेजा गया आध्यादेश बकवास है और उसे फाड़ कर फैंक दिया जाना चाहिये! राहुल के इस कथन और राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की सख्ती ने डॉ.मनमोहन सिंह सरकार को दागियों को बचाने वाला आध्यादेश वापस लेने पर मजबूर कर दिया है।
वैसे देखा जाये तो दागियों को बचाने की जुगत बैठाने के लिये लाया जा रहा मात्र यह आध्यादेश ही फाड़ कर फैंकने लायक नहीं है, बल्कि इस तरह का जनहित विरोधी कार्य करने वाली डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार ही उखाड़ फैंकने लायक है। संसद में दागियों को बचाने वाला बिल अटक गया। इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने दागियों से सम्बन्धित अपने फैसले को कायम रखा था। लेकिन फिर भी सत्ता में बैठे सत्ताधीश दागियों को बचाने की जुगत बैठाते रहे!
हमारे राजनैतिक दलों के आकाओं को भी दागियों केा बचाने की जुगत बैठाते शर्म नहीं आई! सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य फैसले से भी राजनैतिक पार्टियों के आकाओं के मुंह पर एक तमाचा पड़ा है। फैसला साफ करता है कि चुनावों में खड़े उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार मतदाता को है। ऐसी स्थिति में अगर दागियों को सरकार ने बचाने की बेतुकी कोशिश की तो मतदाता उसे रिजेक्ट कर देगा, तब जो फजीहत राजनेताओं की होगी, शायद सत्ताधीशों ने सोचा भी नहीं होगा!
खैर जरूरत इस बात की है कि सरकार ने दागियों को बचाने के लिये जो अध्यादेश राष्ट्रपति के पास भेजा है उसे जनमत और देश के राष्ट्रपति और प्रथम नागरिक के साथ-साथ सत्तारूढ पार्टी के उपाध्यक्ष के सख्त विरोध के मद्देनजर, सरकार तत्काल वापस लेकर अवाम के फैसले को स्वीकार करें।
वैसे देखा जाये तो दागियों को बचाने की जुगत बैठाने के लिये लाया जा रहा मात्र यह आध्यादेश ही फाड़ कर फैंकने लायक नहीं है, बल्कि इस तरह का जनहित विरोधी कार्य करने वाली डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार ही उखाड़ फैंकने लायक है। संसद में दागियों को बचाने वाला बिल अटक गया। इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने दागियों से सम्बन्धित अपने फैसले को कायम रखा था। लेकिन फिर भी सत्ता में बैठे सत्ताधीश दागियों को बचाने की जुगत बैठाते रहे!
हमारे राजनैतिक दलों के आकाओं को भी दागियों केा बचाने की जुगत बैठाते शर्म नहीं आई! सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य फैसले से भी राजनैतिक पार्टियों के आकाओं के मुंह पर एक तमाचा पड़ा है। फैसला साफ करता है कि चुनावों में खड़े उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार मतदाता को है। ऐसी स्थिति में अगर दागियों को सरकार ने बचाने की बेतुकी कोशिश की तो मतदाता उसे रिजेक्ट कर देगा, तब जो फजीहत राजनेताओं की होगी, शायद सत्ताधीशों ने सोचा भी नहीं होगा!
खैर जरूरत इस बात की है कि सरकार ने दागियों को बचाने के लिये जो अध्यादेश राष्ट्रपति के पास भेजा है उसे जनमत और देश के राष्ट्रपति और प्रथम नागरिक के साथ-साथ सत्तारूढ पार्टी के उपाध्यक्ष के सख्त विरोध के मद्देनजर, सरकार तत्काल वापस लेकर अवाम के फैसले को स्वीकार करें।


