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क्या हमारे सन्त मुख्यधारा में लौटेंगे!

पिछली 21 जुलाई से जयपुर में एसएमएस इन्वेस्टमेंट ग्राउंड पर मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर के प्रवचन चल रहे जिनका कल लगभग समापन हो गया! इस ग्राउंड पर भीड़ जुटाने के लिये श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन एकता की बांग लगाई गई थी, लेकिन इस कथित श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन एकता की नौटंकी का पाखण्ड उजागर हो गया। खुद मुनि तरूण सागर ने पिछले दिनों इस पाखण्ड को उजागर करते हुए पांडाल में श्रोताओं के सामने साफ-साफ कहा था कि जैन एकता हो यह हमारा प्रयास नहीं है। मुनि चंद्रप्रभ सागर उनके पास ही बैठे थे और श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता की बांग देने वालों में से कुछ पंडाल में श्रोताओं की अगली पंक्ति में बिराजमान थे।
एसएमएस इन्वेस्टमेंट ग्राउंड पर मुनि ललितप्रभ सागर, चंद्रप्रभ सागर एवं मुनि तरूण सागर के प्रवचनों के लिये बनाये गये पंडाल में भीड़ जुटाने के लिये मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के शामिल होने की अफवायें उड़ती रहीं, लेकिन उनको नहीं आना था और वे नहीं आये।
वैसे हमारे प्रवचनभट्ट मुनियों ने उनके अनुसार जोरदार धमाकेदार दिव्य सत्संग आध्यात्मिक प्रवचन और कड़वे प्रवचन होते रहे। बहुत कुछ उन्होंने श्रोताओं को दिया, परन्तु क्या दिया और क्या श्रोताओं ने गृहण किया, यह शायद उनको भी पता नहीं है!
पिछले सप्ताह पंडाल में जन्माष्टमी का कार्यक्रम बड़े जोशोखरोश के साथ मनाया गया। कृष्ण-मीरा और गोपियां पंडाल में नजर आई। मुनिश्री का धमाकेदार प्रवचन भी हुआ। वैसे जन्माष्टमी हमारे जीवन का तो महत्वपूर्ण पर्व है। क्योंकि जन्माष्टमी हमारे परिजन का जन्मदिन है और उनके जीवन की शुरूआत का प्रथम दिन है तथा कृष्ण के सम्पूर्ण चारित्रिक कर्म से हमारा जीवन प्रभावित है। लेकिन हमारे मुनिवरों को कृष्ण-मीरा और गोपियों की लीलायें तो नजर आ गई, लेकिन उन्हें कृष्ण का योगीराज स्वरूप नजर नहीं आया। कंस प्रकरण से लेकर कुरूक्षेत्र में अर्जुन को उपदेश देने और इन प्रकरणों के आगे-पीछे और बीच में कृष्ण का योगी स्वरूप नजर आता है! लेकिन अपने प्रवचन और कार्यक्रम में वे योगीराज कृष्ण को याद ही नहीं कर पाये!
अब इन प्रवचनभट्ट मुनियों को क्या कहा जाये? जिन मुनियों को जैन संस्कृति के इतिहास, भारत के जिन और वैदिक संस्कृति के इतिहास के बारे में शून्य से ज्यादा जानकारी न हो उनके कथित प्रवचनों से समाज और देश का कितना और क्या भला हो सकता है? यह तो वे खुद ही बता सकते हैं! पिछले दिनों चौरासी कोस परिक्रमा का पाखण्ड उजागर हुआ था और इसके साथ ही उजागर हुई आसाराम की कुछ कथित हरकतें। हकीकत में आसाराम सन्यासी है ही नहीं! उन पर लगे चारित्रिक आरोपों को अलग रख कर देखें तो उन्होंने कभी सन्यास नहीं लिया! उन्होंने किसी आचार्य, साधू, सन्यासी से दीक्षा नहीं ली और न ही सन्यास! वे विशुद्ध कथा वाचक हैं। उन्होंने अपनी सम्पत्तियों पर अपने पुत्र और रिश्तेदारों को काबिज करवा रखा है।
सवाल उठता है कि जिस रास्ते आसाराम, कृपालूजी, सुधांशुजी व अन्य कथावाचक चल रहे हैं, उस रास्ते क्या जैन सन्त एवं जैन संस्कृति के अनुयायी चल सकते हैं, तो जवाब साफ और सटीक है कि नहीं! फिर भी अगर वे इन के हमराह होते हैं, तो क्यों वे जैन संस्कृति से जुड़े हैं, क्यों जैन समुदाय का अपने हित साधन में सहारा लेते हैं? बैठें अपने मठों में!
हमारे प्रवचनभट्ट मुनियों ने ईसा पूर्व 543 से, जब तेईसवें तीर्थंकर पाश्र्ववीरभट्ट का 70 वर्ष की आयु में देहान्त हुआ और उनके पुत्र बिम्बीसार का 15 वर्ष की आयु में उनकी माता हर्यक (प्रभा सुन्दरी/प्रभावती) के संरक्षण में श्रेष्ठ श्रेणिक (सवोच्च सेनापति) की पद्वी देकर राज्यारोहण हुआ तब से ईसा पूर्व 2050 तक के जिन संस्कृति एवं इस से टूट कर अलग हुए बौद्ध मत के पतन के इतिहास का अगर विस्तृत अध्ययन किया होता तो वे मठाधीश प्रवचनभट्ट मुनि न हो कर जैन संस्कृति के पुनरूत्थान के लिये संघर्षरत जिनशासन के संघर्षशील सन्यासी होते!
जैन संस्कृति में त्याग को महत्व दिया गया है और इसका पालन जैन समुदाय के साधु-सन्तों, मुनियों को करना अनिवार्य है। उम्मीद की जानी चाहिये कि हमारे जो सन्त मुनि पटरी से नीचे उतर रहे हैं, वे वापस मुख्यधारा में लौटेंगे!

 
AGRAGAMI SANDESH

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