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हम कायल हैं वरिष्ठ आईएएस जेसी महन्ति की बेबाक टिप्पणी के!

इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता प्रकरण में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जे.सी.महन्ति की बेबाक टिप्पणी चुनिन्दा जनप्रतिनिधियों की आंखें खोलने वाली है।
रत्ना गुप्ता का आखीर कसूर क्या था? सिर्फ यही कि उन्होंने विधानसभा की एक समिति को अपने कब्जे के रेकार्ड दिखाने से मना कर दिया था और यह कि वे विधानसभा की विशेषाधिकार समिति के सामने पेश नहीं हुई!
इन और इनसे जुड़े मुद्दों पर विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित कर रत्ना गुप्ता को एक माह के कठोर कारावास की सजा का फैसला लिया गया है। विधानसभा के इस फैसले के खिलाफ इन्पेक्टर रत्ना गुप्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की है।
हम विधानसभा में रत्ना गुप्ता प्रकरण में लिये गये निर्णय पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं और चूंकि मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है, ऐसी स्थिति में प्रकरण के गुणावगुण, पक्ष-विपक्ष पर भी हम टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं। विधानसभा (विधायिका) ने अपना काम किया और अब न्यायपालिका अपना काम करेगी!
लेकिन वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जे.सी.महन्ति की टिप्पणियों के संदर्भ में अवाम कुछ सवाल तो हमारे चुनिन्दा जनप्रतिनिधियों से पूछ ही सकता है! हम चुनिन्दा जनप्रतिनिधियों के विशेषाधिकारों के हनन के मामलों पर भी कुछ नहीं कहना चाहते हैं, क्योंकि यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र का मामला है। हमारा सीधा-सीधा सवाल है कि राजस्थान में राज्य कर्मचारी की नियुक्ति से लेकर उसके सेवानिवृति तक सेवाकाल के लिये क्या कोई सेवा नियम बने हैं? यदि हां तो क्या इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता ने अपने सेवाकाल में इन सेवा नियमों का उलंघन किया और क्या सेवा नियमों के उलंघन के लिये उन्हें दण्डित किया गया?
हमारा दूसरा सवाल बिल्कुल सटीक और साफ है कि राजस्थान में पुलिस फोर्स एक अनुशासित कैडर है और उसको अनुशासित रखने के लिये स्थापित नियम हैं। इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता को अनुशासित कैडर के रूप में अपने उच्च अधिकारी के आदेशों-निर्देशों की पालना अनिवार्य है। क्या इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता ने अपने किसी भी स्थापित उच्च अधिकारी के आदेशों की पालना में कोताही बर्ती या फिर आदेश पालना से इन्कार किया? यदि हां! तो फिर उनके खिलाफ क्या अनुशासनात्मक कार्यवाही हुई?
तीसरा और अहम सवाल यह है कि क्या राजस्थान विधानसभा की कोई कमेटी, इन्सपेक्टर रेंक के किसी पुलिस अधिकारी की तत्काल उच्च अधिकारी हो सकती है? क्योंकि इन्सपेक्टर रेंक के पुलिस थाना अधिकारी का तत्काल उच्च अधिकारी उपपुलिस अधीक्षक या पुलिस उपायुक्त होता है और स्थापित कानूनों के तहत वह ही प्रशासनिक एवं फील्ड सम्बन्धि आदेश पालनार्थ उसे दे सकता है। अब यहां सवाल यह भी उठता है कि राजस्थान पुलिस सेवा नियमों में क्या कहीं लिखा है कि एक इन्सपेक्टर रेंक की जूनियर पुलिस अधिकारी विधानसभा की किसी कमेटी की सीधे-सीधे मातहत होगी!
यहां एक अहम सवाल यह भी उठता है कि जब विधानसभा की कमेटी इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता के पुलिस थाने का आकस्मिक निरीक्षण करने गई तब उस थाने के तत्कालीन उच्च अधिकारी क्या विधानसभा की कमेटी के साथ थाने पर उपस्थित थे और क्या इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी ने थाना अधिकारी इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता को रेकार्ड पेश करने के आदेश दिये और क्या इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता ने अपने वरिष्ठ अधिकारी या अधिकारियों के आदेश की अवहेलना की और उसे मानने से इन्कार किया? यदि हां तो इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता के खिलाफ क्या अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई? अगर नहीं तो क्यों?
सवाल यह भी उठता है कि अगर विधानसभा की कमेटी द्वारा इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता के प्रभार वाले थाने के आकस्मिक निरीक्षण के दौरान उस थाने के वरिष्ठ प्रभारी अधिकारी एसीपी या डीसीपी वहां मौजूद नहीं थे तो क्यों? और विधानसभा की कमेटी के अध्यक्ष एवं सदस्यों ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को मौके पर क्यों नहीं बुलवाया? क्या इन्हें पुलिस के जूनियर अधिकारियों के सेवा नियमों और पुलिस मैन्युअल की जानकारी नहीं थी? अगर नहीं थी तो क्यों?
एक सवाल यहां यह भी उठता है कि राजस्थान विधानसभा में पूछे जाने वाले सवाल विधानसभा से सरकार और सरकार से सम्बन्धित सरकारी विभागों में जाते हैं। उनका उत्तर भी उलट उसी क्रम में विधानसभा में पहुंचता है! ठीक इस ही तरह विधानसभा की किसी भी कमेटी का दौरा और दौरे के दौरान निरीक्षण राज्य सरकार के प्रतिनिधि की मौजूदगी में होने की स्थापित प्रक्रिया है! क्या पुलिस अफसरों ने जिन में महानिदेशक पुलिस से लेकर सम्बन्धित एसीपी भी शामिल है, ने इस प्रक्रिया का पालन किया और अगर नहीं तो क्यों?
यहां इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता को विधानसभा से सजा सुनाई यह बहस का मुद्दा नहीं है। क्योंकि विधानसभा को जो उचित लगा वह उसने किया और मामला अब सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है तो फैसला वहां होगा!
यहां सवाल यह है कि पुलिस फोर्स राज्य का एक अनुशासित कैडर है। इस अनुशासित कैडर को उनके लिये निर्धारित कानूनों, नियमों और पुलिस मैन्युअल के अनुसार काम करना चाहिये या नहीं! दिखने में तो इन्सपेक्टर रत्ना गुप्ता का मामला साधारण सा ही लगता है। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जे.सी.महन्ति की टिप्पणियां भी चुभने वाली हो सकती है, लेकिन ये सब साधारण या चुभने वाली नहीं हैं, ये उजागर कर रही है व्यवस्था की गम्भीर खामियों को! हमें व्यवस्था की गम्भीर खामियों और व्यवस्था से जुडे हर अंग को अपने दायरे में रख कर शासन-प्रशासन को सक्षम बनाने के लिये दुरूस्त करना होगा। सिर्फ अहम की तुष्टि के लिये फैसले नहीं लिये जा सकते हैं क्योंकि इनके परिणाम आगे जाकर अत्यन्त गम्भीर होंगे। वहीं विधायिका और कार्यपालिका को महन्ति जी के सोच को व्यवहारिक रूप से समझना होगा और सार्थक कदम उठाने होंगे, अवाम के हित में।

 
AGRAGAMI SANDESH

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