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समय है जैन मुनियों को मंथन करने का!

जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिये जाने की मांग अब तेजी से जोर पकडऩे लगी है। कुछ स्वार्थी पूंजीपति और उनके पुछल्ले इस मुहिम का बेजा फायदा उठाने से बाज नहीं आ रहे हैं। जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिये विभिन्न जैन सामाजिक संगठनों और राष्ट्रवादी राजनैतिक पार्टियों की मुहिम को इन लोगों ने पिछले दिनों कुछ प्रवचनभट्ट मुनियों की आड़ लेकर श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता का पाखण्ड बनाने की कोशिश भी की! लेकिन इनके पल्ले धेला भी नहीं पड़ा। कहावत है कि चार दिन की चांदनी फिर अन्धेरी रात! पूंजीपतियों के कालेधन से पांडाल और अन्य तामझाम खड़े कर, अपने चरण पूंजीपतियों से धुलवाकर प्रवचनों की बौछार कर इन प्रवचनभट्ट मुनियों ने अपने मन की भडास तो निकाल ली, लेकिन ठण्डे दिमाग से यह नहीं सोचा कि उनके प्रवचनों का क्या असर श्रोताओं पर हुआ? प्रवचनभट्टों ने प्रवचन दिये, भीड़ ने सुना-अनसुना किया और चल दिये!
आज जरूरत इस बात की है कि जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधनिक अधिकार मिले। जैन समाज का आम गरीब, मध्यम वर्ग बेचैन है, अपनी इस मांग को मनवाने के लिये। अगर हमारे प्रवचनभट्ट मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर अपने ओघे-पात्र, कमण्डल लेकर जैन समुदाय के परिवारों के दरवाजों पर पहुंचते और उन्हें अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिये प्रेरित करते और उनको साथ लेकर एक सशक्त आवाज जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिये उठाते तो उन्हें समझ में आ जाता कि समग्र जैन समुदाय तो एक ही समाज है, एक ही प्राण है।
अब भी वक्त है कि अपने आप को हमारा धर्माचार्य आरोपित करने वाले सन्यासी अपने गोचरी और आहार धर्म का ऋषभदेव के मानवधर्म सूत्र में वर्णित तरीके से पालन करें और समाज को जाग्रत करें तथा समझायें कि वे देश के संविधान में प्रदत्त अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिये सक्षमता से संघर्ष करें। यह हमारे कथित धर्माचार्यों का कर्तव्य ही नहीं दायीत्व है। हमें समाज के उन पूंजीपतियों सरमायेदारों से, जोकि पत्थर को गढने का दावा करते हैं, हालांकि वे उसमें भी अपना लाभ देखते हैं, से यही कहना है कि नये मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल बनवाने के स्थान पर जीवित मानवता का भविष्य सुधारने में अपनी दौलत का (चाहे वह काली हो या फिर गौरी) उपयोग करें।
एक बात पुन: हम अपने परिवार को त्याग कर सन्यासी बने मुनियों, साधु-साध्वियों से सविनय कहना चाहेंगे कि जब सबकुछ त्याग दिया तब क्यों वे प्राप्ति की लालसा रखते हैं? क्यों समाज के उत्थान हेतु कार्य करने के अपने दायीत्वों को नकारते हैं? वक्त है उनको विचारने, मंथन करने का या फिर सन्यास त्यागने का! क्योंकि आनेवाला वक्त उन्हें माफ नहीं करेगा!

 
AGRAGAMI SANDESH

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