देश के संविधान में एक शब्द है सेक्यूलर! हमारे राजनेताओं ने इसका हिन्दी रूपान्तरण कर डाला धर्म निरपेक्ष! विश्व के किसी भी शब्दकोष में सेक्यूलर शब्द का अर्थ धर्म निरपेक्ष नहीं है!
भारत के प्राचीन इतिहास को ही लें। महाभारत के युद्ध में अर्जुन अपने सामने आपने ही भाइयों, रिश्तेदारों और अन्य सम्बन्धियों को देख कर यह कहते हुए हथियार नीचे रख देता है कि मेरे सामने कोई दुश्मन नहीं है, सभी मेरे बन्धु-बांधव, रिश्ते-नातेदार हैं और मैं कैसे इनसे युद्ध लड़ सकता हूं? हकीकत भी यही थी कि जिन कौरवों से युद्ध लडऩा था, वे उसके अपने भाई थे। जिन अन्य योद्धाओं से युद्ध लडऩा था, वे उसके रिश्तेदार थे। वहां न कोई मजहब का सवाल था न ही साम्प्रदायिकता का! ऐसे में कृष्ण ने युद्ध भूमि में हथियार डाल कर लगभग समर्पण कर चुके अर्जुन को समझाया कि युद्ध करना उसका दायीत्व (धर्म) है और उसे निरपेक्ष (निर्लिप्त) भाव से अपने दायीत्व (धर्म) का पालन करना चाहिये। अर्थात उसे यह देखे बिना और यह सोचे बिना कि कौन उसका भाई है और कौन रिश्तेदार? निर्लिप्त (निरपेक्ष) भाव से सत्य और न्याय के लिये युद्ध कर अपने दायीत्व का निर्वहन करना चाहिये। गीता में इसका विस्तृत उल्लेख है और उस का गम्भीरता से अध्ययन किया जाना चाहिये!
इस ही तरह भारत गणतंत्र का संविधान भी यही कहता है कि देश के शासक निरपेक्ष (निर्लिप्त) भाव से अपना राजधर्म निभायें। देश और प्रदेश में चुनिन्दा या नियुक्त मंत्री और मुख्यमंत्री भी निरपेक्ष (निर्लिप्त) भाव से काम करने हेतु संवैधानिक शपथ लेते हैं। ऐसी स्थिति में यह धर्म निरपेक्ष शब्द बीच में कहां से आ टपका! हकीकत में सत्ताधीशों को निरपेक्ष (निर्लिप्त) भाव से राजधर्म निभाना है। न कि अपने राजधर्म से विमुख (धर्म निरपेक्ष) होना है।
अत: आवश्यक है कि निरपेक्ष शब्दा का अनर्थ पूर्वक किये जा रहे उपयोग पर तत्काल पाबन्दी लगाना आवश्यक है।
भारत के प्राचीन इतिहास को ही लें। महाभारत के युद्ध में अर्जुन अपने सामने आपने ही भाइयों, रिश्तेदारों और अन्य सम्बन्धियों को देख कर यह कहते हुए हथियार नीचे रख देता है कि मेरे सामने कोई दुश्मन नहीं है, सभी मेरे बन्धु-बांधव, रिश्ते-नातेदार हैं और मैं कैसे इनसे युद्ध लड़ सकता हूं? हकीकत भी यही थी कि जिन कौरवों से युद्ध लडऩा था, वे उसके अपने भाई थे। जिन अन्य योद्धाओं से युद्ध लडऩा था, वे उसके रिश्तेदार थे। वहां न कोई मजहब का सवाल था न ही साम्प्रदायिकता का! ऐसे में कृष्ण ने युद्ध भूमि में हथियार डाल कर लगभग समर्पण कर चुके अर्जुन को समझाया कि युद्ध करना उसका दायीत्व (धर्म) है और उसे निरपेक्ष (निर्लिप्त) भाव से अपने दायीत्व (धर्म) का पालन करना चाहिये। अर्थात उसे यह देखे बिना और यह सोचे बिना कि कौन उसका भाई है और कौन रिश्तेदार? निर्लिप्त (निरपेक्ष) भाव से सत्य और न्याय के लिये युद्ध कर अपने दायीत्व का निर्वहन करना चाहिये। गीता में इसका विस्तृत उल्लेख है और उस का गम्भीरता से अध्ययन किया जाना चाहिये!
इस ही तरह भारत गणतंत्र का संविधान भी यही कहता है कि देश के शासक निरपेक्ष (निर्लिप्त) भाव से अपना राजधर्म निभायें। देश और प्रदेश में चुनिन्दा या नियुक्त मंत्री और मुख्यमंत्री भी निरपेक्ष (निर्लिप्त) भाव से काम करने हेतु संवैधानिक शपथ लेते हैं। ऐसी स्थिति में यह धर्म निरपेक्ष शब्द बीच में कहां से आ टपका! हकीकत में सत्ताधीशों को निरपेक्ष (निर्लिप्त) भाव से राजधर्म निभाना है। न कि अपने राजधर्म से विमुख (धर्म निरपेक्ष) होना है।
अत: आवश्यक है कि निरपेक्ष शब्दा का अनर्थ पूर्वक किये जा रहे उपयोग पर तत्काल पाबन्दी लगाना आवश्यक है।


