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देश पर नात्सीवादी सामन्ती व्यवस्था थोपने की तैयारी!

नई दिल्ली/जयपुर (अग्रगामी) राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने भारतीय जनता पार्टी को नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के पद का दावेदार घोषित करने का अल्टीमेटम देकर साबित कर दिया है कि वह देश में अब प्रजातंत्र के अस्तित्व को अंकुशित करने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ गया है।
ज्ञातव्य रहे कि हिटलर के नात्सीवादी पद चिन्हों पर चल रहे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में सांस्थानिक चुनावों की कोई प्रक्रिया नहीं होती है। सर संघ संचालक की नियुक्ति उत्तराधिकार के रूप में की जाती है। यह भी एक हकीकत है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ इंडियन नेशनल कांग्रेस का राष्ट्रीय स्वंयसेवक दल के रूप में एक अंग रहा है और राष्ट्रीय स्वंयसेवक दल को इंडियन नेशनल कांग्रेय से तोड़ कर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के रूप में डॉ.हेगडेवार ने तब स्थापित किया था जब वे इण्डियन नेशनल कांग्रेस में राष्ट्रीय स्वंयसेवक दल के मुखिया थे। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के संस्थापक हेगडेवार के समय से ही संघ में उत्तराधिकार की प्रक्रिया संचालित है। यही नहीं डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में स्थपित हुए भारतीय जनसंघ की स्थापना भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की राजनैतिक शाखा के रूप में की गई थी। हालांकि समय-समय पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के आकाओं द्वारा यह कहा जाता रहा है कि संघ एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। साथ ही यह भी कहा जाता रहा कि भारतीय जनसंघ भी एक स्वतंत्र राजनैतिक पार्टी है और उसका आरएसएस से कोई सम्बन्ध नहीं है।
देश में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गये आपातकाल की समाप्ति के बाद महान क्रान्तिकारी नेता जयप्रकाश नारायण की सलाह और पहल पर देश में तब सक्रिय राजनैतिक पार्टियों का विलय कर जनता पार्टी की स्थापना की गई और चंद्रशेखर (अब स्वर्गीय) को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली जनता पार्टी ने हलधर चुनाव चिन्ह पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से चुनाव जीता तथा मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनाई। मोरारजी देसाई गये, चरण सिंह आये और चरण सिंह के बाद चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने! राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के गहरे दबाव के चलते जनता पार्टी टूटी और उसमें से निकली भारतीय जनता पार्टी! राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का भारतीय जनसंघ जैसा मुखौटा! यही नहीं महान क्रान्तिकारी जयप्रकाश नारायण के निर्देशन में उनकी सलाह और पहल पर बनी जनता पार्टी का अस्तित्व भी पिछले दिनों डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी से उनका भारतीय जनता पार्टी में विलय करवा कर समाप्त करवा दिया गया।
इस ही तरह लालकृष्ण आड़वानी को दरकिनार कर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के पद का दावेदार घोषित करने से भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का नात्सीवादी तानाशाही का असली चेहरा सामने आया है।
दरअसल राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का सिर्फ एक ही ऐजेंडा है कि वह भारत को एक हिन्दुत्ववादी राष्ट्र के रूप में बदले! अटल बिहारी वाजपेयी ने नेतृत्व और मार्गदर्शन में भारतीय जनता पार्टी एक राष्ट्रीय पार्टी बनने की ओर अग्रसर रही थी। लेकिन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को यह रास नहीं आया। आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ समान आचार संहिता, राममंदिर निर्माण और धारा 370 को हटाने के मुद्दों को लेकर आगामी चुनावों में अपने राजनैतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी को उतारना चाहता है ताकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिये भाजपा सत्ता पर काबिज हो सके और उसके हिन्दुत्ववादी ऐजेंडे लागू करवाये जा सकें!
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के हिन्दुत्ववादी ऐजेंडे के पूर्व में हिमायती रहे लालकृष्ण आड़वानी ने ही पार्टी में रहते हुए पिछले कुछ अर्से से विरोध करना शुरू किया है। उनके विरोध का दूसरा कारण उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी रही। मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज्य, अरूण जेटली, शत्रुघन सिन्हा, यशवन्त सिन्हा, जसवन्त सिंह जैसे भाजपा के कद्दावर नेता भी आरएसएस की पार्टी में बढ़ती दखलंदाजी से नाराज हैं। वैसे भी इन्हें पार्टी नेतृत्व ने नजरन्दाज कर रखा है! इस ही तरह पार्टी में असन्तुष्टों के साथ आड़वानी का एक अलग खेमा बनता जा रहा है। यही हाल प्रादेशिक स्तर के असन्तुष्ट भाजपा नेताओं का भी है। वे भी धीरे-धीरे आड़वानी खेमे का रूख कर रहे हैं और आगामी चुनावों तक आड़वानी खेमा सशक्त रूप में  स्थापित हो सकता है।
पिछले माह अगस्त तक भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व लोकसभा चुनावों में 170-180 सीटों और एनडीए घटक दलों के साथ मिलकर देश की सत्ता पर काबिज होने के मनसूबे पाले हुए था। लेकिन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के दबाव में आकर भाजपा नेतृत्व द्वारा नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने के बाद भाजपा का ग्राफ तेजी से नीचे जा रहा है। उडीसा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू, केरल और आंध्र में भाजपा का कोई वजूद नहीं है। वहीं उत्तर-पूर्व के नागालैण्ड, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय अरूणाचल, मणिपुर, राज्यों में भी भाजपा खाली हाथ रहेगी। असम में दो तीन सीटों के लिये मशक्कत हो सकती है। जम्मू-काश्मीर में जम्मू क्षेत्र में कुछ सीटों पर जीत की भाजपा उम्मीद कर सकती है। हिमाचल और उत्तराखण्ड में कांटे की टक्कर में कांग्रेस के आगे रहने की स्थिति है। पंजाब में इस बार अकाली-भाजपा की कांग्रेस से दमदार टक्कर रहेगी। हरियाणा-दिल्ली में कांग्रेस को पसीने आयेंगे। बिहार में भाजपा को इस बार पापड़ बेलने पड़ेंगे! झारखण्ड में भी इस बार भाजपा डांवाडोल ही रहेगी। गुजरात जहां नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री हैं और जिसके बूते पर वे प्रधानमंत्री पद के लिये हूंकार भर रहे हैं वहां भी कांग्रेस इस बार उन्हें जोरदार टक्कर देने की तैयारी कर रही है।
छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान सहित पांच राज्यों में दो माह बाद ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। शिवराज सिंह और डॉ.रमन सिंह की पहली प्राथमिकता रहेगी की वे अपनी कुर्सी बचायें। यही हालत दिल्ली की शीला दीक्षित और राजस्थान के गहलोत के रहेगी। दोनों ही अपनी कुर्सी बचाने के लिये जी जान से जुटे हैं। ऐसी स्थिति में दिल्ली दरबार के लिये मेहनत करने का इनके पास न तो वक्त है और न ही फुरसत!
उपरोक्त स्थिति में लोकसभा चुनावों में ताजा आंकलन के अनुसार भाजपा 132-155 सीटों के दायरे में ही सिमट कर रह जायेगी।
उधर तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल, डीएमके और एडीएमके तथा जनता दल यूनाइटेड लोकसभा चुनावों के दौरान एवं चुनावों के बाद भाजपा के साथ गठबंधन करने के लिये राजी नहीं हैं। अत: नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का केंद्र में सत्ता प्राप्ति का सपना कैसे पूरा होगा? इसका जवाब तो सिर्फ आरएसएस और नरेन्द्र मोदी के पास ही हो सकता है!
जहां तक राजस्थान का सवाल है कांग्रेस और भाजपा के बीच गहरा चुनावी घमासान जारी है। पिछले दिनों श्रीमती वसुन्धरा राजे ने जयपुर में स्वराज्य संकल्प यात्रा के समापन के समय अमरूदों के बाग में रैली कर अपना दमखम दिखलाया। रैली को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने भी सम्बोधित किया। रैली में बनाये गये तीन मंच इस बात के गवाह बने कि पार्टी में गहरी खेमेबाजी है। विधानसभा में विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया ने रैली को जिन शब्दों में सम्बोधित किया वह स्तरहीन था! कटारिया के भाषण ने साफ कर दिया कि उदयपुर डिवीजन में भाजपा को शिकस्त मिल सकती है! एनपीपी के नेता किरोड़ीलाल मीणा हाथ धोकर भाजपा के पीछे पड़े हैं। हालात ये हैं कि किरोड़लाल मीणा ने साफ-साफ तैय कर लिया है कि उन्हें सफलता मिले या न मिले, किसी भी कीमत पर भाजपा को शिकस्त दिलवाना है।
हालात यह है कि राजस्थान में विधानसभा चुनावों में भाजपा को 82-90 सीटें मिलने का जो ग्राफ बन रहा था वह सिमट कर 76-80 सीटों पर आ टिका है। उधर माकपा 9 और जमींदारा पार्टी 2 सीटें ले सकती है। कांग्रेस का ग्राफ फिलहाल 85 सीटों पर स्थित है। एनपीपी ने भी अपनी स्थिति मजबूत की है, लेकिन उसे सही उम्मीदवारों की तलाश है। इस तरह जो नई स्थिति बनी उसके अनुसार कांग्रेस 85 सीटों पर स्थिर, भाजपा 76 से 80 के घेरे में, माकपा 9 एवं अन्य 25-30 के घेरे में सीटों पर काबिज हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में यह साफ है कि लोकसभा चुनावों में भाजपा को निश्चित रूप से गहरा झटका राजस्थान में लगने जा रहा है और उम्मीद से हट कर भाजपा को अधिकतम 13 सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है।
इसके साथ ही यह भी साफ होता जा रहा है कि वाम-जनवादियों का राजस्थान में आधार बढ़ रहा है। चुनावों में कौन कितनी सीटें लायेगा, इससे इतर अगर वाम जनवादियों का जनाधार बढ़ता है तो आने वाला समय उनके लिये राजनैतिक रूप से अच्छा होगा!

 
AGRAGAMI SANDESH

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