पिछले दिनों जयपुर महानगर के सिविल लाइन्स स्थित इसरदा पैलेस में मुस्लिम उलेमाओं के आयोजित एक कार्यक्रम में राज्य की भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे ने मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस से दूर रहने की सलाह दी बताई जाती है।
श्रीमती वसुन्धरा राजे ने यह भी कहा बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी सभी मजहबों और 36 कौमों को साथ लेकर चलने में विश्वास करती है।
अब यहां मुद्दा यह उठता है कि अगर श्रीमती वसुन्धरा राजे के कथन को एक बारगी सही मान लिया जाये, तो सवाल यह उठता है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कुल कितने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिये और मुस्लिम उम्मीदवारों को कुल भाजपा उम्मीदवारों के मुकाबले कितने प्रतिशत सीटें दी गई!
नरेन्द्र मोदी ने भी पिछले दिनों हरियाणा में हुई भूतपूर्व सैनिकों की रैली में फौज में मुस्लिमों की तादाद के मुद्दे को उठाया था। देखने में दोनों ही मुद्दे मुसलमानों के हित में लगते हैं। लेकिन हकीकत में इससे परे हैं। भाजपा एक तरफ तो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में जुटी है वहीं मुसलमानों को कांग्रेस व अन्य निरपेक्ष राजनैतिक दलों से अलग-थलग कर उनकी एकजुट ताकत को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास कर रही है। देश में जैन समुदाय की एकजुटता को भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी इस ही तरह छिन्न-भिन्न कर चुकी है। राजस्थान को ही लें, आज भाजपा के टिकट पर चुना जैन समुदाय का सदस्य आरएसएस और भाजपा की राग ही अलापेगा! अगर भूल-चूक में उसने जैन समुदाय के पक्ष में आवाज उठाने की कोशिश की तो उसे पार्टी के बाहर का रास्ता दिखाने की धमकी दी जाती है। चूंकि जैन समुदाय की एकता को पहिले ही खण्डित किया जा चुका है, ऐसी स्थिति में मजबूर होकर उसे चुप्पी साधनी होती है, सिर झुका कर रहना होता है। यही हालात जैन समुदाय की कांग्रेस में भी है।
पिछले दिनों जयपुर के जैन समुदाय में श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता का पाखण्ड फैलाने की गहरी साजिश की गई थी। इस साजिश की हकीकत का भाण्डाफूट जाने के बाद राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सर कार्यवाह मोहन भागवत के अलावा कोई भी राजनेता ने मुनि तरूण सागर, मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर के प्रवचनों और कार्यक्रमों की तरफ रूख नहीं किया। श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता का पाखण्ड करने वाले लोग वे ही थे, जो विधानसभा में भाजपा के विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया के प्रकरण में उनके पक्ष में राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन देने जयपुर जिला कलक्टर के दफ्तर पहुंचे थे।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के भाजपा पर बढ़ते दबाव और भारतीय जनता पार्टी में ही अलग-थलग पड़ती जा रही श्रीमती वसुन्धरा राजे का पूरा प्रयास है कि राज्य में येन केन प्रकेरण राजपूतों, मुस्लिम समाज और जैन समुदाय को अपने पाले में लाकर आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पर बढ़त बनायें। उधर अंदर ही अंदर भाजपा में सिरफुटव्वल है और उससे निजात पाने के लिये भी उसे मुस्लिम, जैन और राजपूत समाज की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ एक सोची समझी रणनीति के तहत असन्तुष्ट भाजपाई नेताओं को एक अन्य राजनैतिक पार्टी में घुसा कर वहां से चुनाव लड़वा कर भाजपाई उम्मीदवारों को राहत दिलाने की योजना को भी अमली जामा पहिनाने की जुगत बैठा रहा है।
कुल मिला कर राजस्थान में चुनावी गणित भाजपाई राज्य नेतृत्व के साथ-साथ राष्ट्रीय नेतृत्व की गलफांस बनता ही जा रहा है। देखना यही है कि राज्य में चुनावी आचार सहिंता लागू होने के बाद स्थिति कौनसी करवट लेती है।
श्रीमती वसुन्धरा राजे ने यह भी कहा बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी सभी मजहबों और 36 कौमों को साथ लेकर चलने में विश्वास करती है।
अब यहां मुद्दा यह उठता है कि अगर श्रीमती वसुन्धरा राजे के कथन को एक बारगी सही मान लिया जाये, तो सवाल यह उठता है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कुल कितने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिये और मुस्लिम उम्मीदवारों को कुल भाजपा उम्मीदवारों के मुकाबले कितने प्रतिशत सीटें दी गई!
नरेन्द्र मोदी ने भी पिछले दिनों हरियाणा में हुई भूतपूर्व सैनिकों की रैली में फौज में मुस्लिमों की तादाद के मुद्दे को उठाया था। देखने में दोनों ही मुद्दे मुसलमानों के हित में लगते हैं। लेकिन हकीकत में इससे परे हैं। भाजपा एक तरफ तो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में जुटी है वहीं मुसलमानों को कांग्रेस व अन्य निरपेक्ष राजनैतिक दलों से अलग-थलग कर उनकी एकजुट ताकत को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास कर रही है। देश में जैन समुदाय की एकजुटता को भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी इस ही तरह छिन्न-भिन्न कर चुकी है। राजस्थान को ही लें, आज भाजपा के टिकट पर चुना जैन समुदाय का सदस्य आरएसएस और भाजपा की राग ही अलापेगा! अगर भूल-चूक में उसने जैन समुदाय के पक्ष में आवाज उठाने की कोशिश की तो उसे पार्टी के बाहर का रास्ता दिखाने की धमकी दी जाती है। चूंकि जैन समुदाय की एकता को पहिले ही खण्डित किया जा चुका है, ऐसी स्थिति में मजबूर होकर उसे चुप्पी साधनी होती है, सिर झुका कर रहना होता है। यही हालात जैन समुदाय की कांग्रेस में भी है।
पिछले दिनों जयपुर के जैन समुदाय में श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता का पाखण्ड फैलाने की गहरी साजिश की गई थी। इस साजिश की हकीकत का भाण्डाफूट जाने के बाद राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सर कार्यवाह मोहन भागवत के अलावा कोई भी राजनेता ने मुनि तरूण सागर, मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर के प्रवचनों और कार्यक्रमों की तरफ रूख नहीं किया। श्वेताम्बर-दिगम्बर एकता का पाखण्ड करने वाले लोग वे ही थे, जो विधानसभा में भाजपा के विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया के प्रकरण में उनके पक्ष में राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन देने जयपुर जिला कलक्टर के दफ्तर पहुंचे थे।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के भाजपा पर बढ़ते दबाव और भारतीय जनता पार्टी में ही अलग-थलग पड़ती जा रही श्रीमती वसुन्धरा राजे का पूरा प्रयास है कि राज्य में येन केन प्रकेरण राजपूतों, मुस्लिम समाज और जैन समुदाय को अपने पाले में लाकर आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पर बढ़त बनायें। उधर अंदर ही अंदर भाजपा में सिरफुटव्वल है और उससे निजात पाने के लिये भी उसे मुस्लिम, जैन और राजपूत समाज की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ एक सोची समझी रणनीति के तहत असन्तुष्ट भाजपाई नेताओं को एक अन्य राजनैतिक पार्टी में घुसा कर वहां से चुनाव लड़वा कर भाजपाई उम्मीदवारों को राहत दिलाने की योजना को भी अमली जामा पहिनाने की जुगत बैठा रहा है।
कुल मिला कर राजस्थान में चुनावी गणित भाजपाई राज्य नेतृत्व के साथ-साथ राष्ट्रीय नेतृत्व की गलफांस बनता ही जा रहा है। देखना यही है कि राज्य में चुनावी आचार सहिंता लागू होने के बाद स्थिति कौनसी करवट लेती है।


