आगामी 28 सितम्बर को मुनि कान्ति सागर जी की 44वीं पुण्य तिथि है। उनके देवलोकगमन को 43 साल पूरे हो चुके हैं।
नाकोडा तीर्थ संस्थापक व प्रतिष्ठापक खरतरगच्छाचार्य श्री कीर्तिरत्न सूरि की परम्परा में श्री जिन कृपाचंद्रसूरि के शिष्य उपाध्याय मुनि सुखसागर जी के लद्यु शिष्य मुनि कान्ति सागर का जन्म गुजरात के जामनगर में 07 जुलाई, 1926 को द्विवेदी गोत्रिय औदिच्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मात्र 9-10 वर्ष की आयु में 1936 ईस्वी में उन्हें उपाध्याय मुनि सुखसागर जी ने दीक्षित कर अपने संरक्षण में लिया।
उपाध्याय मुनि सुखसागर जी और अपने ज्येष्ठ गुरूबंधु मुनि मंगल सागर की छत्रछाया में धार्मिक साधना और जैन ग्रंथों के अध्ययन में उन्होंने प्रवीणता हांसिल की! उन्हीं के कारण मुनि कान्ति सागर की खण्डहरों के अन्वेषण में रूचि हुई। मात्र 27 वर्ष की अल्प आयु में तेजस्वी मुनि कान्ति सागर ने संस्कृत में निर्पुणता के साथ-साथ पुरातत्ववेत्ता के रूप में अपने आप को स्थापित कर लिया! जून 1953 में उनकी बहुचर्चित पुस्तक खण्डहरों का वैभव भारतीय ज्ञानपीठ बनारस ने प्रकाशित की!
जैन संस्कृति के पुरोधा, संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित, कला मर्मज्ञ, मूर्धन्य पुरातत्ववेत्ता एवं ज्ञानपीठ तथा उत्तर प्रदेश सरकार से सम्मानित मुनि कान्ति सागर की अन्य प्रकाशित कृति खोज की पगडण्डियां को भी ज्ञानपीठ ने ही प्रकाशित किया था। इनके अलावा जैन धातु प्रतिमा लेख भाग-1, नगर वर्णनात्मक हिन्दी पद्य संग्रह, सईकी और गुजराती में आयुर्वेदना अनुभूत प्रयोगों (भाग-1) उनकी प्रकाशित उत्कष्र्ट कृतियां हैं। ज्ञातव्य रहे कि सईकी के प्रकाशन का कार्य 1970 में जयपुर के श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ ने अपने हाथ में लिया था।
मूर्धन्य पुरातत्ववेत्ता मुनि कान्ति सागर ने महाराणा ऑफ मेवाड़ चेरीटेबिल फाउण्डेशन के आग्रह पर एकलिंग जी का इतिहास भी लिखा था, लेकिन विवादों के चलते उसका प्रकाशन नहीं हो पाया। विवादों के चलते उन्होंने मुनिवेश का त्याग कर दिया। नतीजन नेपाल नरेश के आग्रह पर उनके द्वारा लिखी जा रही रचना पशुपतिनाथ का इतिहास का लेखन भी उन्होंने स्थगित कर दिया था।
हम उन विवादास्पद एवं कटु क्षणों को यहां दोहराना अनावश्यक समझते हैं, लेकिन हमारी सोच यही रहेगी कि उनके दोषियों को जो अभी जीवित हैं, उन्हें स्वंय ही अपने कृत्यों का प्रायश्चित कर लेना चाहिये। 29 जुलाई, 1967 को मुनि मंगल सागर ने पालीताना में उन्हें पुन: दीक्षित किया। वे अपने सारे कटु अनुभवों को आत्मसात कर एक बार पुन: जयपुर चार्तुमास के लिये पधारे।
उन्होंने चार्तुमास पूर्ण करने का एक अवसर जयपुर के खरतरगच्छ के समाज बंधुओं को अपने सानिध्य में दिया। लेकिन महान् संघर्षशील इस पुरातत्ववेत्ता का शरीर अपनों से संघर्ष करते-करते जर्जर होता ही चला गया और अन्तत: 28 सितम्बर, 1970 को उन्होंने अपने जीवन को अन्तिम नमस्कार किया।
29 सितम्बर, 1970 को मौनवाडी (मोहनबाडी) में उनका अन्तिम संस्कार किया गया। उनके समाधी स्थल पर चबूतरे पर उनके चरण स्थापित किये गये। लेकिन निकृष्ट सोच वाले जयपुर के पूंजीपतियों-सरमायेदारों को उनके दाहसंस्कार स्थल पर बना उनका समाधी स्थल शायद रास नहीं आया! उसे विलोपित कर दिया गया। यही नहीं उनके दाहसंस्कार स्थल (समाधी स्थल) को पूंजीपति अपने अहंकार की तुष्टि के लिये बनाये जा रहे कॉमर्शियल हब में निर्माणाधीन मंदिर की नींव की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं!
अपनी निकृष्ट सोच और कुण्ठित मानसिकता के साथ एक मुर्धन्य पुरातत्ववेत्ता और जैन संस्कृति के प्रकाण्ड पंडित की समाधि को विलोपित कर उस पर पाषाणों की शिलाऐं स्थापित कर जयपुर के पूंजीपति क्या दर्शाना चाहते हैं? यही कि उनमें निकृष्टतम कृत्य करने की क्षमता है। शर्मनाक स्थिति तो यह है कि आदरणीय मुनि कान्ति सागर जी के समाधि स्थल का एक मुद्दा जो गहन चिंतन-मनन कर निष्कर्ष निकालने का है वह है कि-जिन लोगों को जैन संस्कृति के इतिहास का क-ख-ग भी मालूम नहीं है, जिन लोगों ने जैन संस्कृति के इतिहास के किसी पन्ने को देखा तक नहीं है जिन लोगों ने गैरजुम्मेदारान तरीके से इन्सानियत के परखच्चे उड़ा कर दौलत कमाई है क्या उनकी उस दौलत से बने मंदिरों-उपाश्रयों से पीडि़त मानवता को कोई लाभ मिलेगा? कदापि नहीं!
हमें गर्व है कि मुनि कान्ति सागर जी ने जैन संस्कृति, जैन समाज के लिये ठोस कार्य किया, जो सदैव स्मरणीय रहेगा। हम उनके कृतित्व-व्यक्तित्व से प्रभावित होकर बार-बार उन्हें नमन करते हैं। क्योंकि इतिहास तो लेखनी (कलम) लिखती है पाषाण की अट्टालिकायें या मूर्तियां नहीं!
-अग्रगामी टीम प्रस्तुति
नाकोडा तीर्थ संस्थापक व प्रतिष्ठापक खरतरगच्छाचार्य श्री कीर्तिरत्न सूरि की परम्परा में श्री जिन कृपाचंद्रसूरि के शिष्य उपाध्याय मुनि सुखसागर जी के लद्यु शिष्य मुनि कान्ति सागर का जन्म गुजरात के जामनगर में 07 जुलाई, 1926 को द्विवेदी गोत्रिय औदिच्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मात्र 9-10 वर्ष की आयु में 1936 ईस्वी में उन्हें उपाध्याय मुनि सुखसागर जी ने दीक्षित कर अपने संरक्षण में लिया।
उपाध्याय मुनि सुखसागर जी और अपने ज्येष्ठ गुरूबंधु मुनि मंगल सागर की छत्रछाया में धार्मिक साधना और जैन ग्रंथों के अध्ययन में उन्होंने प्रवीणता हांसिल की! उन्हीं के कारण मुनि कान्ति सागर की खण्डहरों के अन्वेषण में रूचि हुई। मात्र 27 वर्ष की अल्प आयु में तेजस्वी मुनि कान्ति सागर ने संस्कृत में निर्पुणता के साथ-साथ पुरातत्ववेत्ता के रूप में अपने आप को स्थापित कर लिया! जून 1953 में उनकी बहुचर्चित पुस्तक खण्डहरों का वैभव भारतीय ज्ञानपीठ बनारस ने प्रकाशित की!
जैन संस्कृति के पुरोधा, संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित, कला मर्मज्ञ, मूर्धन्य पुरातत्ववेत्ता एवं ज्ञानपीठ तथा उत्तर प्रदेश सरकार से सम्मानित मुनि कान्ति सागर की अन्य प्रकाशित कृति खोज की पगडण्डियां को भी ज्ञानपीठ ने ही प्रकाशित किया था। इनके अलावा जैन धातु प्रतिमा लेख भाग-1, नगर वर्णनात्मक हिन्दी पद्य संग्रह, सईकी और गुजराती में आयुर्वेदना अनुभूत प्रयोगों (भाग-1) उनकी प्रकाशित उत्कष्र्ट कृतियां हैं। ज्ञातव्य रहे कि सईकी के प्रकाशन का कार्य 1970 में जयपुर के श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ ने अपने हाथ में लिया था।
मूर्धन्य पुरातत्ववेत्ता मुनि कान्ति सागर ने महाराणा ऑफ मेवाड़ चेरीटेबिल फाउण्डेशन के आग्रह पर एकलिंग जी का इतिहास भी लिखा था, लेकिन विवादों के चलते उसका प्रकाशन नहीं हो पाया। विवादों के चलते उन्होंने मुनिवेश का त्याग कर दिया। नतीजन नेपाल नरेश के आग्रह पर उनके द्वारा लिखी जा रही रचना पशुपतिनाथ का इतिहास का लेखन भी उन्होंने स्थगित कर दिया था।
हम उन विवादास्पद एवं कटु क्षणों को यहां दोहराना अनावश्यक समझते हैं, लेकिन हमारी सोच यही रहेगी कि उनके दोषियों को जो अभी जीवित हैं, उन्हें स्वंय ही अपने कृत्यों का प्रायश्चित कर लेना चाहिये। 29 जुलाई, 1967 को मुनि मंगल सागर ने पालीताना में उन्हें पुन: दीक्षित किया। वे अपने सारे कटु अनुभवों को आत्मसात कर एक बार पुन: जयपुर चार्तुमास के लिये पधारे।
उन्होंने चार्तुमास पूर्ण करने का एक अवसर जयपुर के खरतरगच्छ के समाज बंधुओं को अपने सानिध्य में दिया। लेकिन महान् संघर्षशील इस पुरातत्ववेत्ता का शरीर अपनों से संघर्ष करते-करते जर्जर होता ही चला गया और अन्तत: 28 सितम्बर, 1970 को उन्होंने अपने जीवन को अन्तिम नमस्कार किया।
29 सितम्बर, 1970 को मौनवाडी (मोहनबाडी) में उनका अन्तिम संस्कार किया गया। उनके समाधी स्थल पर चबूतरे पर उनके चरण स्थापित किये गये। लेकिन निकृष्ट सोच वाले जयपुर के पूंजीपतियों-सरमायेदारों को उनके दाहसंस्कार स्थल पर बना उनका समाधी स्थल शायद रास नहीं आया! उसे विलोपित कर दिया गया। यही नहीं उनके दाहसंस्कार स्थल (समाधी स्थल) को पूंजीपति अपने अहंकार की तुष्टि के लिये बनाये जा रहे कॉमर्शियल हब में निर्माणाधीन मंदिर की नींव की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं!
अपनी निकृष्ट सोच और कुण्ठित मानसिकता के साथ एक मुर्धन्य पुरातत्ववेत्ता और जैन संस्कृति के प्रकाण्ड पंडित की समाधि को विलोपित कर उस पर पाषाणों की शिलाऐं स्थापित कर जयपुर के पूंजीपति क्या दर्शाना चाहते हैं? यही कि उनमें निकृष्टतम कृत्य करने की क्षमता है। शर्मनाक स्थिति तो यह है कि आदरणीय मुनि कान्ति सागर जी के समाधि स्थल का एक मुद्दा जो गहन चिंतन-मनन कर निष्कर्ष निकालने का है वह है कि-जिन लोगों को जैन संस्कृति के इतिहास का क-ख-ग भी मालूम नहीं है, जिन लोगों ने जैन संस्कृति के इतिहास के किसी पन्ने को देखा तक नहीं है जिन लोगों ने गैरजुम्मेदारान तरीके से इन्सानियत के परखच्चे उड़ा कर दौलत कमाई है क्या उनकी उस दौलत से बने मंदिरों-उपाश्रयों से पीडि़त मानवता को कोई लाभ मिलेगा? कदापि नहीं!
हमें गर्व है कि मुनि कान्ति सागर जी ने जैन संस्कृति, जैन समाज के लिये ठोस कार्य किया, जो सदैव स्मरणीय रहेगा। हम उनके कृतित्व-व्यक्तित्व से प्रभावित होकर बार-बार उन्हें नमन करते हैं। क्योंकि इतिहास तो लेखनी (कलम) लिखती है पाषाण की अट्टालिकायें या मूर्तियां नहीं!
-अग्रगामी टीम प्रस्तुति


