जयपुर (अग्रगामी) हमने पिछले अंकों में बताया था कि नाकोड़ा तीर्थ संस्थापक व प्रतिष्ठापक खरतरगच्छाचार्य श्री जिन कृष्णचंद्र सूरिश्वर के शिष्य उपाध्याय मुनि सुखसागर जी के लद्यु शिष्य महान पुरातत्ववेत्ता मुनि कान्ति सागर के, गलता रोड़ स्थित मौनवाडी (मोहनबाडी) में उनके अंतिम संस्कार स्थल पर स्थापित छतरी जिसमें उनके चरण विराजमान थे, को गैर जुम्मेदारान एवं अधार्मिक तरीके से विलोपित कर दिया गया है और अब उस अंतिम संस्कार स्थल को कुशलचंद-विमलचंद सुराना परिवार के निर्देशन में बनाये जा रहे नवीन मंदिर प्रांगण में लुप्त किया जा रहा है। यह मौनवाडी को एक कॉमर्शियल हब बनाने की एक गोपनीय साजिश के तहत किया जा रहा है।
हम आपको याद दिलादें कि मौनवाडी (मौहनबाडी) श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की सम्पत्ति नहीं है। यह सम्पत्ति विक्रम सम्वत 1837 में राम रतनलाल जी के मार्फत पंच ओसवालान को दी गई थी। अत: स्पष्ट है कि मौनवाडी की खसरा नम्बर 535 से 537 तक की जमीन जयपुर के समस्त ओसवालों की है और इस 25 बीघा बंजड़ जमीन खसरा नम्बर 535 से 537 तक में बाग वां बाग (बगीचा) लगाने हेतु ही स्वीकृति है। इस जमीन में किसी भी तरह के निर्माण की कोई स्वीकृति नहीं दी गई है।
खरतरगच्छ संघ के तत्कालीन पदाधिकारियों ने मौनवाडी (मौनबाडी) की जमीन का कॉमर्शियल भू-रूपान्तरण करने के लिये आवेदन किया था, लेकिन उसे राज्य सरकार ने स्वीकार नहीं किया। उसके बाद श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के तत्कालीन मैनेजर एन.आर.यादव ने एक अर्जी पेश कर इस जमीन का कॉमर्शियल के स्थान पर आवासीय उपयोग के लिये भू-रूपान्तरण चाहा गया। आवासीय उपयोग हेतु आवेदन के साथ आवासीय प्रयोजनार्थ नक्शे भी पेश किये गये थे। लेकिन मामला आगे नहीं चला।
7 नवम्बर, 2007 को श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की ओर से नवरत्नमल श्रीश्रीमाल ने भवन निर्माण के लिये नक्शे पेश किये गये। लेकिन भवन निर्माण की स्वीकृति नहीं मिली। लेकिन बिना इजाजत तामीरात जारी रही, नतीजन 25 मई, 2009, 01 दिसम्बर, 2009 और 12 मार्च, 2010 को संघ पदाधिकारियों को जयपुर नगर निगम द्वारा अवैध निर्माण रोके जाने के लिये नोटिस जारी किये गये। सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी धार्मिक स्थान पर बिना स्वीकृति अवैध निर्माण न किया जाये। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की पालना की मानीटरिंग करने के लिये कोर्ट ने एक एम्पावर्ड कमेटी भी हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों की अगुवाई में नियुक्त की है। सूत्र बताते हैं कि मौनवाडी (मोहनबाडी) में किसी भी तरह के निर्माणकी कोई स्वीकृति जयपुर नगर निगम ने आज तक जारी ही नहीं की है।
लेकिन सैंकडों हरे पेड़ों को काट कर इस धार्मिक स्थल पर कॉमर्शियल गतिविधियां निरन्तर जारी हैं। मौनवाडी की आधी से ज्यादा जमीन पर तीन मैरेज गार्डन बना दिये गये हैं। इन मैरेज गार्डनों और गैस्ट हाऊस के नाम पर बिल्डिंग का होटल के रूप में भारी दुरूपयोग हो रहा है। जबकि गैरजुम्मेदारान एवं अधार्मिक तरीके से समाज के ही विद्वान मुनि कान्ति सागर जी की छतरी और चरणों को विलोपित कर दिया गया।
हम इस सम्बन्ध में अगले अंकों में इस प्रकरण से जुड़े अन्य अनछुए गम्भीर पहलुओं का विस्तार से खुलासा करेंगे। क्रमश:
हम आपको याद दिलादें कि मौनवाडी (मौहनबाडी) श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की सम्पत्ति नहीं है। यह सम्पत्ति विक्रम सम्वत 1837 में राम रतनलाल जी के मार्फत पंच ओसवालान को दी गई थी। अत: स्पष्ट है कि मौनवाडी की खसरा नम्बर 535 से 537 तक की जमीन जयपुर के समस्त ओसवालों की है और इस 25 बीघा बंजड़ जमीन खसरा नम्बर 535 से 537 तक में बाग वां बाग (बगीचा) लगाने हेतु ही स्वीकृति है। इस जमीन में किसी भी तरह के निर्माण की कोई स्वीकृति नहीं दी गई है।
खरतरगच्छ संघ के तत्कालीन पदाधिकारियों ने मौनवाडी (मौनबाडी) की जमीन का कॉमर्शियल भू-रूपान्तरण करने के लिये आवेदन किया था, लेकिन उसे राज्य सरकार ने स्वीकार नहीं किया। उसके बाद श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के तत्कालीन मैनेजर एन.आर.यादव ने एक अर्जी पेश कर इस जमीन का कॉमर्शियल के स्थान पर आवासीय उपयोग के लिये भू-रूपान्तरण चाहा गया। आवासीय उपयोग हेतु आवेदन के साथ आवासीय प्रयोजनार्थ नक्शे भी पेश किये गये थे। लेकिन मामला आगे नहीं चला।
7 नवम्बर, 2007 को श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की ओर से नवरत्नमल श्रीश्रीमाल ने भवन निर्माण के लिये नक्शे पेश किये गये। लेकिन भवन निर्माण की स्वीकृति नहीं मिली। लेकिन बिना इजाजत तामीरात जारी रही, नतीजन 25 मई, 2009, 01 दिसम्बर, 2009 और 12 मार्च, 2010 को संघ पदाधिकारियों को जयपुर नगर निगम द्वारा अवैध निर्माण रोके जाने के लिये नोटिस जारी किये गये। सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी धार्मिक स्थान पर बिना स्वीकृति अवैध निर्माण न किया जाये। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की पालना की मानीटरिंग करने के लिये कोर्ट ने एक एम्पावर्ड कमेटी भी हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों की अगुवाई में नियुक्त की है। सूत्र बताते हैं कि मौनवाडी (मोहनबाडी) में किसी भी तरह के निर्माणकी कोई स्वीकृति जयपुर नगर निगम ने आज तक जारी ही नहीं की है।
लेकिन सैंकडों हरे पेड़ों को काट कर इस धार्मिक स्थल पर कॉमर्शियल गतिविधियां निरन्तर जारी हैं। मौनवाडी की आधी से ज्यादा जमीन पर तीन मैरेज गार्डन बना दिये गये हैं। इन मैरेज गार्डनों और गैस्ट हाऊस के नाम पर बिल्डिंग का होटल के रूप में भारी दुरूपयोग हो रहा है। जबकि गैरजुम्मेदारान एवं अधार्मिक तरीके से समाज के ही विद्वान मुनि कान्ति सागर जी की छतरी और चरणों को विलोपित कर दिया गया।
हम इस सम्बन्ध में अगले अंकों में इस प्रकरण से जुड़े अन्य अनछुए गम्भीर पहलुओं का विस्तार से खुलासा करेंगे। क्रमश:


