हमने अग्रगामी संदेश के 15 जुलाई, 5 अगस्त और 19 अगस्त के अंकों में यह कैसा सन्यास! शीर्षक के अन्तर्गत लिखे आलेख में सन्यास से सम्बन्धित सवाल उठाये थे। तत्पश्चात अग्रगामी संदेश के ही 26 अगस्त के अंक में हमने साधु-सन्यासियों, बाबाओं और कथावाचकों का भी हो पंजीकरण के अन्तर्गत लेख में अपने आप को कथित साधु-सन्त आरोपित करने वालों के पंजीकरण का मुद्दा उठाया था। हमें इस बात का संतोष है कि हमारी इस पहल के बाद, देश के इलेक्ट्रोनिक मीडिया में हमारे द्वारा उठाये गये मुद्दों पर गहरी चर्चाओं का दौर चल रहा है। प्रिंट मीडिया भी अपने तरीके से मुद्दों पर चर्चा कर रहा है।
इन मीडिया चर्चाओं के दौरान जो खास मुद्दा उभर कर सामने आया वह है कि साधु-सन्यासियों, कथावाचकों और बाबाओं तथा बाबाओं की आड़ में पनप रहे भिखारियों की अलग-अलग पहिचान हो और साधु-सन्तों पर सामाजिक स्तर से अन्यथा सरकारी स्तर पर नियामक अधिकरण बना कर नियन्त्रण कायम किया जाये। प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर साधु-सन्तों ने भी माना है कि सन्त समाज कुछ अनियन्त्रित और निंकुश साधु-सन्तों की वजह से अनावश्यक रूप से आलोचनाओं के घेरे में है! इलेक्ट्रोनिक एवं प्रिंट मीडिया में बहस जारी है।
लेकिन उपरोक्त परिपेक्ष में हम जैन समुदाय के मुनियों और सन्तों के क्रिया कलापों पर नजर डालें तो साफ हो जायेगा कि जैन समुदाय के आचार्यों, सन्तों, मुनियों को भी अब आत्म विश्लेषण करने का सही वक्त आ गया है। श्वेताम्बर जैन समुदाय में तेरापंथ ही एक एक ऐसा मत है जिसके साधु-साध्वियां पूरी तरह से नियन्त्रित अनुशासित हैं। उनके क्रिया कलापों पर संघपति आचार्य का पूरा नियन्त्रण है। इस के अलावा श्वेताम्बर समुदाय के स्थानकवासी और इनमें भी सन्तों के आधार पर विघटित होकर बने संगठन, मंदिर मार्गियों में खरतरगच्छ, तपागच्छ, अचलगच्छ सहित विभिन्न गच्छों के साधु-सन्त आज अपने टोलों के आधार पर अपनी-अपनी ढफली और अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। चाहे श्वेताम्बर हों या फिर दिगम्बर जैन समुदाय, आचार्यों के आधार पर तो उसमें विघटन है ही लेकिन इन आचार्यों के शिष्य भी अपने आचार्यों के अनुशासनिक नियन्त्रण से अपने आपको मुक्त कर राष्ट्र सन्त, महोपाध्याय जैसी अपनी मर्जी की उपाधियां गैर जुम्मेदारान तरीके से धारण कर कुछ पूंजीपतियों और उनके कालेधन के बूते पर श्रद्धालुओं को भ्रमित कर भीड़ जुटाओ अभियान में जुटे हैं। इनकी करतूतों से जैन समुदाय में टूटन बढ़ती ही जा रही है।
लगभग एक पखवाड़े पहिले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत दिगम्बर मुनि तरूण सागर से मिले थे! दोनों की मुलाकात की हकीकत सबके सामने है। पिछले शनिवार को भागवत दिगम्बर मुनि पुलक सागर से मिले। बंद कमरे चर्चा हुई! नतीजे सामने आयेंगे। मुनि पुलक सागर ने कहा बताया कि सन्तों की मर्यादा निश्चित की जानी चाहिये! हम तो शुरू से कह रहे हैं कि सन्तों को अपनी मर्यादा में रहना चाहिये और सन्तों की मर्यादा से सम्बन्धित निर्देश ऋषभदेव के मानवधर्म सूत्र और जैन संस्कृति के ऐतिहासिक ग्रंथ महाभाष्य सहित अनेक ग्रंथों में उपलब्ध हैं। लेकिन जैन संस्कृति में मर्यादा सम्बन्धि स्पष्ट निर्देश होने के बावजूद प्रचार, धन-दौलत की माया में उलझे सन्त-मुनि उनके लिये स्थापित आचार संहिता का जानबूझ कर पालन नहीं करते हैं! यहां तक कि अपने आचार्य के अनुशासन से स्वंय की इच्छा से मुक्त होकर सेठों की मदद से अपना अलग साम्राज्य बनाने की जुगत में जुटे हैं। मुनि तरूण सागर हों या फिर मुनि पुलक सागर, इनके लिये मार्यादा वही है जो उनकी चाहत है! जैन संस्कृति में निर्देशित मर्यादा से उनका क्या लेना देना?
पिछले दिनों राज्य की राजधानी जयपुर में श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन एकता का पाखण्ड कर भारी शोर शराबा और उछलकूद हुई! जयपुर के एसएमएस इन्वेस्टमेंट ग्राउण्ड पर बडा वाटर प्रूफ पंडाल सजा कर मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर ने बड़े लच्छेदार, कड़वे-मीठे-खट्टे प्रवचन दिये! अब इन मुनित्रय से पूछा जाये कि इनके प्रवचन सुनने आये श्रोताओं पर उनके प्रवचनों का क्या असर हुआ? मुनित्रय खुद अपने बैरोमीटर से अपने कृत्यों/प्रवचनों का विश्लेषण करलें उनके प्रभावों की हकीकत उजागर करें आम जैन समुदाय के सामने! वैसे हम यहां स्पष्ट करना चाहेंगे कि जो सन्त स्वंय के लिये जैन संस्कृति में स्थापित आचार संहिता का पालन नहीं करते हैं, उनके प्रवचनों-कथावाचनों का श्रावकों/श्रद्धालुओं पर किसी भी स्तर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनका कृत्य सिर्फ उसके अहम की तुष्टि बन कर रह जाता है। लेकिन नुकसान भारी होता है! क्योंकि सन्तों-मुनियों की खेंचतान में समाज में विघटन बढ़ता ही है।
दु:खद स्थिति यह है कि चार्तुमास कार्यक्रम और उसमें भी पवित्र पर्युषण पर्व, समाज के अन्दर व्याप्त रागद्वेश, लोभ-लालच, मान-सम्मान, अभिमान, निकृष्ट गैरजुम्मेदारान कृत्यों के परित्याग के लिये आयोजित होते हैं, लेकिन हमारे सन्त-मुनि इस वक्त को भी अपने प्रचार-प्रसार और अपने हित साधन में उपयोग करें तो आम श्रावकों का उन पर से विश्वास उठना स्वाभाविक है। अग्रगामी संदेश में हमारे सम्पादन सहयोगी आशीष कुमार जैन ने अपने लेख में सही लिखा है कि क्या हमारे सन्त मुख्य धारा में लौटेंगे! विषय हमारे साधु-सन्तों के लिये चिन्तन-मनन का और फैसला लेने का है। उन्हें यह याद रखना ही होगा कि उनके कृत्यों का खमियाजा समाज को खास कर उन श्रावकों/ऋद्धालुओं को भुगतना होता है जो उनपर अंध विश्वास करते हैं।
हम उजागर करेंगे उन कृत्यों को सचित्र जो बताते है जैन संस्कृति और उसके अनुशासन की कैसे हो रही है अवमानना और कैसे और क्यों हो रही है आचार्यों के आदेशों की अनदेखी!
इन मीडिया चर्चाओं के दौरान जो खास मुद्दा उभर कर सामने आया वह है कि साधु-सन्यासियों, कथावाचकों और बाबाओं तथा बाबाओं की आड़ में पनप रहे भिखारियों की अलग-अलग पहिचान हो और साधु-सन्तों पर सामाजिक स्तर से अन्यथा सरकारी स्तर पर नियामक अधिकरण बना कर नियन्त्रण कायम किया जाये। प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर साधु-सन्तों ने भी माना है कि सन्त समाज कुछ अनियन्त्रित और निंकुश साधु-सन्तों की वजह से अनावश्यक रूप से आलोचनाओं के घेरे में है! इलेक्ट्रोनिक एवं प्रिंट मीडिया में बहस जारी है।
लेकिन उपरोक्त परिपेक्ष में हम जैन समुदाय के मुनियों और सन्तों के क्रिया कलापों पर नजर डालें तो साफ हो जायेगा कि जैन समुदाय के आचार्यों, सन्तों, मुनियों को भी अब आत्म विश्लेषण करने का सही वक्त आ गया है। श्वेताम्बर जैन समुदाय में तेरापंथ ही एक एक ऐसा मत है जिसके साधु-साध्वियां पूरी तरह से नियन्त्रित अनुशासित हैं। उनके क्रिया कलापों पर संघपति आचार्य का पूरा नियन्त्रण है। इस के अलावा श्वेताम्बर समुदाय के स्थानकवासी और इनमें भी सन्तों के आधार पर विघटित होकर बने संगठन, मंदिर मार्गियों में खरतरगच्छ, तपागच्छ, अचलगच्छ सहित विभिन्न गच्छों के साधु-सन्त आज अपने टोलों के आधार पर अपनी-अपनी ढफली और अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। चाहे श्वेताम्बर हों या फिर दिगम्बर जैन समुदाय, आचार्यों के आधार पर तो उसमें विघटन है ही लेकिन इन आचार्यों के शिष्य भी अपने आचार्यों के अनुशासनिक नियन्त्रण से अपने आपको मुक्त कर राष्ट्र सन्त, महोपाध्याय जैसी अपनी मर्जी की उपाधियां गैर जुम्मेदारान तरीके से धारण कर कुछ पूंजीपतियों और उनके कालेधन के बूते पर श्रद्धालुओं को भ्रमित कर भीड़ जुटाओ अभियान में जुटे हैं। इनकी करतूतों से जैन समुदाय में टूटन बढ़ती ही जा रही है।
लगभग एक पखवाड़े पहिले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत दिगम्बर मुनि तरूण सागर से मिले थे! दोनों की मुलाकात की हकीकत सबके सामने है। पिछले शनिवार को भागवत दिगम्बर मुनि पुलक सागर से मिले। बंद कमरे चर्चा हुई! नतीजे सामने आयेंगे। मुनि पुलक सागर ने कहा बताया कि सन्तों की मर्यादा निश्चित की जानी चाहिये! हम तो शुरू से कह रहे हैं कि सन्तों को अपनी मर्यादा में रहना चाहिये और सन्तों की मर्यादा से सम्बन्धित निर्देश ऋषभदेव के मानवधर्म सूत्र और जैन संस्कृति के ऐतिहासिक ग्रंथ महाभाष्य सहित अनेक ग्रंथों में उपलब्ध हैं। लेकिन जैन संस्कृति में मर्यादा सम्बन्धि स्पष्ट निर्देश होने के बावजूद प्रचार, धन-दौलत की माया में उलझे सन्त-मुनि उनके लिये स्थापित आचार संहिता का जानबूझ कर पालन नहीं करते हैं! यहां तक कि अपने आचार्य के अनुशासन से स्वंय की इच्छा से मुक्त होकर सेठों की मदद से अपना अलग साम्राज्य बनाने की जुगत में जुटे हैं। मुनि तरूण सागर हों या फिर मुनि पुलक सागर, इनके लिये मार्यादा वही है जो उनकी चाहत है! जैन संस्कृति में निर्देशित मर्यादा से उनका क्या लेना देना?
पिछले दिनों राज्य की राजधानी जयपुर में श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन एकता का पाखण्ड कर भारी शोर शराबा और उछलकूद हुई! जयपुर के एसएमएस इन्वेस्टमेंट ग्राउण्ड पर बडा वाटर प्रूफ पंडाल सजा कर मुनि ललितप्रभ सागर, मुनि चंद्रप्रभ सागर और मुनि तरूण सागर ने बड़े लच्छेदार, कड़वे-मीठे-खट्टे प्रवचन दिये! अब इन मुनित्रय से पूछा जाये कि इनके प्रवचन सुनने आये श्रोताओं पर उनके प्रवचनों का क्या असर हुआ? मुनित्रय खुद अपने बैरोमीटर से अपने कृत्यों/प्रवचनों का विश्लेषण करलें उनके प्रभावों की हकीकत उजागर करें आम जैन समुदाय के सामने! वैसे हम यहां स्पष्ट करना चाहेंगे कि जो सन्त स्वंय के लिये जैन संस्कृति में स्थापित आचार संहिता का पालन नहीं करते हैं, उनके प्रवचनों-कथावाचनों का श्रावकों/श्रद्धालुओं पर किसी भी स्तर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनका कृत्य सिर्फ उसके अहम की तुष्टि बन कर रह जाता है। लेकिन नुकसान भारी होता है! क्योंकि सन्तों-मुनियों की खेंचतान में समाज में विघटन बढ़ता ही है।
दु:खद स्थिति यह है कि चार्तुमास कार्यक्रम और उसमें भी पवित्र पर्युषण पर्व, समाज के अन्दर व्याप्त रागद्वेश, लोभ-लालच, मान-सम्मान, अभिमान, निकृष्ट गैरजुम्मेदारान कृत्यों के परित्याग के लिये आयोजित होते हैं, लेकिन हमारे सन्त-मुनि इस वक्त को भी अपने प्रचार-प्रसार और अपने हित साधन में उपयोग करें तो आम श्रावकों का उन पर से विश्वास उठना स्वाभाविक है। अग्रगामी संदेश में हमारे सम्पादन सहयोगी आशीष कुमार जैन ने अपने लेख में सही लिखा है कि क्या हमारे सन्त मुख्य धारा में लौटेंगे! विषय हमारे साधु-सन्तों के लिये चिन्तन-मनन का और फैसला लेने का है। उन्हें यह याद रखना ही होगा कि उनके कृत्यों का खमियाजा समाज को खास कर उन श्रावकों/ऋद्धालुओं को भुगतना होता है जो उनपर अंध विश्वास करते हैं।
हम उजागर करेंगे उन कृत्यों को सचित्र जो बताते है जैन संस्कृति और उसके अनुशासन की कैसे हो रही है अवमानना और कैसे और क्यों हो रही है आचार्यों के आदेशों की अनदेखी!


