श्वेताम्बर जैन समुदाय में पर्युषण पर्व का अंतिम दिन सोमवार/मंगलवार होगा! इसके बाद इस मत के मानने वाले क्षमायाचना दिवस भी मनायेंगे। वहीं सोमवार से प्रारम्भ होने वाले दसलक्षण पर्व आगामी 18 सितम्बर तक चलेंगे। इसके बाद दिगम्बर समुदाय में भी क्षमावणी पर्व के रूप में मनायी जायेगी।
पर्युषण पर्व हो या फिर दसलक्षण पर्व! इन्हें मनाने और इनके समापन के पश्चात क्षमावणी (क्षमायाचना) की फौरी औपचारिकता के बाद हम पूर्व की तरह अपनी कार्यशैली को अपनाना शुरू कर देते हैं। वहीं राग द्वेष की भावना, वही बदला लेने की भावना, एक दूसरे को नीचा दिखाने, अमीर और ताकतवरों द्वारा गरीबों और बेवसों पर अत्याचार और उनकी सम्पत्ति हड़पना, सबकुछ वापस वैसे ही शुरू हो जाता है, जैसे पहिले था! इस ही तरह हमारे सन्त-मुनि भी अपनी पुरानी लयताल में आ जाते हैं! अब हमें भी एक बात साफ-साफ समझ लेना चाहिये कि हमारे अधिकांश सन्त-मुनि-साध्वियां चाहे वे किसी भी पद पर बिराजे हों, वे पूरी तरह निरंकुशित होकर पूंजीपतियों पर आश्रित हैं और इन्हें अपनी स्वार्थ पूर्ति के अलावा कुछ भी नहीं चाहिये! इसका एक छोटा सा उदाहरण मैं यहां देना चाहूंगा!
सोमवार 2 सितम्बर, 2013 का दिन! खरतरगच्छ संघ के मुख्यालय में पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के प्रारम्भ का दिन! यह वह दिन होता है, जब सिर्फ हम आध्यात्म से सम्बन्धित चर्चाओं में लीन होते हैं। लेकिन कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ, सेठों द्वारा सत्कार से! एक सेठ दूसरे सेठ का सत्कार कर रहा है, क्योंकि उस सेठ ने अपना बंगला कुछ दिनों के लिये हमारे मुनियों को आवास के लिये दिया था! पूरे तामझाम के साथ हुए इस कार्यक्रम में आयोजक अपने ही समाज के वरिष्ठ कार्यकर्ता रतनचंद कोठारी को भूल गये! ये वही रतनचंद कोठारी हैं जिन्होंने खरतरगच्छ संघ को उसके शैशवकाल में खरतरगच्छ संघमंत्री के रूप में पोषित-पल्लवित करने में समर्पण के साथ कार्य किया। यह वह समय था जब कोई संघमंत्री बनने का इच्छुक नहीं होता था। पूर्व संघमंत्री रतनचंद कोठारी दीवार के सहारे पीछे की कतार में एक कुर्सी पर लगभग अजनबी से एक श्रावक की तरह बैठे थे। हालांकि उस ही कतार में कुछ आगे समाज के एक धनपति और पूर्व अध्यक्ष कुशलचंद सुराना भी बैठे थे और सेठों के मान-सम्मान की प्रक्रिया में भागीदार बनते रहे। लेकिन खरतरगच्छ संघ के किसी भी पदाधिकारी या समाज के किसी भी धनपति ने कोठारी जी को याद नहीं किया!
चार्तुमास और उसमें भी खास कर पर्युषण पर्व के प्रारम्भ के दिन संघ पदाधिकारियों का इस तरह का सोच और व्यवहार सामाजिक तो हो ही नहीं सकता है, यह सीधा-सीधा पूंजीपतियों के आगे समर्पण से ज्यादा कुछ नहीं। कोठारी जी से जब हमने प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उनका सीधा-सीधा जवाब था कि बाबू यह सब पैसे वालों का खेल है, ऐसे में हमें कौन पूछेगा?
खैर जिंदगी चलती रहेगी! साधु-सन्यासी, मुनि आते रहेंगे, प्रवचन देते रहेंगे, सेठों का सामाजिक संगठनों पर कब्जा बरकरार रहेगा, उनके पुछल्ले समाज के धन-साधनों का निरंकुश उपयोग करते रहेंगे। खांऊ छूं-खमाऊं छूं का दौर जारी रहेगा! फिर ऐसे माहौल में क्षमा देने या लेने का क्या औचित्य है, बतायेंगे हमारे धर्माचार्य?
पर्युषण पर्व हो या फिर दसलक्षण पर्व! इन्हें मनाने और इनके समापन के पश्चात क्षमावणी (क्षमायाचना) की फौरी औपचारिकता के बाद हम पूर्व की तरह अपनी कार्यशैली को अपनाना शुरू कर देते हैं। वहीं राग द्वेष की भावना, वही बदला लेने की भावना, एक दूसरे को नीचा दिखाने, अमीर और ताकतवरों द्वारा गरीबों और बेवसों पर अत्याचार और उनकी सम्पत्ति हड़पना, सबकुछ वापस वैसे ही शुरू हो जाता है, जैसे पहिले था! इस ही तरह हमारे सन्त-मुनि भी अपनी पुरानी लयताल में आ जाते हैं! अब हमें भी एक बात साफ-साफ समझ लेना चाहिये कि हमारे अधिकांश सन्त-मुनि-साध्वियां चाहे वे किसी भी पद पर बिराजे हों, वे पूरी तरह निरंकुशित होकर पूंजीपतियों पर आश्रित हैं और इन्हें अपनी स्वार्थ पूर्ति के अलावा कुछ भी नहीं चाहिये! इसका एक छोटा सा उदाहरण मैं यहां देना चाहूंगा!
सोमवार 2 सितम्बर, 2013 का दिन! खरतरगच्छ संघ के मुख्यालय में पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के प्रारम्भ का दिन! यह वह दिन होता है, जब सिर्फ हम आध्यात्म से सम्बन्धित चर्चाओं में लीन होते हैं। लेकिन कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ, सेठों द्वारा सत्कार से! एक सेठ दूसरे सेठ का सत्कार कर रहा है, क्योंकि उस सेठ ने अपना बंगला कुछ दिनों के लिये हमारे मुनियों को आवास के लिये दिया था! पूरे तामझाम के साथ हुए इस कार्यक्रम में आयोजक अपने ही समाज के वरिष्ठ कार्यकर्ता रतनचंद कोठारी को भूल गये! ये वही रतनचंद कोठारी हैं जिन्होंने खरतरगच्छ संघ को उसके शैशवकाल में खरतरगच्छ संघमंत्री के रूप में पोषित-पल्लवित करने में समर्पण के साथ कार्य किया। यह वह समय था जब कोई संघमंत्री बनने का इच्छुक नहीं होता था। पूर्व संघमंत्री रतनचंद कोठारी दीवार के सहारे पीछे की कतार में एक कुर्सी पर लगभग अजनबी से एक श्रावक की तरह बैठे थे। हालांकि उस ही कतार में कुछ आगे समाज के एक धनपति और पूर्व अध्यक्ष कुशलचंद सुराना भी बैठे थे और सेठों के मान-सम्मान की प्रक्रिया में भागीदार बनते रहे। लेकिन खरतरगच्छ संघ के किसी भी पदाधिकारी या समाज के किसी भी धनपति ने कोठारी जी को याद नहीं किया!
चार्तुमास और उसमें भी खास कर पर्युषण पर्व के प्रारम्भ के दिन संघ पदाधिकारियों का इस तरह का सोच और व्यवहार सामाजिक तो हो ही नहीं सकता है, यह सीधा-सीधा पूंजीपतियों के आगे समर्पण से ज्यादा कुछ नहीं। कोठारी जी से जब हमने प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उनका सीधा-सीधा जवाब था कि बाबू यह सब पैसे वालों का खेल है, ऐसे में हमें कौन पूछेगा?
खैर जिंदगी चलती रहेगी! साधु-सन्यासी, मुनि आते रहेंगे, प्रवचन देते रहेंगे, सेठों का सामाजिक संगठनों पर कब्जा बरकरार रहेगा, उनके पुछल्ले समाज के धन-साधनों का निरंकुश उपयोग करते रहेंगे। खांऊ छूं-खमाऊं छूं का दौर जारी रहेगा! फिर ऐसे माहौल में क्षमा देने या लेने का क्या औचित्य है, बतायेंगे हमारे धर्माचार्य?


