हमने अग्रगामी संदेश के 15 जुलाई के अंक में यह सवाल उठाया था कि व्यक्ति सन्यास क्यों लेता है? और श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ समुदाय से जुड़े मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर के जयपुर चार्तुमास से जुड़े प्रकरण की रोशनी में सवाल किया था कि यह कैसा सन्यास?
खरतरगच्छ समुदाय के साधु-साध्वियों के चार्तुमास-2013 की एक सूची पू.गच्छाधिपति आचार्य जिन कैलाश सूरिश्वर की आज्ञा से जहाज मंदिर कार्यालय से प्रेषित की गई है। इस सूची में राजस्थान की राजधानी जयपुर में चातुर्मास करने हेतु मुनि ललितप्रभ सागर ठाणा-3 को निर्देशित किया गया है। मुनि चंद्रप्रभ सागर एवं मुनि शांतिप्रिय सागर मुनि ललितप्रभ सागर के साथ ही जयपुर में चातुर्मास प्रवास कर रहे हैं।
खरतरगच्छाचार्य के आदेशानुसार मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर एवं मुनि शांतिप्रभ सागर को जयपुर के विचक्षण भवन, केजीबी का रास्ता, जौहरी बाजार, जयपुर में चार्तुमास प्रवास करना चाहिये था! लेकिन गच्छाधिपति के आदेशें की अवहेलना कर वे संतोषचंद्र झाड़चूर के बंगला नम्बर 64, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर पर चार्तुमास प्रवास कर रहे हैं। आखीर क्यों? क्या मुनित्रय खरतरगच्छ आम्राय के संत नहीं हीं, क्या उनका दायीत्व नहीं बनता कि गच्छाधिपति के आदेश की पालना कर खरतरगच्छ समुदाय के भवन में अपना चार्तुमास आवास कर इस समुदाय के धार्मिक, नैतिक और सामाजिक कल्याण हेतु कार्य करें?
हमने अग्रगामी संदेश के 15 जुलाई के अंक में ही खरतरगच्छ के उपाध्याय श्री मणिप्रभ सागर के इन शब्दों का उल्लेख किया था कि चार्तुमास आता है आराधना का तीव्र प्रभाव लेकर! उनका आगे कथन है कि चार्तुमास में कषयों का कूड़ा-करकट बहा देना है और निर्मल हो जाना है!
सवाल उठता है कि समाज के हितों की अनदेखी कर, समाज के आराधना स्थल को नजरन्दाज कर दिगम्बर-श्वेताम्बर एकता के पाखण्ड की आड़ लेकर एक बडे पांडाल में कुछ सौ लोगों पर अपने प्रवचनभट्ट होने का ठप्पा लगाने भर से क्या खरतरगच्छ समुदाय का भला हो जायेगा? क्या इस ही तरह कषयों का कूडा-करकट बह सकता है? सवाल यह भी है कि अपने अहं की तुष्टि के लिये, चांदी की चमक के बीच अपने प्रचार की लालसा लिये एक सन्यासी को क्या अपने दायित्वों से पलायन करना चाहिये? सवाल यह भी उठता है कि अपने अहंकार की तुष्टि के लिये क्या एक सन्यासी अपने गच्छाधिपति के आदेशों की भी अवहेलना कर सकता है! अगर इन सवालें के जवाब हां में आते हैं तो फिर एक अहम सवाल उठ खड़ा होता है कि फिर यह कैसा सन्यास! ऐसे सन्यास का फिर फायदा ही क्या है?
फिर तो इन प्रवचनभट्टों को भी देश के उन कथावाचकों के बेडे में शामिल हो जाना चाहिये जो संत शब्द की आड़ में कथावाचन से प्रवचन देने लगे हैं और करोड़ों रूपये कमा रहे हैं! उनके बड़े-बड़े आश्रम हैं और नोटों की गड्डियों के सहारे वे जो चाहें करने की क्षमता रखे हैं। लेकिन सामाजिक स्तर पर उनकी कोई व्यवहारिक गतिविधि नहीं होती है। वैसे मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्र्रप्रभ सागर का भी सम्बोधिधाम है! कायलाना रोड़, जोधपुर स्थित सम्बोधिधाम के नाम से स्थापित सम्पत्ति का आखीर कौन मालिक है? यह हकीकत तो मुनि ललितप्रभ सागर और चंद्रप्रभ सागर ही बता सकते हैं क्योंकि जैन संत तो सबकुछ त्याग कर संत बनते हैं।
उम्मीद की जानी चाहिये कि खरतरगच्छ समुदाय से जुडे संतों को खरतरगच्छ आम्नाय के आचार, विचार, सिद्धांत, नियम एवं परम्पराओं का पालन हृदय से करना चाहिये नहीं तो सन्यास लेने का क्या फायदा!
खरतरगच्छ समुदाय के साधु-साध्वियों के चार्तुमास-2013 की एक सूची पू.गच्छाधिपति आचार्य जिन कैलाश सूरिश्वर की आज्ञा से जहाज मंदिर कार्यालय से प्रेषित की गई है। इस सूची में राजस्थान की राजधानी जयपुर में चातुर्मास करने हेतु मुनि ललितप्रभ सागर ठाणा-3 को निर्देशित किया गया है। मुनि चंद्रप्रभ सागर एवं मुनि शांतिप्रिय सागर मुनि ललितप्रभ सागर के साथ ही जयपुर में चातुर्मास प्रवास कर रहे हैं।
खरतरगच्छाचार्य के आदेशानुसार मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्रप्रभ सागर एवं मुनि शांतिप्रभ सागर को जयपुर के विचक्षण भवन, केजीबी का रास्ता, जौहरी बाजार, जयपुर में चार्तुमास प्रवास करना चाहिये था! लेकिन गच्छाधिपति के आदेशें की अवहेलना कर वे संतोषचंद्र झाड़चूर के बंगला नम्बर 64, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर पर चार्तुमास प्रवास कर रहे हैं। आखीर क्यों? क्या मुनित्रय खरतरगच्छ आम्राय के संत नहीं हीं, क्या उनका दायीत्व नहीं बनता कि गच्छाधिपति के आदेश की पालना कर खरतरगच्छ समुदाय के भवन में अपना चार्तुमास आवास कर इस समुदाय के धार्मिक, नैतिक और सामाजिक कल्याण हेतु कार्य करें?
हमने अग्रगामी संदेश के 15 जुलाई के अंक में ही खरतरगच्छ के उपाध्याय श्री मणिप्रभ सागर के इन शब्दों का उल्लेख किया था कि चार्तुमास आता है आराधना का तीव्र प्रभाव लेकर! उनका आगे कथन है कि चार्तुमास में कषयों का कूड़ा-करकट बहा देना है और निर्मल हो जाना है!
सवाल उठता है कि समाज के हितों की अनदेखी कर, समाज के आराधना स्थल को नजरन्दाज कर दिगम्बर-श्वेताम्बर एकता के पाखण्ड की आड़ लेकर एक बडे पांडाल में कुछ सौ लोगों पर अपने प्रवचनभट्ट होने का ठप्पा लगाने भर से क्या खरतरगच्छ समुदाय का भला हो जायेगा? क्या इस ही तरह कषयों का कूडा-करकट बह सकता है? सवाल यह भी है कि अपने अहं की तुष्टि के लिये, चांदी की चमक के बीच अपने प्रचार की लालसा लिये एक सन्यासी को क्या अपने दायित्वों से पलायन करना चाहिये? सवाल यह भी उठता है कि अपने अहंकार की तुष्टि के लिये क्या एक सन्यासी अपने गच्छाधिपति के आदेशों की भी अवहेलना कर सकता है! अगर इन सवालें के जवाब हां में आते हैं तो फिर एक अहम सवाल उठ खड़ा होता है कि फिर यह कैसा सन्यास! ऐसे सन्यास का फिर फायदा ही क्या है?
फिर तो इन प्रवचनभट्टों को भी देश के उन कथावाचकों के बेडे में शामिल हो जाना चाहिये जो संत शब्द की आड़ में कथावाचन से प्रवचन देने लगे हैं और करोड़ों रूपये कमा रहे हैं! उनके बड़े-बड़े आश्रम हैं और नोटों की गड्डियों के सहारे वे जो चाहें करने की क्षमता रखे हैं। लेकिन सामाजिक स्तर पर उनकी कोई व्यवहारिक गतिविधि नहीं होती है। वैसे मुनि ललितप्रभ सागर और मुनि चंद्र्रप्रभ सागर का भी सम्बोधिधाम है! कायलाना रोड़, जोधपुर स्थित सम्बोधिधाम के नाम से स्थापित सम्पत्ति का आखीर कौन मालिक है? यह हकीकत तो मुनि ललितप्रभ सागर और चंद्रप्रभ सागर ही बता सकते हैं क्योंकि जैन संत तो सबकुछ त्याग कर संत बनते हैं।
उम्मीद की जानी चाहिये कि खरतरगच्छ समुदाय से जुडे संतों को खरतरगच्छ आम्नाय के आचार, विचार, सिद्धांत, नियम एवं परम्पराओं का पालन हृदय से करना चाहिये नहीं तो सन्यास लेने का क्या फायदा!


