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नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हत्यारों को उजागर करे भारत सरकार!

नई दिल्ली/जयपुर (अग्रगामी) देश में बढ़ती जा रही मंहगाई, बेराजगारी, आरक्षण की आड़ में जातीय असंतुलन, गरीब-अमीर के बीच की बढ़ती खाई और असमानता के दौर से आम गरीब, निम्र मध्यम एवं मध्यम वर्ग की पीड़ा सुनने वाला देश में कोई राजनेता नजर नहीं आ रहा है! चाहे पक्ष हो और चाहे विपक्ष! हर एक राजनेता सत्ता की कुर्सी झपटने में लगा है।

ऐसी स्थिति में आज अवाम को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद फिर से सताने लगी है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का एक ही संकल्प था कि देश में आजादी के बाद भारतीय परिस्थियों और वातावरण के अनुकूल वैज्ञानिक समाजवाद के जरिये क्रान्तिकारी कार्यक्रम लागू किये जायें। लेकिन वर्तमान राजनेता चाहे पक्ष में बैठे हों या विपक्ष में, वे देश को अमरीका सहित अन्य पश्चिमी देशों को गिरवी रखने पर आमादा हैं।

देश की वर्तमान गम्भीर आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों के बीच अब यह सवाल पुन: गहराने लगा है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अमरीकियों द्वारा यातना देकर हत्या के मामले पर भारत सरकार जांच करवाने से क्यों कतरा रही है? जबकि उपलब्ध साक्ष्य इसे हकीकत मानने के लिये मजबूर कर रहे हैं।

वर्ष 1945 में जवाहरलाल नेहरू ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा उन्हें लिखे गये सीक्रेट पत्र के सन्दर्भ में अपने कान्फिडेंशियल स्टेनों श्यामलाल जैन से ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री एटली के लिये एक पत्र टाइप करवाया गया था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि आपके युद्ध अपराधी सुभाष चंद्र बोस को स्टालिन ने रूसी सीमा में प्रवेश की इजाजत दे दी है। ब्रिटिश गुप्तचर ऐजेंसियों ने भी इस की पुष्टि भी की है और श्यामलाल जैन के कथन का भी आज तक खण्डन नहीं हुआ है।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली और उनकी केबीनेट ने 25 अक्टूबर, 1945 को एक प्रस्ताव को मंजूरी देकर तय किया था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ युद्धबंदी के रूप में किंग के खिलाफ युद्ध करने व दुश्मन के ऐजेंट होने के आरोप में भारत के बाहर बर्मा या मलाया में सैन्य अदालत में मुकदमा चलाया जाये और उन्हें ब्रिटेन के आधीन किसी द्वीप के गोपनीय युद्ध शिविर में मृत्युदण्ड सहित अन्य कठोर दण्डों से दण्डित किया जाये।

ब्रिटिश केबीनेट के इस फैसले से साफ जाहिर हो जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की किसी भी हवाई दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी और उन्हें 18 अगस्त, 1945 या इसके आसपास की किसी तारीख में अमरीकी और ब्रिटिश गुप्तचर ऐजेंसियों ने गिरफ्तार कर लिया था और भारत के कुछ राजनेताओं को इसकी जानकारी थी!

एक बात साफ होती जा रही है कि 25 अक्टूबर, 1945 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सम्बन्ध में ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली और उनकी केबीनेट ने जो फैसला लिया था, उसके अनुसरण में देश के क्रान्तिकारी नेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अमरीका की क्यूबा द्वीप में स्थित बदनाम अबूगरीब जेल में अत्यन्त पीडाजनक यातना देने की प्रणाली वाटरबोर्डिग के जरिये यातना देकर हत्या कर दी गई!

चूंकि यह एक गम्भीर मसला है और इस मामले की सर्वोच्च स्तर पर गम्भीरता से जांच होना अनिवार्य है और इसके लिये आवश्यक है कि पूरे मामले की भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के निर्देशन में नेशनल इन्वेस्टीगेशन ऐजेंसी से पूरे प्रकरण की जांच करवाई जाये और इस हेतु केन्द्र सरकार पंडित नेहरू के कार्यकाल की प्रधानमंत्री सचिवालय की नेताजी से सम्बन्धित फाईलें, पंडित नेहरू द्वारा एटली को 1945 से 1947 तक लिखे गये नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित पत्र, रूस के राष्ट्रीय संग्रहालय तथा ब्रिटेन के राष्ट्रीय संग्रहालय में उपलब्ध नेता सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित अत्यन्त गोपनीय दस्तावेज तथा नेताजी से सम्बन्धित ब्रिटेन-अमरीका और रूस में उपलब्ध अत्यन्त गोपनीय युद्ध दस्तावेज, लार्ड माउण्टवेन्टन की व्यक्तिगत डायरी तथा ट्रांसफर आफ पावर से सम्बन्धित दस्तावेज, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद के नेताजी से सम्बन्धित दस्तावेज इस जांच ऐजेंसी को उपलब्ध करवाने की व्यवस्था भारत सरकार करवाये। जांच के लिये साफ-साफ समय सीमा निर्धारित की जाये और अमरीका, ब्रिटेन, रूस, जर्मनी और जापान पर दबाव बनाया जाये कि वे उनके पास उपलब्ध दस्तावेज तत्काल उपलब्ध करवायें। ताकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की यातनापूर्वक हत्या करने वाले राष्ट्रद्रोहियों और उनको सहयोग करने वालों के चेहरे बेनकाब हो सकें!

 
AGRAGAMI SANDESH

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